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मोदी-योगी की नासमझी से चमड़ा उद्योग गहरे संकट में।

विश्व के मानचित्र में आगरा की पहचान सिर्फ ताजमल के कारण ही नहीं है, चमड़ा उद्योग और यहां के बने जूते भी आगरा को पूरी दुनिया में पहचान दिलाते हैं। आगरा की मुस्लिम व दलित बस्तियों में सदियों से जूते बनाने का काम हो रहा है। लेकिन अब यहां के छोटे-छोटे कारखानों में काम करने वाले मजदूरों की रोजी-रोटी पर भी खतरा मंडराने लगा है। कारखानों के मालिक मज़दूरों को काम से हटाने के लिए मज़बूर हो रहे हैं,  और परिवार का पेट पालने तक का संकट आ गया है।आगरा के अलावा कानपुर, उन्नाव और मेरठ में भी चमड़ा उद्योग ठप पड़ा हुआ है।
उत्तर प्रदेश में भाजपा की योगी सरकार ने सत्ता में आते ही बिना लाइसेंस वाले बूचड़खानों को बंद करना शुरू कर दिया, जिसने ना सिर्फ मीट कारोबार को बुरी तरह प्रभावित किया बल्कि चमड़ा उद्योग को भी बुरे हालात में लाकर खड़ा कर दिया है। अवैध बूचडख़ानों पर योगी की सख्ती से मीट कारोबारी अभी उबर भी नहीं पाए थे कि केंद्र की मोदी सरकार ने वध के मकसद से पशुओं की बिक्री को प्रतिबंधित कर दिया। इस पाबंदी के दायरे में गाय के साथ भैंस को भी शामिल किया गया है, गाय के वध पर तो देश के कई राज्यों में पहले से ही रोक लगी हुई थी लेकिन मीट और चमड़ा उद्योग में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाली भैंस को भी मारना अब प्रतिबंधित हो गया है। जिससे समस्या और भयावह हो गई है। इस पाबंदी का असर मुस्लिम समुदाय के अलावा चमड़ा कारोबार से जुड़े कुछ दलित समुदायों पर भी पड़ा है। चमड़ा और मीट उद्योग में बड़े पैमाने पर मुस्लिम समुदाय सक्रिय है लेकिन हिंदुओं की कुछ जातियां भी मवेशियों को मारने, खाल उतारने और चमड़ा कारखानों में जूते, चप्पल और बैग जैसे उत्पाद बनाने के काम में लगी हुई हैं। कई संगठन चमड़े के सामान बनाने वाले इन कारखानों से जुड़े लोगों पर मवेशियों को मारने के आरोप लगाते रहे हैं। इसे लेकर मवेशियों के कारोबारियों के साथ मारपीट के भी कई मामले सामने आए हैं। पिटाई के कुछ मामलों में पशु कारोबारियों की मौत हो जाने के बाद से खौफ का माहौल बना हुआ है।
भारत में मीट एवं चमड़ा कारोबार मुख्य रूप से अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा है। इस कारण अवैध बूचडख़ानों पर रोक और मारने के लिए पशुओं की बिक्री को प्रतिबंधित किए जाने के असर का अंदाजा लगा पाना काफी मुश्किल है। लेकिन इतना जरूर है कि मवेशियों की खरीद-फरोख्त का धंधा काफी मंदा हो गया है और चमड़ा कारखानों को कच्चा माल नहीं मिल पा रहा है।  नाम ना बताने की शर्त पर एक जूता फैक्ट्री के मालिक ने बताया कि सरकार की नीतियों के कारण हमारा काम बुरी हालत में आ गया है, उनके यहां पहले 70-80 कारीगर काम करते थे लेकिन अब 22 रह गए हैं, वहीं से जानकारी मिली कि जिन बाजारों में 1000 से ज्यादा पशुओं की खरीद-फरोख्त हुआ करती थी अब वो घटकर 100-150 रह गई है। चमड़ा उत्पादन में गिरावट आने का मतलब है कि देश के कुछ सबसे गरीब तबकों के पास रोजगार के अवसर और भी कम हो जाएंगे। आगरा की तंग गलियों में मौजूद जूते बनाने के छोटे कारखानों में काम करने वाले लोग अपने भविष्य को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं। इन लोगों को लग रहा है कि उनका भैंस का कारोबार करना, जूते-चप्पल के लिए चमड़ा खरीदना या अपने पुरखों की तरह चमड़े के धंधे में लगे रहना अब उनके लिए सुरक्षित नहीं रह गया है। उन्हें कट्टरपंथियों का डर सताता है।
मीट कारोबार की तरह भारत के चमड़ा कारोबार में भी पिछले दशक में काफी बढ़ोतरी हुई थी। एक आंकड़े के मुताबिक आगरा के चमड़े के कारखानों में रोजाना करीब 10 लाख जोड़ी जूते-चप्पल बनते हैं जो घरेलू खरीदारों के अलावा यूरोपीय देशों में भी भेजे जाते हैं। इनके खरीदारों में ज़ारा और क्लाक्र्स जैसे बड़े ब्रांड के अलवा बाटा, लिबर्टी, एक्शन भी शामिल हैं। एक अनुमान के अनुसार आगरा की कुल आबादी का 40 फीसदी से ज्यादा हिस्सा किसी ना किसी रुप में चमड़ा उद्योग से जुड़ा हुआ है। भारत दुनिया भर में चमड़े के पांच बड़े उत्पादक देशों में शामिल है। मोदी सरकार चमड़ा उद्योग से प्राप्त राजस्व को वर्ष 2020 तक मौजूदा स्तर से दोगुना करके 27 अरब डॉलर तक ले जाना चाहती थी, लेकिन पिछले महीने चमड़े के लिए गायों और भैंसों को मारने पर रोक लगाने के बाद सरकार के लिए इस लक्ष्य को हासिल कर पाना मुश्किल दिखता है। हालांकि अपनी नीतियाों या धार्मिक तुष्टिकरण के चलते मोदी-योगी सरकार ने इस व्यवसाय से जुड़े कारोबारियों और मजदूरों को भुखमरी के कग़ार पर तो लाकर खड़ा कर ही दिया है, लेकिन मोदी जी और योगी जी, क्या इन लाखों-करोड़ों लोगों की सुध लेना और उनके लिए नए विकल्प पैदा करना आपकी ज़िम्मेदारी नही है। क्या सरकार का काम सत्ता में काबिज़ होते ही अपने एजेंडे को पूरा करना भर है, या फिर मासूम लोगों की चिंता करना भी है ?      

मुख्य संवाददाता
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