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संविधान को साहित्य में उतारने की ज़रूरत - डॉ जयप्रकाश कर्दम

नई दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में शनिवार को डॉ तेज सिंह स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया गया। व्याख्यान का विषय था ’भारत का संविधान और दलित साहित्य’ जिसमें जाने-माने साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों, शिक्षकों और बड़ी संख्या में शोध छात्रों ने शिरकत की। कार्यक्रम की अध्यक्षता जेएनयू के प्रोफेसर गोबिंद प्रसाद ने की, मुख्य वक्ता डॉ. जयप्रकाश कर्दम रहे, जेएनयू के प्रोफेसर विवेक कुमार ने भी शिरकत की और अपने अमूल्य विचार रखे। वरिष्ठ साहित्यकार मोहनदास नैमिशराय, जानी मानी लेखिका रजनी तिलक और नीरज कुमार ने भी उपस्थिति दर्ज कराई। मंच का संचालन मोतीलाल नेहरू कॉलेज के डॉ अश्वनी कुमार ने किया।

डॉ जयप्रकाश कर्दम ने तेजसिंह जी के साथ अपनी यादें साझा करते हुए बताया कि जब वो डॉ तेज सिंह जी से मिले थे, तो वे मार्क्सवाद से प्रभावित थे और मैं शुरू से ही अंबेडकरवादी रहा हूं। इसलिए हम लोगों में लंबी बहसें चलती थीं, वे अंबडेकरवाद को भी मार्क्स की थ्योरी में समझाने की कोशिश करते थे, लेकिन धीरे-धीरे वो अंबेडकरवाद से प्रभावित होने लगे और मार्क्स नंबर दो पर चले गए। उन्होंने 2002 में त्रैमासिक पत्रिका ‘अपेक्षा’ निकाली, जो अंबेडकरवादी साहित्य की पहचान बनी। जो डॉ तेज सिंह के वैचारिक चिंतन के विकास का सूचक है। 


वक्ता के रुप में डॉ जयप्रकाश कर्दम करीब एक घंटा बोले, इस दौरान उन्होंने भारतीय संविधान, साहित्य, दलित साहित्य और वर्तमान संदर्भ में जिन बिंदुओं को छुआ वो बहुत ही ज्ञानवर्धक और यहां लिखने लायक है, लेकिन शब्दों की सीमा के चलते मैं यहां सिर्फ ‘संविधान और दलित साहित्य’ से जुड़ी बातों पर ही प्रकाश डालूंगा। उन्होंने कहा कि सविधान और साहित्य के बीच में द्वंद रहा है, बेशक साहित्य में कितने ही अच्छे आदर्शों की बात की गई हो, करुणा की बात की गई हो, ज्ञान की और प्रेम की बात की गई हो। जिस तरह प्रेम की, सौहार्द की, भाईचारे की, सामाजिक एकता की बात की गई है, उस गहराई से जाति का विरोध नहीं किया गया, वर्ण व्यवस्था का विरोध नहीं किया गया, साहित्य कभी सामाजिक शोषण की जड़ों में जाने की कोशिश ही नहीं करता और उसकी वजह से साहित्य में कहीं भी ईश्वर का विरोध नहीं होता और नाही अवतारवाद का विरोध कहीं दिखता है, जिसमें सामाजिक शोषण की जड़ छिपी है।

उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद जब 1950 में संविधान लागू हुआ, तो साहित्य के मूल्यों में भी बदलाव आना चाहिए था, लेकिन नहीं आया। संविधान के अनुसार जो समाज बनना चाहिए वो प्रगतिशील और नागरिक समाज बनना चाहिए, लेकिन हमारा समाज संविधान के अनुरूप नहीं बन पाया। हालांकि ये काम दलित साहित्य ने किया है, दलित साहित्य ने सवाल खड़े किए कि हम ईश्वर के साम्राज्य में नहीं रहते, हम संवैधानिक समाज के नागरिक हैं। दलितों के शोषण, उत्पीड़न, दमन का सबसे बड़ा कारण ईश्वर है, इसीलिए सारी समस्याओं की जड़ ईश्वरवाद और वर्णवाद से शुरू होती है, इसीलिए दलित साहित्य ईश्वर के अस्तित्व को नकारता है।  

