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एक देश-एक चुनाव : संघवाद की खिलाफत

सरकार ने अपने “एक देश – एक चुनाव” वाली निरंकुश सोच को राष्ट्रपति जी के अभिभाषण का हिस्सा बनाकर अपने मंसूबे का खुलासा कर दिया है। सब जानते हैं कि राष्ट्पति के अभिभाषण को अमूमन केन्द्र सरकार की गत उपलब्धियों और आगामी योजनाओं का खुलासा माना जाता है। कहना नाजायज न होगा कि इससे स्वय़ं राष्ट्रपति की ही नहीं, अपितु सरकार की मन:स्थिति का बोध भी होता जाता है। बजट सत्र से पूर्व संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द ने लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ पर जोर दिया। एक तरह से इसे भी केन्द्र सरकार की मंशा से ही जोड़कर देखा जाना चाहिए। ऐसा सोचने में कुछ गलत भी नहीं क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी अपनी इस इच्छा को सार्वजनिक तौर पर अनेक बार व्यक्त कर चुके हैं।

लोकसभा के साथ ही विधानसभा चुनाव कराए जाने की वकालत करने वालों का तर्क है कि इससे समय, धन और संसाधनों की बचत होगी। साथ ही इससे विकास कार्यो को रफ्तार मिलेगी। क्योंकि आचार संहिता से इसमें होने वाली रुकावट और अधिकारियों की बड़ी संख्या में चुनाव में संलग्न होने से विकास के कार्य प्रभावित होते हैं। सुनने में यह बहुत व्यवहारिक और उचित लगता है, लेकिन क्या भारत जैसे संघीय व संवैधानिक ढांचे वाले मुल्क में ऐसा संभव है ? शायद नहीं ! क्योंकि एक साथ चुनाव कराकर जिन हितों को साधने की कोशिश की जा रही है, उनके अत्याधिक जटिल होने की संभावनाएं ज्यादा हैं। अगर समय, धन और संसाधनों की बचत के उद्देश्य से ही ये प्रस्ताव रखा जा रहा है तो फिर इसके पीछे ये भी दलील दी जा सकती है कि हर पांच वर्ष में ही चुनाव क्यों कराए जाएं ?  उनकी समयावधि बढ़ाकर छह-सात वर्ष क्यों न कर दी जाए। इससे समय और धन की बचत तो हो जाएगी, लेकिन कई और समस्याएं खड़ी हो जाएंगी। मसलन अगर इनमें जीत दर्ज करने वाली कोई सियासी पार्टी अच्छा काम नहीं कर रही है और जन अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर रही है तो उसे फिर लोगों को पांच से अधिक वर्षो तक बर्दाश्त करने के लिए विवश होना पड़ेगा। हमारे देश में वैसे ही इसकी संभावनाएं प्रबल हैं क्योंकि चुनावी वादे करके भूलना हमारे नेताओं की आदत में शुमार है। जब उन्हें पांच से अधिक वर्षो तक सत्ता में बने रहने का अवसर मिल जाएगा तो वे जनता और अपने क्षेत्र की तरफ से और भी लापरवाह हो जाएंगे। ऐसे में चुनाव सुधारों की दिशा में अक्सर उठने वाली ये मांग भी बेमानी हो जाएगी कि मतदाताओं को अक्षम जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार प्राप्त होना चाहिए।

आम चुनाव के साथ विधानसभा चुनावों को कराने से पहले उन्हें लेकर आने वाली दिक्कतों का ध्यान रखना ही होगा। एक देश-एक चुनाव के नाम पर जनता के चुनने के विकल्प को खत्म करने की वकालत कैसे की जा सकती है? कहना अतिशयोक्ति नहीं कि सरकार के इस विचार के पीछे निरंकुश व्यवस्था कायम करने की साफ मंशा है। यह भी कि इस विचारधारा के तहत भाजपा समूची राजनीति और सत्ता को केवल एक आदमी, एक पार्टी तक ही सीमित कर देना चाहती है। जो लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था के लिए अत्यंत घातक सिद्ध हो सकती है। असल में विविधता वाले हमारे देश में राजनीतिक परिस्थितियां इसके अनुकूल नहीं हैं। राष्ट्रीय दैनिक जागरण (14.02.2018) में प्रकाशित एक रिपोर्ट की इस बात को कतई नहीं भुलाया जा सकता, “बहु-दलीय राजनीतिक व्यवस्था वाले हमारे देश में जनता के चुनावी मुद्दे एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र, एक राज्य से दूसरे राज्य और फिर राज्य से राष्ट्रीय स्तर तक अलग-अलग हैं। मुद्दों के साथ-साथ उनकी चुनावी प्राथमिकताएं अलग-अलग होती हैं। किसी राज्य में लोग अपने यहां के क्षेत्रीय दलों को पसंद करते हैं तो किसी राज्य के राष्ट्रीय दलों को तरजीह देते हैं। भू-सामाजिक और राजनैतिक वैविधता से लोगों के सामने बहुत से विकल्प खुले होते हैं और जन-मानस अपनी आवश्यकताओं के अनुसार ही अलग-अलग प्रशासनिक स्तर पर दलों का चयन करते हैं। ऐसे में एक साथ चुनाव कराने से क्षेत्रीय दलों को काफी नुकसान होगा और उनकी संभावनाएं क्षीण होती जाएंगी क्योंकि बदली हुई निर्वाचन प्रणाली में राष्ट्रीय मुद्दों और जनभावनाओं का प्रभुत्व होगा। इससे राष्ट्रीय दलों को बेजा फायदा पहुंचेगा।” 

