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गुमनाम नायकों की आड़ में किया गया संघियों को ‘पद्म सम्मान’ से विभूषित



विदित हो कि पद्म सम्मान भारत सरकार द्वारा शासकीय सेवकों व अन्य भारतीयों को किसी भी क्षेत्र में असाधारण और विशिष्ट सेवा के लिए पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री नामक पद्म सम्मान (पुरस्कार) प्रदान किए जाते हैं। पद्म पुरस्कारों की सिफारिशें राज्य सरकारों/संघ राज्य प्रशासनों, केन्द्रीय मंत्रालयों/विभागों, उत्कृष्टता संस्थानों आदि से प्राप्त की जाती हैं, जिन पर पुरस्कार समिति द्वारा विचार किया जाता है। पुरस्कार समिति की सिफारिश के आधार पर और प्रधानमंत्री, गृहमंत्री तथा राष्ट्रपति के अनुमोदन के बाद गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर इन पद्म सम्मानों की घोषणा की जाती है। परन्तु 2018 में सामान्य नागरिकों को ये सम्मान देने की प्रक्रिया में कुछ बदलाव किया गया।

वर्ष 2018 में, भारतीय समाचार एजेंसी भाषा द्वारा जारी और नई दिल्ली से एक प्रमुख समाचार पत्र नवभारत टाइम्स में प्रकाशित समाचार के अनुसार केन्द्र सरकार के गृह मन्त्रालय ने पद्म पुरस्कार देने की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से आवेदन-पत्र प्रस्तुत करने हेतु संशोधित प्रपत्र जारी किया है। इस प्रपत्र में आवेदक के बारे में मूलभूत सूचनाओं के अलावा कला, खेलकूद, सामाजिक कार्य जैसे क्षेत्रों में उनकी गतिविधियों और सम्बन्धित क्षेत्रों में उनके द्वारा प्राप्त की गयी उपलब्धियों के बारे में आलेख के रूप में जानकारी माँगी गयी।

पद्म पुरस्कार भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कारों में से एक हैं। ये पुरस्कार, विभिन्न क्षेत्रों जैसे कला, समाज सेवा, लोक-कार्य, विज्ञान और इंजीनियरी, व्यापार और उद्योग, चिकित्सा, साहित्य और शिक्षा, खेल-कूद, सिविल सेवा इत्यादि के संबंध में प्रदान किए जाते हैं।

ये पुरस्कार प्रत्येक वर्ष गणतंत्र दिवस के अवसर पर उद्घोषित किये जाते हैं तथा सामान्यतः मार्च/अप्रैल माह में राष्ट्रपति भवन में आयोजित किये जाने वाले सम्मान समारोह में भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किये जाते हैं।इस साल के पद्म सम्मान में गुमनाम नायकों  को पद्म सम्मान देने की प्रक्रिया तो बेशक सराहनीय कही जा सकती है किंतु इनके अलावा सरकार ने अपने करीबी कुछ संघियों को भी सम्मान दिए हैं, इसे क्या कहा जाना चाहिए? इन संघियों की भूमिका महज इतनी है इन्होंन देश के विचिन्न हिस्सों में संघ की विचारधारा का ही प्रचार प्रसार किया, समग्र समाज और देश हित में कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया। इनके चयन में सरकार ने निर्धारित मापदण्डों को जैसे ताक पर उठा कर रख दिया। इससे तो ऐसा ही लगता है कि कुछ संघियों को सम्मानित करने की प्रक्रिया को कवर करने के लिए ही शायद सरकार ने समाज के गुमनाम नायकों को सम्मानित करने का निर्णय लिया हो।

इस पर विवाद उठना स्वभाविक ही है। स्पष्ट है कि सरकार द्वारा संघियों यानी कि अपने करीबियों को पद्म सम्मान दिए जाने से सीधा संदेश जा रहा है कि सरकार अपने वैचारिक समानता वाले लोगों को सम्मान दे रही है। कहा जा रहा है कि पद्म सम्मान में पी एम मोदी की मनमानी की पूरी छाप दिखी। मोदी शुरू से ही कहते रहे हैं कि कांग्रेस के शासन काल में दक्षिणपंथ के विचारकों को उचित जगह नहीं मिली। तभी इस बार संघ के कई प्रचारकों के नाम पद्म सम्मान की सूची में हैं जिनमें ज्यादातर दक्षिण भारत के ही हैं। यहाँ यह सवाल भी उठाया जा सकता है, ‘भाजपा सरकार किस आधार पर इन संघियों को दक्षिणपंथ के विचारकों से जोड़कर देख रही है?’ 