दलित साहित्य प्रगतिशील व नागरिक समाज की बात करता है। जिसमें दलितों और वंचितों की पीड़ा की बात तो होती ही है, ईश्वरवाद और पाखंडवाद का विरोध भी होता है। और ये बस दलित साहित्य के कारण ही संभव हो पाया है। जिसने संविधान प्रेरित समाज बनाने का बीड़ा उठाया। दरअसल दलित साहित्य आनंद के लिए नहीं है, कल्याण के लिए है। इससे इत्तर जो साहित्य पढ़ा जाता रहा है वो लोकरंजन और आनंद का साहित्य है। साहित्य में ये होना चाहिए कि जो दबा-कुचला, भूखा, समाज है, कैसे उसके अंदर स्वाभिमान आए,  उसमें कैसे उठ खड़े होने की शक्ति जागे, कैसे उसको जबान मिले कि वो अपनी बात बोल सके, वो कैसे मजबूत बने, उसका कल्याण कैसे हो, उद्धार कैसे हो, और संविधान में जो अवसर उसे दिए गए हैं, वो उनके लिए कैसे संघर्ष करे, और उनका लाभ उठाकर मजबूत बने।  
   
उन्होंने कहा कि जब समाज संविधान के अनुसार बनेगा तो वो लोकतांत्रिक और मानवीय होगा, संविधान की उपेक्षा ना हो ये जिम्मेदारी राष्ट्र के हर नागरिक की होनी चाहिए। और ये विशेष रुप से उनकी है जो वंचित हैं, उपेक्षित हैं। दलित साहित्य की वैचारिकी संवैधानिक है, जो संविधान के मूल्यों के अनुसार समाज बनाने के लिए बाध्य है। संविधान को साहित्य में उतारने की जरूरत है, और जो जिम्मेदारी दलित साहित्यकारों ने उठाई है, वो जिम्मेदारी हर संवेदनशील व्यक्ति को भी उठानी चाहिए।
    
जेएनयू के प्रोफेसर विवेक कुमार ने इस क्षण को ऐतिहासिक बताते हुए डॉ तेज सिंह जी के परिवार वालों को कार्यक्रम में आने के लिए खासतौर से धन्यवाद दिया और कहा कि जिस तरह आप लोग उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं वो वाकई सराहनीय है, उन्होंने कहा कि आप लोगों के कारण ही तेज सिंह जी इतना बड़ा बीड़ा उठा पाए और समाज व साहित्य को इतना कुछ दे पाए वरना बहुत सारे लोग परिवार का योगदान ना मिलने के कारण ही अपना एजेंडा छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि युवाओं के प्रति उनका अटूट विश्वास था। उन्होंने बताया कि जब मैने जेएनयू में कदम रखा तो पहली बार उन्होंने ही मुझे परचा पढ़ने के लिए आमंत्रित किया था, अगर वो नहीं बुलाते तो शायद मेरा दलित साहित्य से साक्षात्कार नहीं हो पाता, इसके लिए मैं उनको नमन करता हूं। उन्होंने अपने विचार रखते हुए कहा कि व्याख्यानमाला जिस साहित्यकार की स्मृति में होती है उसके कार्यों पर ही होनी चाहिए। उन्होंने जो लिखा अगर आप उसी की तैयारी करवाकर व्याख्यान करवाएंगे तो उनके साथ ज्यादा न्याय होगा और नई परंपरा पड़ेगी। अभी हम लोग दूसरे का पढ़ना नहीं चाहते अपना लिखा ही पढ़ना चाहते हैं, इसलिए अगर अगले व्याख्यान में तेज सिंह जी का लिखा हुआ उनके छात्र और छात्राएं पढ़ेंगे। तो तेज सिंह जी का काम ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सकेगा। उन्होंने कहा कि समाज और गांवों का जो चित्रण दलित साहित्यकारों ने किया है, वो कोई नहीं कर पाया। दलित साहित्य ने हमें ऊर्जा देने का काम किया है।        

डॉ तेज सिंह जी के सहपाठी रहे जेएनयू के प्रोफेसर गोबिंद प्रसाद ने अपनी कई यादें ताज़ा की। उन्होंने बताया कि मेरे दोस्त चंद्रभान ने मेरा परियच तेज सिंह से कराया, वे दिल्ली विश्वविद्यालय की लायब्रेरी में पढ़ने आते थे और सुबह से लेकर रात तक पढ़ते थे, अक्सर चाय के समय ही हमें साथ बातचीत का मौका मिलता था। उनका शुरू से ही दलित साहित्य की तरफ बहुत झुकाव था, और खासकर कहानी में वे ज्यादा रूचि रखते थे। एक बार चंद्रभान जी ने मुझसे कहा कि तेज सिंह जी आगे पढ़ना चाहते हैं उनके लिए कुछ कीजीए, वो उस समय डेसू में मीटर रीडर की नौकरी करते थे, इसलिए वे पढ़ाई के लिए ज्यादा समय निकाल लेते थे। मैने प्रयास किया कि उनका दाखिला जेएनयू में हो जाए, और थोड़े प्रयास के बाद उनका दाखिला वहां हो गया। उन्होंने ‘अपेक्षा’ पत्रिका के माध्यम से सिर्फ साहित्य की धारा ही नहीं बदली बल्कि मानसिकता बदली। साहित्य के अंदर जो अतिवादिता चली आ रही थी, उसे तोड़ने का काम किया। हिंदी के दलित विमर्श मे चली तमाम बहसों में सीधे शामिल होकर और उनको गति देकर उन्होंने समाज को एक प्रगतिशील मानवीय दिशा मे सोचने को प्रेरित किया।

