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एक दिन शब्बीरपुर गांव में ...

अत्याचारियों के यहां पर काम करने की मज़बूरी
शब्बीरपुर हमें एक ऐसे हिंदुस्तान की तस्वीर दिखाता है जो बहुत परेशान करने वाली है, गांव के ज्यादातर दलित ठाकुरों के खेतों में काम करते हैं और उसी से उनकी रोजी-रोटी चलती है, इसके अलावा जो ठाकुरों के खेतों में बुवाई का काम करते हैं जिसके एवज़ में उन्हें अनाज या पैसा मिलता है लेकिन 5 मई को हुई हिंसा और आगजनी के बाद इन परिवारों पर रोजी रोटी का संकट आ गया है, ठाकुरों ने जितनी क्रुरता 5 मई को दिखाई अब उससे भी ज्यादा क्रुर हो गए हैं वे दलितों को बकाया पैसा और अनाज नही दे रहे हैं और दुत्कार कर रहे हैं। सारा काम विश्वास पर चल रहा था कोई लिखा पढ़ी नही, ऐसे में वे किस से शिकायत करें और कहां गुहार लगाएं।  हालांकि कुछ लोगों को बकाया पैसा मिल गया है, और उन्होंने खेतों में काम करना भी शुरू कर दिया है लेकिन इसमें भी परेशानी ये है कि जो लोग मिशन को आगे बढ़ाते दिखते हैं उनका पैसा अभी भी फंसा हुआ है । जब ठाकुर बिरादरी के लोगों से इस बारे में बात हुई तो वे भी मानते हैं कि ना तो उनका गुजारा हमारे बगैर है और ना ही हमारा उनके बगैर, सबकी मेहनत का पैसा जल्द ही वापस कर दिया जाएगा, और वे खुद भी चाहते हैं कि जल्द से जल्द हालात सामान्य हो जाएं। क्योंकि इसमें सबका नुकसान है।

आखिर दो परिवार सबसे ज्यादा बर्बरता के शिकार क्यों हुए ?
शब्बीरपुर में दो परिवार ऐसे थे जिनके साथ सबसे ज्यादा बर्बरता हुई, अब सवाल ये उठता है कि पूरे गांव में सबसे ज्यादा बर्बरता दो परिवारों के साथ ही क्यों की गई। इसके भी अपने अपने कारण हैं एक परिवार है अग्नि भास्कर जी का, अग्नि भास्कर जी अंबेडकरवादी हैं समाज सेवा के कामों में हमेशा आगे रहते हैं, गांव के रविदास मंदिर में बाबा साहब अंबेडकर जी को जो प्रतिमा लगनी थी उसे स्थापित करवाने के लिए सबसे ज्यादा प्रयास अग्नि जी ही कर रहे थे। अग्नि भास्कर जी को चार बेटियों के बाद पांचवां बेटा हुआ था जिसे दंगाईयों ने आग में फैंकने की कोशिश की, लेकिन उनकी पत्नी ने अपने जान दांव पर लगाकर बच्चे को बचाया, उसके बाद जो हैवानियत उनकी पत्नी के साथ हुई उसे देखकर शैतान का भी दिल दहल जाए, तलवार से उनके स्तन काटने की कोशिश की गई, जब उन्होंने अंदर कमरे में भागकर खुद को बचाया, उस कमरे के दरवाजे पर तलवार के निशान आज भी देखे जा सकते हैं। अग्नि भास्कर जी की माता जी रोते हुए बताती हैं कि उन्होंने किसी औरत, बड़े बूढ़े का लिहाज नही किया, मुझे भी मारा और सीढ़ियों से धक्का  दे दिया जिससे उनकी कुहनी में गंभीर चोट आई। उनकी छोटी बहु मीनाक्षी नौ महीने के गर्भ से थी, जिसके पेट पर तलवार मारने की कोशिश की, लेकिन उसने अपने पेट पर बड़ा पतीला रख कर खुद को बचाया। दूसरा परिवार था दल सिंह जी का जिनके घर में शादी हुई थी, दो बहुओं का सामान, शादी में मिली दो मोटरसाइकिलें और दो पहले से खड़ीं थी चारों मोटरसाइकिलों को आग के हवाले कर दिया गया, शादी में मिला सारा सामान अलमारी, टीवी, बर्तन, फ्रिज, पंखा सबकुछ जला दिया गया, इस घर में इतनी भयानक आगजनी की गई थी कि आग की लपटों से मकान की छत तक गिर गई। शायद सवर्ण मानसिकता के लोगों को दलितों की संपन्नता बर्दाश्त नही हो रही है, वो आज भी दलित को उसी रुप में देखना चाहते हैं जैसा सदियों से उसे रखते हुए आए हैं, वो उसे सिर्फ अपनी सेवा और दासता में ही रखना चाहते हैं। और नही चाहते कि वो किसी भी तरीके से उनके बराबर दिखे। इस मुद्दे पर जाने माने समाज शास्त्री डॉक्टर एन सिंह कहते हैं दलितों की संपन्नता सवर्ण जातियों को चुभती है इसलिए दलित समाज की रीढ़ तोड़ने की कोशिशें की जा रही हैं।

