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आज़ादी के बाद पहली बार दलित की शादी में बजा बैंड-बाजा

देश को आज़ाद हुए 70 साल बीत चुके हैं लेकिन मध्यप्रदेश के एक गांव में दलितों को आज भी अपने शादी-ब्याह में बैंड-बाजा बजाने या घर में रौशनी करने का हक नहीं हैं, इस गांव का नाम है माणा जो मध्यप्रदेश के आगर मालवा जिले में पड़ता है, यहां के दबंग आज भी दलितों को शादी-ब्याह में बैंड-बाजा नही बजाने देते हैं। गांव में दबंगों का इतना खौफ़ है कि इस गांव में दलितों के करीब 55 परिवार हैं जिनमें करीब 2000 लोग रहते हैं लेकिन इन लोगों की इतनी हिम्मत नही हो पाई कि ये लोग अपने शादी ब्याह धूम धड़ाके से कर सकें। लेकिन चंदर मेघवाल ने इस दुस्साहस को चुनौती दे डाली और आज़ादी के बाद पहली बार अपनी बेटी की शादी में बैंड बाजा बजवाया और घर को रौशनी से सजाया।     SDM एस डावर ने बताया कि माणा निवासी चन्दर मेघवाल ने उन्हें एक आवेदन दिया था कि उनकी पुत्री ममता का विवाह राजगढ़ के दिनेश के साथ तय हुआ है और 23 अप्रैल 2017 को वर पक्ष बारात लेकर माणा आने वाला है। लेकिन गांव के दबंगों ने उन्हे धमकी दी है कि गांव में बारात बिना बैंड बाजे के निकलनी चाहिए,  क्योंकि आजादी के बाद से लेकर आज तक कोई भी दलित परिवार शादी में बैंड बाजा नहीं बजा पाया है। इस शिकायत के आधार पर उन्होंने तत्काल सुसनेर अनुविभागीय अधिकारी, पुलिस, तहसीलदार और सुसनेर पुलिस थाना प्रभारी के साथ बैठक की और गांव में दलित परिवार के विवाह समारोह को सुरक्षित संपन्न कराने के लिए तुरंत कार्रवाई करते हुए बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात कर कराया।
रविवार को सुसनेर के वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी तीन थानों के पुलिस बल के साथ पूरी मुस्तैदी के साथ वहां पर मौजूद रहे और निर्धारित समय पर ममता की बारात गांव में आई और बैंड बाजे के साथ बारात चन्दर मेघवाल के घर पहुंची और धूमधाम से ममता का विवाह दिनेश के साथ संपन्न कराया गया। और एक पिता की हिम्मत के कारण दबंगों के दुस्साहस और गढ़ी हुई कुपर्था को धिकारते हुए दलित परिवार की बेटी बैंड-बाजे के साथ विदा हुई।   

मुख्य संवाददाता
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