संघ के सीनियर प्रचारक पी. परमेश्वर को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया है। वे केरल में संघ के पहले प्रचारक हैं। 90 साल के परमेश्वर ने अलग-अलग विषयों पर 25 से ज्यादा किताबें लिखी हैं। जब अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष थे, उस वक्त परमेश्वर इसके अखिल भारतीय उपाध्यक्ष रहे। 1980 में वे दिल्ली से केरल वापस चले गए और वहां भारतीय विचार केंद्र शुरू किया। केरल इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वहां बीजेपी और संघ विस्तार की हर कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में इस सम्मान के पीछे राजनीतिक मतलब निकाले जाना स्वभाविक ही है। संघ के सीनियर प्रचारक और प्रज्ञा प्रवाह के जे. नंदकुमार द्वारा यहाँ कहा जाना कि पी. परमेश्वर का योगदान भारत के लिए अतुल्य है, कितना तर्कसंगत है, समझ से परे है। केवल और केवल संघियों और भाजपाइयों को ही के जे. नंदकुमार का यह कथन रास आ सकता है, किसी और को नहीं।

वहीं संघ की विदेश शाखा हिंदू स्वयंसेवक संघ (एचएसएस) के वेद प्रकाश नंदा को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है। अमेरिका में बसे नंदा डेनवर यूनिवर्सिटी में सीनियर अध्यापक रह चुके हैं। उन्हें प्रवासी भारतीयों में भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए जाना जाता है। यहाँ सवाल उठता है कि क्या संघी संस्कृति को भारतीय संस्कृति के रूप में देखा जा सकता है?

इसके अलावा महाराष्ट्र से एक्टर मनोज जोशी को पद्मश्री से नवाजा गया है। मनोज गुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी के कैंपेन 'मैं विकास हूं'  का चेहरा बने थे।... अब कोई बताए कि भाजपा का चुनाव प्रचार करने वाले व्यक्ति को किस आधार पर समग्र भारत के विकास का सूत्र माना जा सकता है। भाजपा के पास शायद इसका कोई जवाब हो।... हो भी नहीं सकता। 

असम गण परिषद (एजीपी) के अध्यक्ष प्रफुल्ल कुमार महंता की पत्नी जयश्री गोस्वामी महंता को साहित्य और शिक्षा के फील्ड में पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। असम में बीजेपी सरकार में एजीपी भी सहयोगी है। जयश्री गोस्वामी राज्यसभा सदस्य रह चुकी हैं। जयश्री गोस्वामी का यह चयन भी नाराज एजीपी को मनाने की सोची समझी सीधी कोशिश के अलावा और कुछ नहीं।... सरकार चाहे जो कहे। साथ ही दक्षिण के बड़े सुपरस्टार इलैयाराजा को पद्म विभूषण देकर बीजेपी ने दक्षिण में अपने विस्तार की मंशा का संकेत दिया है। दलित समुदाय से आने वाले इस संगीत सुपरस्टार की बीजेपी से नजदीकी की भी खबरें आती रही है। 

क्या किसी को इन संघियों को सम्मानित करने के पीछे कला, समाज सेवा, लोक-कार्य, विज्ञान और इंजीनियरी, व्यापार और उद्योग, चिकित्सा, साहित्य और शिक्षा, खेल-कूद, सिविल सेवा इत्यादि महत्तवपूर्ण कार्य करने की भूमिका दिख रही है?

  लेखक:  तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), दो निबन्ध संग्रह  और अन्य। तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक, आजीवक विजन के प्रधान संपादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)





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