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मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को दी सलाह 'दलित' शब्द के इस्तेमाल से बचें

 ग्वायलियर- मध्‍य प्रदेश हाई कोर्ट ने केंद्र और राज्‍य सरकार को दलित शब्‍द का इस्‍तेमाल नहीं करने की सलाह दी है। कोर्ट ने इसके बजाय आधिकारिक व्‍यवहार में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति का प्रयोग करने को कहा है। मध्‍य प्रदेश की ग्‍वालियर पीठ के अनुसार, देश के संविधान या किसी अन्‍य कानून में कहीं भी दलित शब्‍द का उल्‍लेख नहीं है। 

सामाजिक कार्यकर्ता मोहन लाल मोहर ने दिसंबर में हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। जिसमें उन्होंने सरकारी व्‍यवहार में औपचारिक या अनौपचारिक तौर पर दलित शब्‍द के इस्‍तेमाल पर रोक लगाने की मांग की थी। याचिका के अनुसार, ‘दलित शब्‍द अपमानजनक है। अगड़ी जातियों ने अनुसूचित जाति/जनजाति समुदाय के लोगों का अपमान करने के लिए इस शब्‍द को प्रचलन में लाया गया था। यहां तक कि भारतीय संविधान के जनक डॉ बी.आर. अंबेडकर ने भी दलित शब्‍द को अनुचित माना था। इसके बावजूद सरकार, गैरसराकरी संगठन और मीडिया बिना किसी वजह के दलित शब्‍द का प्रयोग करते हैं। इससे अनुसूचित जाति के लोगों की भावनओं को ठेस पहुंचती है।’

हालांकि पीठ ने कहा कि इस मामले में, चूंकि याचिकाकर्ता केंद्र सरकार, राज्य सरकार के पदाधिकारियों द्वारा जारी ऐसा कोई दस्तावेज रिकार्ड में नहीं ला सका जिसमें कहा गया हो कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति शब्द की जगह दलित शब्द का प्रयोग किया जाए. इसलिये हम किसी हस्तक्षेप के पक्ष में नहीं हैं।
पीठ ने कहा कि हालांकि हमें इस बात पर कोई संदेह नहीं कि केंद्र सरकार, राज्य सरकार और इसके कर्मियों को अजा, अजजा के सदस्यों के लिए दलित शब्द के प्रयोग से बचना चाहिए क्योंकि दलित शब्द का संविधान या किसी कानून में जिक्र नहीं मिलता।
हाई कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए केंद्र और राज्‍य सरकारों के लिए निर्देश जारी किया था। मोहन लाल के वकील जितेंद्र कुमार शर्मा ने  हाई कोर्ट के फैसले के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि अनुसूचित जाति की श्रेणी में कई जातियां आती हैं, जिन्‍हें सामूहिक तौर पर दलित कह कर संबोधित किया जाता है। 

मुख्य संवाददाता
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