क्या हुआ राहुल गांधी के मासूम से किए गए वायदे का ?
उस मासूम बच्चे का नाम बादल है जिससे राहुल गांधी ने घर बनवाने का वायदा किया था, आपको याद होगा जब राहुल गांधी शब्बीर पुर के पीड़ितों से मिले थे तो उस दौरान राहुल गांधी ने एक बच्चे से भी मुलाकात की थी जिसका नाम बादल है, बादल उन्हीं दल सिंह जी का पोता है जिनके पूरा घर और सामान जलाकर राख कर दिया गया था। उस समय मासूम बादल ने राहुल गांधी से कहा था कि हमरा घर बनवा दीजीए, और  चंद्रशेखर जी को कुछ मत होने दीजीएगा, वो बहुत अच्छे हैं।  और राहुल गांधी ने उसी समय सहारनपुर के कांग्रेस पदाधिकारियों को निर्देश दिए थे कि इस बच्चे का घर जल्द से जल्द बनवाया जाए लेकिन वो वादा आज भी बांट जोह रहा है। राहुल गांधी के इस प्रकरण को मीडिया में खूब दिखाया गया था। लेकिन सिर्फ प्रचार किया गया उस बच्चे का घर आज तक नही बना, राहुल गांधी आदेश देकर भूल गए और पदाधिकारी राहुल गांधी के जाने के बाद सबकुछ भूल गए। वो घर वैसा का वैसा ही पड़ा है और बच्चे के साथ वादा खिलाफी तो शायद राहुल को याद भी ना हो। मासूम ने तो प्यार भरी बातों के बीच खेल-खेल में बोल दिया, पर उसे क्या पता की राजनीतिज्ञों को तो खेलने की आदत होती है। वो बड़ों-बड़ों के साथ खेल कर देते हैं फिर बच्चे की तो बात ही क्या, लेकिन उस मासूम के कोमल मन पर आपकी वायदाखिलाफी की क्या छाप पड़ेगी, ये बताने की नही, दुखी करने की बात है।            

पिछले 90 साल में इतनी नफ़रत कभी नही देखी गई।
गांव के बुजूर्ग बताते हैं कि इतनी नफरत और हिंसा हमने पिछले 90 साल में कभी नही देखी, सब मिलजुलकर रहते आए हैं, कभी कोई परेशानी नही हुई, कभी हिंदु-मुस्लिम या जाति-पाति नही दिखी लेकिन जब से योगी सरकार बनी है तब से गांव में आरएसएस के शिविर चलने लगे हैं, महाराणा प्रताप की जयंती का आयोजन भी पहली बार ही हो रहा था। जिस दिन हमला हुआ, उस दिन दंगाई नारे लगा रहे थे, जय श्रीराम और मोदी-योगी जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे, केसरिया गमछे पहने हुए थे।

गाय माता को भी नही बख्शा।
गाय को माता कहने वालों ने गाय को भी जाति में बांट दिया, दलित पदम सिंह की गाय को भी दलित बना दिया गया और उसका एक पैर काट दिया। जो ना तो जी पा रही है और ना ही प्राण छोड़ पा रही है आखिर सोचती होगी कि क्या दलित के घर में आने से मेरी भी जाति बदल जाती है, ढूंढती होगी उस हैवान के चेहरे को और मांगना चाहती होगी उससे जवाब। लेकिन हैवानियत का कोई चेहरा नही होता, जो नफरत से बना होता है और रुप बदल कर आता है और अपनी सड़ी हुई गंदी सोच के साथ हैवानियत को अंजाम देकर उसी शरण में चला जाता है जहां से उसकी सोच बनती बिगड़ती है।  उसके जहन में तो सदियों से चली आ रही जाति की नफरत काम कर रही है वो किसी का भी सगा नही है ना तो धर्म का, ना देश का और ना गाय माता का।

स्कूल मास्टरों ने किया अक्षम्य अपराध।
 अमन कुमार ने बताया कि शब्बीरपुर में एक मात्र सरकारी स्कूल है जो ठाकुरों की बस्ती में है। 5 मई को भी रोजमर्रा की तरह स्कूल चल रहा था। स्कूल में पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चे दलित हैं और पढ़ाने वाले मास्टर ठाकुर। जैसे ही स्कूल में झगड़ा फैलने की खबर पहुंची, मास्टरों ने बच्चों की छुट्टी कर दी जिससे कई बच्चे हिंसा और आगजनी की चपेट में आ गए और घायल हो गए। वहीं ठाकुर परिवार की कई महिलाओं ने मानवीयता दिखाई और कुछ मासूम बच्चों को अपने घरों में शरण दी और बाद में उन्हें उनके घरों में भेजा। ऐसे में सवाल ये उठता है कि गांव जब गांव की घरेलू महिलाएं ये महसूस कर सकती हैं कि बच्चों को अभी बाहर भेजना सही नही है तो मास्टरों को ये बात क्यों समझ नही आ सकी, कहीं ऐसा तो नहीं कि उनके दिमाग में भी जाति घूम गई हो और जानबूझकर बच्चों को नुकसान पहुंचाने के इरादे से स्कूल से बाहर भेज दिया गया था।    


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