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महाराष्ट्र का तनाव : दो जनवरी को जागा मीडिया एक जनवरी को कहाँ गया था

इतिहास बताता है कि मुगल-सत्ता के आखिरी दौर में मराठा राज की कमान जैसे ही शिवाजी के वंशजों से छूटकर पेशवाओं के हाथ में गई तो उन्होंने राज्य के बहुतेरे नियम-कानून बदल दिए। पेशवा बाजीराव प्रथम को फिर भी समाज के सभी वर्गों का समर्थन प्राप्त था, लेकिन बाजीराव द्वितीय के राज को ब्राह्मण-राज की तरह ही देखा गया। महाराष्ट्र के कमजोर तबकों पर इस दौर में नाना प्रकार से जुल्म ढहाए जाने के अनेक दुखदायी किस्से कहे जाते हैं। 

 दलित जातियों के पेशवा राज से अलगाव को भांपकर ईस्ट इंडिया कंपनी ने महार रेजिमेंट गठित की, जिसने अब से दो सौ साल पहले पुणे के भीमा-कोरेगांव इलाके में पेशवाई फौजों को हराकर पेशवाशाही की कमर तोड़ दी। कुछ लोग इस घटना को भारत में दलित जागरण का प्रारंभ बिंदु मानते हैं। पारंपरिक चलन अंग्रेजी राज के खिलाफ लड़ने वालों को हीरो मानने और उनकी गलतियों को माफ कर देने का रहा है। किसी जन समुदाय की कोई विपरीत स्मृति उनसे जुड़ी हो तो उसके बने रहने पर भी एतराज नहीं जताया जाता। लेकिन नए राष्ट्रवादी अगर टीपू सुल्तान के खिलाफ गड़े मुर्दे उखाड़ कर लाते हैं तो पेशवाई मामलों में यह सिलसिला दोहराए जाने पर इतना विरोध क्यों कर रहे हैं।

01 जनवरी 2018 को पुणे जिले में भीमा-कोरेगांव की लड़ाई की 200वीं सालगिरह पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कट्टर हिन्दूवादी संगठनों ने युद्ध स्मारक की ओर बढ़ रहे दलितों पर पत्थरबाजी शुरू कर दी थी। खबर है कि शिरूर तहसील स्थित भीमा कोरेगांव में पथराव और तोड़फोड़ की घटनाओं में एक आदमी की मौत भी हो गई। दलितों पर हुई इस हिंसा पर शरद पवार ने कहा, लोग वहां 200 साल से जा रहे हैं। ऐसा कभी नहीं हुआ। सभी को उम्मीद थी कि 200वीं सालगिरह पर ज्यादा लोग जुटेंगे। इस मामले में ज्यादा ध्यान देने की जरूरत थी किंतु प्रदेश प्रशासन ने सुरक्षा की समुचित व्यवस्था नहीं की। डा. भीमराव अंबेडकर के पौत्र प्रकाश अंबेडकर भी उपस्थित थे। घटना के बाद सभी ने बीजेपी पर आरोप लगाए।

यूं तो दलित उत्पीड़न की घटानाएं दलितों के जीवन का अंग बन चुकी हैं। गए दिनों में अनेक ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जो दलित समाज के लिए चिंता पैदा करने वाली हैं। एक - घटना राजस्थान के नागौर जिले के डांगावास की है जहां हथियारों से लैस सैकड़ों लोग दलितों पर टूट पड़े। इन लोगों ने एक ही परिवार के चार लोगों की हत्या कर दी। परिवार की महिलाओं पर भी क्रूरता की गई। जाट बाहुल्य डांगावास में हुई इस वारदात के तीसरे दिन पुलिस केवल एक ही आरोपी को गिरफ्तार कर सकी। दूसरी -  उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के हरेवा में पांच दलित महिलाओं को चार घंटे तक नग्न घुमाने का शर्मनाक काम किया गया... रतलाम में दलित दूल्हे को हमले से बचाने के लिए बड़ी संख्या में पुलिस तैनात की गई। दूल्हे को हेलमेट भी पहनाया गया। किंतु आत्ताइयों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। उल्लेखनीय है कि ऐसी घटनाएं घट जाने के बाद संपन्न लोगों में मानवाताबोध जाग उठता है और चारों तरफ चिंता की लहर दौड़ जाती है। नेताओं में संवेदनशीलता घर कर जाती है...दलितों के पक्ष में घड़ियाली आँसू बहाने लगते हैं सब। घटनास्थल का मुआयना किया जाता है ...असहिष्णु तत्वों के हिंसक कामों की निंदा की जाती है...जाँच आयोग गठित किए जाते हैं किंतु नतीजा शून्य...। और फिर दलित विरोधी अपना काम करने को स्वतंत्र हो जाते हैं।

परिणाम कि दलित उत्पीड़न का सिलसिला आज भी कायम है। कोरेगाँव की घटना इस तथ्य का प्रमाण है। सोचनीय है कि आखिर दलित उत्पीड़न की घटनाओं का प्रतिकार कैसे लिया जाए। इस संदर्भ में बाबा साहेब अम्बेडकर ने स्पष्ट रूप से बताया कि इस प्रकार के अत्याचार वर्ग संघर्ष का नतीजा हैं न कि एक आदमी का दूसरे आदमी के साथ अत्याचार। उनका मानना था कि किसी भी संघर्ष में जीत उन्हीं की होती है जो सामर्थ्यवान होते हैं। कोरेगाँव की ताजा घटना भी यही दर्शाती है।