अंत में धन्यवाद देते हुए मशहूर लेखिका और हमेशा स्त्री हितों की बात करने वाली रजनी तिलक जी ने कहा कि डॉ तेज सिंह का काम एक अलग मुकाम रखता है, उनके लेखन में सिर्फ अंबेडकवाद या दलित विमर्श ही नहीं, स्त्री विमर्श भी दिखता है। उन्होने हिन्दी साहित्य को अपनी तमाम आलोचनात्मक कृतियों से समृद्ध किया।  उन्होंने दलित आंदोलन को एक नया और गतिमान वैज्ञानिक आवेग दिया। उनकी कृतियों के शीर्षक ही अपने आप में इस बात की गवाही देते हैं।  डॉ तेज सिंह ऐसे लेखक थे, जिनका संघर्ष भारतीय समाज के तथाकथित उच्च जातियों मे व्याप्त ब्राह्मणवाद से तो था ही,  साथ ही दलित जातियों में भी व्याप्त ब्राह्मणवादी विचारों और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ भी रहा।

मंच का संचालन कर रहे अश्वनी कुमार ने अगले साल से डॉ तेज सिंह जी की स्मृति में पुरस्कार की घोषणा की। और रजनी तिलक जी की शिकायत के बाद इस बात का भी भरोसा दिलाया कि अगले साल से मंच पर महिलाओं को भी स्थान दिया जाएगा।

डॉ तेज सिंह जी का संक्षिप्त परिचय

अंबेडकरवादी साहित्य के मुखपत्र ‘अपेक्षा’ के प्रखर संपादक-आलोचक डॉ. तेज सिंह का जन्म 13 जुलाई, 1946 को दिल्ली के गांव घौंड़ली, कृष्णा नगर में हुआ था। उनकी स्कूली शिक्षा दिल्ली व उच्च-शिक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय व जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से हुई। डॉ. तेज सिंह, दिल्ली विश्वविद्यालय के नार्थ कैंपस के हिंदी-विभाग में अनुसंधान वैज्ञानिक, एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। हिंदी में दलित साहित्य को सामने लाने में डॉ. तेज सिंह प्रमुख थे। डॉ. तेज सिंह की अध्यक्षता में ही सर्वप्रथम दलित लेखक संघ बना था। 15 जुलाई 2014 को डॉ. तेज सिंह दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।

उन्होंने हिन्दी साहित्य को अपनी तमाम आलोचनात्मक कृतियों से समृद्ध किया। उनकी कृतियों में नागार्जुन का कथा-साहित्य (1993, आलोचना), राष्ट्रीय आन्दोलन और हिन्दी उपन्यास (2000, आलोचना), आज का दलित साहित्य (2000, आलोचना), उत्तरशती की हिन्दी कहानी (2006, आलोचना), दलित समाज और संस्कृति (2007), अम्बेडकरवादी साहित्य का समाजशास्त्र (2009, आलोचना), अम्बेडकरवादी साहित्य की अवधारणा (2010, आलोचना), अम्बेडकरवादी साहित्य ही क्यों? (2011), डॉ॰ अम्बेडकर और धम्म-दीक्षा (2011), अम्बेडकरवाद और मार्क्सवाद का द्वंद्वात्मक सम्बन्ध (2011), प्रतिरोध की बहुजन संस्कृति (2011), अम्बेडकरवादी विचारधारा:इतिहास और दर्शन(2012)  आज का समय (2002, दलित कवियों की कविताओं का संकलन), उग्र की ज़ब्तशुदा कहानियाँ (2004), सबद बिबेकी कबीर (2004), अम्बेडकरवादी विचारधारा और समाज (2009), प्रेमचंद की रंगभूमि:एक विवाद-एक संवाद (2008), अम्बेडकरवादी कहानी:रचना और सृष्टि (2009), अम्बेडकरवादी स्त्री चिंतन (2010)।
   


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