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दलित बेटी रिया बनी पीएचडी प्रवेश परिक्षा टॉपर

नई दिल्ली- 10 मई 2017,   शिक्षण संस्थानों और बड़े शिक्षण कोर्सों को अपनी बपौती मानने वालों के भ्रम दलितों ने तोड़ दिये हैं,  अब दलित वर्ग के लोग टॉप कर रहे हैं और वो भी सवर्णों को पछाड़कर। कुछ दिन पहले आईआईटी-जेईई की मेंस परीक्षा में दलित छात्र कल्पित वीरवाल ने 360 में से 360 नंबर लाकर पूरे देश को आश्चर्यचकित कर दिया था। अब ऐसा ही किया है गाजियाबाद की दलित छात्रा रिया सिंह ने।  रिया सिंह ने टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस मुंबई के पीएचडी प्रवेश परीक्षा में मेरिटधारियों को पछाड़कर पहला स्थान प्राप्त किया है। वह अपना रिसर्च महिला अध्ययन में करेंगी। आप भी जानिए रिया सिंह की कहानी उन्हीं की जुबानी कि कैसे उन्होंने देश के संस्थानों में जातिगत भेदभाव को झेलते हुए मेरिट धारियों को पछाड़कर सफलता हासिल की.... "मेरी शुरुआती शिक्षा दिल्ली-ग़ज़ियाबाद के इलाके में हुई। ग्रेजुएशन के लिए मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्रीराम कॉलेज में दाखिला लिया और ये बताना चाहूंगी कि दाखिला प्रवेश परीक्षा द्वारा हुआ। मैंने ये बताना इसलिए ज़रूरी समझा क्योंकि सवर्ण लोग यह मानते हैं कि दलितों में सवर्णों जितना टैलेंट नहीं होता। खैर यही वो जगह है जहां मैंने पहली बार शिक्षा संस्थानों में हो रहे जातिगत भेदभाव को महसूस किया। मैं यह भी बताना चाहूंगी कि यहां के छात्रों और प्रोफेसर्स में जातिगत भेदभाव इतना भरा था कि इस कॉलेज से मेरी एक ही दोस्त हुई जो खुद भी दलित वर्ग से आती है। यहां के सवर्ण छात्रों की सोच आरक्षण के प्रति बहुत ही घटिया है। उसके बाद पोस्ट ग्रेजुएशन की पढाई के लिए मैं टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज मुंबई गई और अभी फिलहाल दिल्ली के आंबेडकर विश्वविद्यालय से एम.फिल कर रही हूं। हर संस्थान में मुझे अलग-अलग प्रकार से किए जाने वाले जातिगत भेदभाव का दंश झेलना पड़ा। मेरे माता-पिता उत्तर प्रदेश के पास के एक गांव से हैं और हम दिल्ली के पास स्थित गाजियाबाद जिले में रहते हैं। अब मैं पीएचडी में एडमिशन लेने जा रही हूं। मैं लिखने और शोध करने को जातिगत भेदभाव के खिलाफ लड़ने का और संगठित होने का एक माध्यम मानती हूं।  मेरे लिए पीएचडी सिर्फ एक मात्र 'डिग्री' नहीं है, बल्कि ये मेरा राजनीतिक विरोध है। इसके माध्यम से मेरा इरादा उन जगहों पर पहुंचना है जहां से हमारी जाति के लोगो को वंचित रखा गया है और अभी भी दलितों को शिक्षा से दूर रखने की निरंतर कोशिशें की जाती हैं। जैसा कि बाबासाहेब ने कहा है, "यह शिक्षा ही है जिसे सामाजिक दासता खत्म करने के हथियार के रूप में प्रयोग में लाया जा सकता है और शिक्षा के माध्यम से ही कमजोर और दलित वर्ग के लोग की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर सकते हैं। रिया का कहना है कि मेरा पीएचडी करना उस सोच को टक्कर देना है जो यह मानती है कि दलित वर्ग के लोग कमज़ोर और अनपढ़ होते हैं और वो आरक्षण के बिना कुछ नही कर सकते। मैं भविष्य में अपने आप को शिक्षा संस्थानों में ही देखने का सपना रखती हूं। एक प्रोफेसर के रूप में मेरा रिसर्च जाति, लिंग और शादी पर है और मैं वही पढ़ाना चाहूंगी।  

मुख्य संवाददाता
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