गौरतलब है कि 01 जनवरी 2018 की त्रासद-घटना को किसी भी भारतीय मीडिया ने शायद इसलिए नहीं दिखाया क्योंकि दलितों पर उनके अपने भाईयों द्वारा ही प्रहार किया गया था किंतु 02.01.2018 को जैसे ही दलितों ने उस घटना के विरोध स्वरूप शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया तो मीडिया की आँखों में खून उतर आया और जब से लेकर आज तक दलितों का विरोध प्रदर्शन मीडिया को सता रहा है... सारा का सारा मीडिया गला फाड़-फाड़ के चिल्लाने में व्यस्त है।  किंतु 01.01.2018 को दलितों पर हमला करने वाले कट्टरवादी संगठनों को लेकर कोई चर्चा नहीं कर रहा है  अपितु जिग्नेश और खालिद को ही इस घटना का दोषी सिद्ध करने पर जोर आजमा रहा है। यहां सवाल उठता है कि दो जनवरी को महाराष्ट्र के तनाव की सुध लेने वाला मीडिया एक जनवरी को कहाँ गया था। हिन्दू - आतंकवादी जब कोरेगाँव जैसी जघन्य घटनाओं को अंजाम देते हैं तो मीडिया चादर तानकर सो जाता है और जब ऐसी घटनाओं के विरोध स्वरूप पीड़ितों द्वारा जन-आन्दोलन चलाया जाता है तो इनकी जुबान आग उगलने लगती है।  

बजरिये नवभारत टाइम्स चन्द्रभूषण जी का यह कहना गलत नहीं लगता कि जो तथाकथित राष्ट्रवादी कल्पना के घोड़े पर सवार होकर देश के दुश्मनों के संहार की हुंकार भरते हैं, वो नहीं जानते कि राष्ट्रवाद हमारे लिए कितनी टेढ़ी चीज रही है। हाल के दो बहुचर्चित मामले रहे हैं। टीपू सुल्तान को 1857 के विद्रोह से लेकर समूची आजादी की लड़ाई में अंग्रेजी राज के खिलाफ एक महानायक ही समझा जाता रहा है। ईस्ट इंडिया कंपनी की फौजों को अगर किसी भारतीय शासक ने कायदे की टक्कर दी और एक समय उसके शासन को संकट में डाल दिया, तो वह टीपू सुल्तान ही था। यह बात किसी और ने नहीं, कई जगहों पर तत्कालीन अंग्रेज अफसरों ने खुद ही बयान कर रखी है। लेकिन फिलहाल देश की सत्ता संभाल रही धारा ने कहीं से खोज-खाजकर यह प्रकरण देश के सामने रखा कि टीपू ने अपने मैसूर राज्य के किसी इलाके में ब्राह्मणों की हत्या करवाई थी, और इस आधार पर उसने हाल में टीपू जयंती समारोह का हिंसक विरोध किया। यानी,  इस धारा के नजरिये से सोचें तो महज अंग्रेजी राज से लड़ाई लड़कर कोई राष्ट्रनायक नहीं हो जाता। अगर उसने अपनी आबादी के किसी हिस्से पर अत्याचार किया है तो इतिहास में घुसकर उससे बदला लिया जाएगा और पलक झपकते उसको खलनायक में बदल दिया जाएगा। चलिए, इस आग्रह को उचित मान लें तो जिस तरह इसको अभी कर्नाटक में लागू किया जा रहा है, उसी तरह पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र में भी लागू किया जाना चाहिए। 

महाराष्ट्र के पुणे में भीमा-कोरेगांव युद्ध की 200 वीं सालगिरह पर हुई हिंसा से पूरे राज्य में तनाव फैल गया है। हिंसा में एक व्यक्ति की मौत के बाद सरकार ने मामले की न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं। फिर भी राजनेताओं के ऐसे बयान आ रहे हैं, जो आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। अक्सर ऐसे हादसों का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए किया जाता है। याद रहे, भीमा-कोरेगांव की लड़ाई 1 जनवरी 1818 को लड़ी गई थी। इस लड़ाई में मुख्यत: दलित महारों को लेकर गठित ईस्ट इंडिया कंपनी की फौज ने पेशवा बाजीराव द्वितीय की फौज को हराया था। दलित इसे ब्राह्मण शासक पर अपनी जीत के रूप में देखते हैं और हर साल इसकी सालगिरह मनाते हैं। लेकिन इधर कुछ लोगों ने इस पर सवाल उठाया और कहा कि यह जीत तो असल में अंग्रेजों की थी, और आजाद भारत में अंग्रेजों की सफलता का जश्न क्यों मनाया जाए। यह विवाद कई सालों से चल रहा है, लेकिन इस बार यह हिंसक टकराव में बदल गया।


पूरे महाराष्ट्र में जन्मा दलित-आक्रोश यह सिद्ध करता है कि आज दलित समाज सामाजिक स्तर पर एक है। ध्यान रहे कि जिस दिन यह समाज राजनीतिक स्तर पर एक हो जाएगा तो चापलूस दलित नेताओं के लिए ही नहीं अपितु किसी भी राजनीतिक दल के लिए एक चुनौती बन जाएगा। यह भी कि अगर समाज अतीत को लेकर आपस में उलझ जाएगा तो सत्ताधारी वर्ग अपने सारे वायदों को ठंडे बस्ते में डालकर चैन की बंसी बजाने लगेगा। इसलिए अब इस प्रकार के दलित-विरोधी टकराव को सुलझाने की कोशिशें की जानी चाहिएं। 

लेखक:  तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), दो निबन्ध संग्रह  और अन्य। तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक, आजीवक विजन के प्रधान संपादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं


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