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मैं अपने बचपन को उठाकर दिल्ली तक ले आया : डॉ. श्यौराज सिंह बेचैन


डॉ. श्यौराज सिंह बेचैन
हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता जगत में सशक्त हस्ताक्षर के रूप में एक चर्चित नाम हैं। संघर्षशील व्यक्तित्व डॉ. बेचैन ने बचपन में कष्ट झेलते हुए ये सिद्ध कर दिखाया कि परिश्रम एवं संघर्ष के बल पर कुछ भी हासिल किया जा सकता है । 5 जनवरी 1960 को उत्तर प्रदेश में बदायूं जिले के नदरोली गांव में जन्में डॉ. बेचैन वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं और हिन्दी दलित साहित्य लेखन के साथ-साथ राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में दलित मुंद्दों पर निरंतर लिख रहे हैं । ‘पड़ताल’ की टीम ने डॉ. श्यौराज सिंह बेचैन से उनके संघर्षमय जीवन, साहित्यिक यात्रा और विचारों के विभिन्न पहलुओं पर विशेष बातचीत की । पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश ।  

डॉ. बेचैन जी आपने बचपन से ही बहुत संघर्ष किया है, ऐसी कुछ खास यादें भी होंगी, जिन्हें आप साझा कर सकें ?
मुझे दरअसल पढ़ने का बचपन से ही बहुत शौक था, जब मेरी मां की दूसरी शादी होने वाली थी तो मुझे दिल्ली मेरी मौसी के घर भेज दिया गया, जहां पर मैं घर-घर जाकर नींबू बेचता था और नींबू के ऊपर कुछ गुन-गुनाता रहता था...नींबू ले लो, नींबू ले लो, एक आने के दो ले लो, वो लोगों को बहुत पसंद आता था ।  कई लोग मेरा बनाया हुआ वो गाना सुनकर बहुत हैरान होते थे और मुझसे बोलते थे कि तुम पढ़ाई क्यों नहीं करते । वो मेरे मौसा जी से आकर बोलते कि ये लड़का बड़ा होनहार है इसे स्कूल भेजिए,  मौसा जी मुझे स्कूल भेजने के लिए तैयार हो गए । उन्होंने मुझसे बोला ठीक है तुम दोपहर 12 बजे तक नींबू बेचा करो और उसके बाद स्कूल जाया करो, मेरा स्कूल में दाखिला करा दिया गया, लेकिन मैं स्कूल जाने में कई बार लेट हो जाता था, जिसकी शिकायत मौसा जी तक पहुंची और मेरा स्कूल जाना बंद हो गया । एक बार गांव के ही एक कार्यक्रम में मैंने कुछ तुकबंदी करते हुए कविता पढ़ी उससे सब बड़े हैरान हुए, क्योंकि वहां बैठे अध्यापक तक ऐसी तुकबंदी नहीं कर पाए थे, जिससे वहां पर आए हुए एक अन्य अध्यापक प्रेमपाल सिंह मुझसे बहुत प्रभावित हुए और बोले कि तुम स्कूल क्यों नहीं जाते तुम बहुत होनहार हो । तुम तो हमारे गांव का बहुत नाम रौशन करोगे, लेकिन मैंने उनसे कहा कि मुझे पढ़ाई नहीं रोटी चाहिए । वो बात मुझे हमेशा याद आती है और मेरी रोटी की समस्या मेरे जवान होने तक बनी रही, जो बीए, एमए तक मेरे साथ चली ।  

