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बौद्ध धर्म के प्रति युवा वर्ग ज्यादा रूचि ले रहा है- रमेश गौतम



हमारे साथ हैं धम्म प्रचारक रमेश गौतम, जिन्होंने अपना जीवन बौद्ध धर्म को समर्पित कर दिया है और वो पिछले 30 सालों से धम्म का प्रचार-प्रसार करने में जुटे हुए हैं । पड़ताल की टीम ने गाज़ियाबाद में उनसे बौद्ध धर्म के तमाम पहलुओं पर लंबी बातचीत की ।

रमेश गौतम जी आपको बौद्ध धर्म के प्रति लगाव कैसे हुआ और क्यों अपना जीवन धम्म को समर्पित कर दिया ?
इतिहास बताता है कि पिछले 5 हजार साल से हिन्दू धर्म में दलित प्रताड़ना का सामना करते आ रहे हैं, जब मैंने बाबा साहब, संत श्री गुरू रविदास और महात्मा ज्योतिबा फूले को पढ़ा और अपने इतिहास को जाना तो मुझे ये महसूस हुआ कि मैं अपने समाज के युवाओं को भी इतिहास के प्रति जागरुक करूं ।  बौद्ध धम्म दीक्षा समारोह संघ के माध्यम से हम पूरे देशभर में घूम-घूम कर बौद्ध धर्म और अपने महापुरुषों के बारे में बताते हैं और उनका मान सम्मान, स्वाभिमान जगाने की कोशिश कर रहे हैं।

आपको क्या महसूस होता है कि इससे दलित समाज लाभांवित हो रहा है ?
जी हां बिल्कुल, लोग जागरूक हो रहे हैं और लगातार बौद्ध धर्म ग्रहण भी कर रहे हैं । सबसे हैरान करने वाली बात मैं आपको बता दूं कि युवा वर्ग इसमें ज्यादा रूचि ले रहा है और यही हमारी सफलता है और उद्देश्य है ।

आपके कैडर कैंप में किस समाज के लोग ज्यादा हिस्सा लेते हैं ?
अधिकांश लोग दलित समाज से ही होते हैं। पिछड़े समाज के लोग भी खासी रूचि लेने लगे हैं और हमें समर्थन दे रहे हैं, उनमें भी चेतना आ रही है ।
 
आपको इसके लिए आर्थिक सहायता कहां से मिलती है ?
हमारा समाज बहुत मेहनती और ईमानदार है ।  जिन लोगों को मान,सम्मान और स्वाभिमान जाग जाता है वही लोग इस क्रांति को आगे बढ़ाने में तन-मन और धन से पूरा सहयोगा करते हैं । हम जहां भी जाते हैं हमें बहुत सम्मान मिलता है ।

क्या ये सही है कि बेशक बड़ी संख्या में लोगों ने बौद्ध धर्म अपनाया है, लेकिन वो आज भी अंधविश्वास से खुद को बाहर नहीं निकाल पा रहे हैं ?
मेरा मानना है कि ऐसे लोग एक फीसदी होंगे । ऐसा इसलिए है कि एक ही घर में अलग-अलग विचारों के लोग बसते हैं, जिसका स्वाभिमान जाग गया वो बौद्ध हो गया और जिसका नहीं जागा वो अंधविश्वास के चंगुल से नहीं निकल पा रहे हैं । हम ऐसे ही लोगों में चेतना जगाने की कोशिश कर रहे हैं ।

क्या बौद्ध धर्म अपनाने के बाद आरक्षण के तहत मिलने वाली सुविधाएं समाप्त हो जाती हैं ?
मैं आपको बता दूं कि ऐसा बिल्कुल नहीं है।  3 मार्च 1990 में जब वी पी सिंह प्रधानमंत्री थे उस समय ही ये संसद से पारित किया गया कि अगर कोई हिंदू धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म को अपनाता है तो उसको वही सुविधाएं और आरक्षण का लाभ मिलता रहेगा । बल्कि आपको बुद्धिष्ट देशों का भी साथ मिलता है ।

जब कोई दलित बौद्ध धर्म अपनाता है तो उसके लिए स्थितियां किस तरह बदलती हैं । उदाहरण के लिए जैसे कोई इसाई धर्म अपनाता है तो उस परिवार के बच्चों के लिए कम से कम अच्छी शिक्षा के लिए दरवाजे खुल जाते हैं ।  क्या बौद्ध धर्म में ऐसी कोई व्यवस्था है ?
1954  में बाबा साहब ने भारतीय बौद्ध महासभा की स्थापना की थी, जिसके माध्यम से पूरे देश में काफी संख्या में स्कूल-कॉलेज खोले गए थे और अब भी ये प्रयास जारी है, जिससे कि बच्चों को अच्छी शिक्षा दी जा सके ।


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