यहाँ यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कई बार किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने और फिर आपस में गठबंधन की सहमति नहीं बन पाने से त्रिशंकु जैसे हालात पैदा हो जाते हैं। एक साथ चुनाव कराने की स्थिति में अगर केंद्र में किसी दल या गठबंधन की सरकार बन जाती है और किसी राज्य में त्रिशंकु परिस्थितियां उत्पन्न हो गईं तो ऐसे में हालात बद से बदतर हो जाएंगे। यही बात केंद्र के लिए भी लागू होती है। ऐसी परिस्थितियों में क्या त्रिशंकु लोकसभा या विधानसभाओं को अगले पांच वर्षो तक फिर से एक साथ चुनाव होने की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी या फिर से फौरन चुनाव करवा कर समय, धन और संसाधनों की बर्बादी की जाएगी। भारतीय संविधान में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के अपने-अपने अधिकार प्रदत्त हैं। इनके अनुसार ही ये कार्य करती हैं और जनहित वाली योजनाओं का सृजन करती हैं। इसके अतिरिक्त शासन का तीसरा स्तर भी है जो स्थानीय निकायों के जरिए चलता है। इसका मकसद स्थानीय स्तर पर योजनाओं को सुचारू रूप से क्रियान्वित करना है। लोकसभा और विधानसभाओं के एक साथ चुनाव करवाने से स्थानीय निकायों में भी इसका प्रयोग किए जाने की मांग उठने लगेगी। इन तथ्यों का मूल्यांकन करने पर स्पष्ट हो जाता है कि एक साथ चुनाव न केवल अव्यवहारिक हैं बल्कि असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक भी है।

राष्ट्रीय दैनिक जागरण (14.02.2018) में ही कृष्ण प्रताप सिंह लिखते हैं, “सरकारें समस्याओं की जटिलताओं में जाकर उनके समाधान के समुचित प्रयासों का रास्ता छोड़कर कहीं न ले जाने वाले सरलीकरणों के बेहिस जुमलों में उलझने और उलझाने लग जाएं तो वही होता है, जो हम इन दिनों प्राय: रोज देख रहे हैं। इनमें ताजा मामला चुनावों से जुड़ा है, जिनकी अरसे से रुकी पड़ी सुधार-प्रक्रिया को किंचित सार्थक ढंग से आगे बढ़ाने के बजाय ‘एक देश-एक चुनाव’ के जुमले को इस तरह आगे किया जा रहा है, जैसे वक्त की सबसे बड़ी जरूरत वही हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो जब भी मन होता है, इस जुमले का जाप करने ही लग जाते हैं, अब उन्होंने अपने इस जाप में राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द को भी शामिल कर लिया है। यों इस जाप के पीछे छिपी नीयत समझने के लिए बहुत बारीकी में जाने की भी जरूरत नहीं और कुछ मोटी-मोटी बातों से ही इसका पता चल जाता है। इनमें पहली बात यह कि अभी तक न देश में एक शिक्षा प्रणाली है, न ही सारे नागरिकों को एक जैसी चिकित्सा सुविधा मिल रही है।” इन सब नाकामियों को छिपाने के लिए  सरकार का ये चुनावी हथकंडा काफी कारगर सिद्ध होगा, ऐसे भाजपा सरकार को लग रहा होगा तभी तो इस मुद्दे को उछालने में ज्यादा ही सक्रिय है।

ऐसे में बार-बार के चुनावों से छुटकारे की बिना पर अगर वह यह कहना चाहती है कि लोग एक बार जिस सरकार को चुन लें, छाती पर मूंग दलने लग जाने पर भी पांच साल तक उसे ढोने को मजबूर रहें तो फिर इसे लोकतांत्रिक कैसे कहा या कैसे सहा जा सकता है? क्यों न इस प्रस्ताव को लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हमला माना जाए ?

 लेखक:  तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), दो निबन्ध संग्रह  और अन्य। तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक, आजीवक विजन के प्रधान संपादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।



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1 Comments

  •  
    Deep chand
    2018-02-19

    Good n effective reporting

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