डॉ. बेचैन जी आपकी आत्मकथा
“बचपन मेरे कंधों पर”  बहुत चर्चित रही है, उसे लिखने की प्रेरणा कैसे और क्यों मिली ?  
देखिए मेरा बचपन का सफर बहुत कष्टकारी रहा है और बहुत ही संघर्ष में बीता है उसके बारे में चर्चा करने के लिए मुझे अलग से एक लंबा साक्षात्कार देना होगा, मेरे लिए ये और कष्टकर है कि मेरे जैसा जीवन जीने वाले बच्चें यहां बहुत दिखाई देते हैं, लेकिन मैं अपने बचपन को उठाकर दिल्ली तक ले आया, लेकिन ऐसी स्थिति में सभी बच्चे नहीं आ पा रहे हैं, क्योंकि उनके लिए कोई चिंतित भी नहीं है । उनके बचपन और भविष्य के बारे में कोई सोचना नहीं चाहता है । इसीलिए मैंने अपनी बचपन की पीड़ा को लिखित रूप दिया है, जिससे समाज की संवेदनशीलता जागे, और ऐसे बचपन और ना पैदा हों ।  

आपको क्या लगता है कि हिन्दी दलित साहित्य को उस रूप में मान्यता मिली है, जो उसे  मिलनी चाहिए
?  
मझे लगता है कि हर जगह दलित साहित्य का संघर्ष चल रहा है और हमारी करीब 25 साल की लड़ाई का नतीजा ये निकला है कि लगभग सभी विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में दलित साहित्य आ गया । ये अलग बात है कि कहीं बहुत कम है और कहीं ज़्यादा पढ़ाया जा रहा है । दलित साहित्य अपनी जगह बना रहा है।  

जानकारी के अनुसार जेएनयू में आपने 3 साल तक दाखिले की कोशिश की, लेकिन नहीं मिल पाया, जिससे आप बहुत आहत हुए थे
?  
जेएनयू  में मैंने 3 साल तक कोशिश की, लेकिन मुझे दाखिला नहीं दिया गया ।  आज उसी जेएनयू में मेरे ऊपर 3 एमफिल हो चुकी हैं, 1 पीएचडी हो रही है । इसके अलावा कई विश्वविद्यालयों में मेरे साहित्य पर 8  पीएचडी और करीब 25 एमफिल हो चुकी हैं ।     

दलितों के ऊपर दलितों के द्वारा बहुत सारा और बेहतरीन साहित्य लिखा गया है, लेकिन क्या कारण हैं कि आज तक 1 भी दलित साहित्यकार को साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं दिया गया है, बल्कि इसके अलावा भी दलितों को पुरस्कार देने में पक्षपात किया जाता है
?  
सबसे पहले तो साहित्य अकादमी में ये हिन्दी में 1 ही पुरस्कार रखते हैं । मैंने ये आवाज भी कई बार उठाई है कि दलितों को साहित्य अकादमी पुरस्कार क्यों नहीं दिए जाते या फिर इन पुरस्कारों की संख्या बढ़ाओ । सभी अकादमियों को करोड़ों रुपये भारत सरकार से दिए जाते हैं, लेकिन दलितों को इसका 1 फीसदी भी नहीं दिया जाता है ।  

दलित साहित्यकारों में एकजुटता का अभाव और धड़ों में बंटे हुए दिखते हैं । इसके पीछे क्या कारण मानते हैं
?  
इसमें मुख्य कारण है कि कुछ लोगों में ईर्ष्या बहुत होती है, कुछ को ये लगता है कि मैं तो यहां 20 साल से मेहनत कर रहा था, लेकिन ये 10 साल में ही स्थापित हो गया । ऐसे में वो ये फैलाएगा कि ये होगा बड़ा, लेकिन मैं तो नहीं मानता । इसलिए हमें बड़ों का सम्मान और उभरते हुए नव युवकों के लिए प्यार की भावना रखनी चाहिए ।  

दलितों के अपने प्रकाशन नहीं है, जिसका खामियाजा उभरते साहित्यकारों को उठाना पड़ता है । क्योंकि जो बड़े प्रकाशन हैं वो नए लोगों को छापना नहीं चाहते ।  ऐसे में स्थापित हो चुके दलित साहित्याकारों का उनके लिए समर्थन रहता है
?  
सरकारी प्रकाशन बहुत कम हैं, इसलिए हम लोगों को निजी प्रकाशनों के भरोसे ही रहना पड़ता है, इसके लिए हम सभी समर्थ लोगों को सामने आकर अपने प्रकाशन खड़े करने की कोशिश करनी चाहिए । पैसा जुटाकर नए लोगों की किताबें छपवाने की कोशिश करनी चाहिए । इस बारे में कई लोगों की बातचीत भी हुई है ।  

उभरते दलित साहित्यकारों को बढ़ावा देने के लिए स्थापित हो चुके दलित साहित्यकारों ने कुछ काम किया है या क्या करना चाहिए
?  
हमने ऐसी जरूरत महसूस की थी जिसके लिए कई बार बैठकें भी हुई हैं, जिसमें भाषा शिविर भी लगाने की बात हुई थी । क्योंकि आपके पास कहने को बहुत कुछ होता है, लेकिन सही भाषा में नहीं कह पाते । इसके लिए कोशिश करते रहना चाहिए ।  

वर्तमान बहुजन राजनीति के बारे में क्या सोचते हैं
?   
इसमें मेरा आंकलन ये है कि अगर आप विचारधारा को लेकर चलते हैं और आप बाबा साहब को मानते हैं तो उनका कहना था कि पहले आप सामाजिक जागृति का काम करें या फिर राजनीति के साथ साथ समाज को जागृत करने का काम भी करना चाहिए।  मुझे लगता है कि अभी दलितों के अधिकारों की लड़ाई जारी है, क्योंकि दलितों को स्वराज मिला नहीं है । हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जिन लोगों ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी, उनमें एक भी ऐसा नहीं है, जिसने अखबार या पत्रिका नहीं निकाली हो, पत्रकारिता नहीं की हो । क्योंकि बिना विचार के ना तो क्रांति होती, ना सुधार होता है और ना ही बदलाव होता है । दूसरों के मंच से आप विचार आगे नहीं पहुंचा सकते । इसलिए हमें मंच तैयार करने होंगे । मुझे इस बात का बहुत दुख है कि हमारे दलित नेता इस बात से आंखे मूंदे हुए हैं कि उसे कुछ बौद्धिक काम भी करना है । मुझे लगता है एक भी दलित नेता ऐसा नहीं है जो दलित साहित्यकारों को या दलित पत्रकारों को तवज्जों देता हो । ऐसे हालातों में कोई पार्टी जीत जाती है तो ये मेरे लिए ताज्जुब की बात होगी ।  अगर हार रही है तो ये मेरे लिए कोई ताज्जुब की बात नहीं है, ऐसे में ये नेता दलित राजनीति को आत्महत्या की तरफ बढ़ाने पर मज़बूर कर रहे हैं । दरअसल मुझे लगता है कि दलित बच्चों के पास दोहरा ज्ञान रहता है, क्योंकि परंपरागत पाठ्यक्रम में तो सामान्य वर्ग के विद्वान ही पढ़ाए जाते हैं, लेकिन जो दलित छात्र होते हैं वो उनके साथ-साथ दलित साहित्य को भी पढ़ते हैं, जिससे उनको दोहरा ज्ञान हो जाता है, लेकिन दूसरे छात्रों का ये नुकसान होता है कि वो दूसरों को नहीं पढ़ना चाहते ।  ज्ञान के क्षेत्र में मुझे दलित ज्यादा शार्प दिखते हैं ।  

पड़ताल.कॉम के लिए आपका क्या कहना है
?
मैं उम्मीद करता हूं कि ये बहुत ही शिक्षाप्रद और जागृति का काम लाने वाला साबित होगा आज के दौर में हमारे समाज को इसकी बहुत जरूरत है । आप समाज के लिए ये बहुत ही अच्छा काम कर रहे हैं, क्योंकि बाबा साहब चाहते थे कि समाज को जागरूक करना बहुत जरूरी है अगर हम उन्हें जागरूक नहीं कर पाएंगे तो संविधान में कितने भी अधिकार या सुविधाएं सुनिशिचत करके रख दी जाएं, लेकिन उनका कोई फायदा नहीं मिल पाएगा ।  ये सबकुछ पाने के लिए मीडिया अमोघ अस्त्र है, इसको आप आगे बढ़ा रहे हैं इसके लिए आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं ।    


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