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आरक्षित वर्गों को नौकरियों में आरक्षण के लिए बने कानून

आज (06.05.2018) के अखबारों में पढ़ने को मिला कि प्रमोशन में आरक्षण का रास्ता फिलहाल साफ हो गया है। लेकिन यह सुप्रीम कोर्ट का अगला फैसला आने तक ही जारी रहेगा। खैर! सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी कर्मचारियों के हित में फैसला लेते हुए केंद्र सरकार को इनके पदोन्‍नति में आरक्षण की अनुमति प्रदान की है। 

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली के अनुसार, ‘सुप्रीम कोर्ट ने एससी एसटी को प्रोन्नति में आरक्षण के मामले में सरकार को कानून के मुताबिक चलने की इजाजत दे दी है। कोर्ट ने कहा है कि कानून के मुताबिक प्रोन्नति देने पर सरकार पर कोई रोक नहीं है हालांकि ये सब कोर्ट के अगले आदेश के आधीन होगा’। इस बारे में उल्लेखनीय है कि अब तक आरक्षण एक संवैधानिक प्रावधान है, कानून नहीं।  सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश को सरकार एससी एसटी के हित में बड़ी राहत बता रही है। किंतु मुझे लगता है कि भाजपा सरकार द्वारा  सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से की गई यह घोषणा कहीं चुनावी दावपेच तो नहीं।.... कहीं ये एक चुनावी जुमला तो नहीं। प्रमोशन में रिजर्वेशन के मामले में अदालत की शर्त है कि यह देखा जाए कि अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों का तय सीमा से अधिक प्रतिनिधित्व न मिले। यह एक बयान इसलिए है कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार आरक्षित वर्ग के लोगों को समुचित यानी निर्धारित प्रतिनिधित्व भी नहीं मिल रहा है। प्रमोशन में रिजर्वेशन पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का स्वागत किया जा सकता है लेकिन इस मामले में जो शर्तें लगाई गईं हैं, उन्हें तुरंत हटाया जाए। खैर! तो भी माननीय सुप्रीम कोर्ट को इसके लिए वन्दनीय है।

कुछ दिन पूर्व मैंने माननीय कंचन गुप्ता – वरिष्ठ पत्रकार को एबीपी के ‘संविधान की शपथ’ कार्यक्रम के तहत आरक्षण पर आयोजित एक बहस में हिस्सा लेते हुए सुना था जिसमें भाग लेते हुए उन्होंने दलील दी थी कि संविधान के तहत अनुसूचित/अनुसूचित जनजातियों को प्रदत्त आरक्षण की व्यवस्था केवल दस वर्ष के लिए की गई थी। किंतु राजनीतिक दल इस समय सीमा मे इतर इसे बराबर बढ़ाते आ रहे हैं।... उनका यह कथन न केवल  भ्रामक है अपितु तथ्यहीन है। मैं विनम्र भाव से कंचन गुप्ता जी को अवगत कराना चाहता हूँ कि संविधान के तहत अनुसूचित/अनुसूचित जनजातियों को प्रदत्त आरक्षण की कोई नियत समय सीमा नहीं है। हाँ! संविधान के तहत अनुसूचित/अनुसूचित जनजातियों को राजनीति में प्रदत्त आरक्षण की समय सीमा जरूर दस वर्ष थी। इस समय सीमा के बाद इसे भी समाप्त करने की व्यवस्था नहीं है, अपितु इसे जारी रखने के लिए समीक्षा करने का प्रावधान है जिसके आधार पर वर्चस्वशाली राजनीतिक दल अपने राजनीतिक लाभ के लिए इसे निरंतर बढ़ाते आ रहे हैं।

अफसोस कि माननीय कंचन गुप्ता जैसे विद्वान लोग ऐसे-वैसे भ्रामक बयान देकर जनता को गुमराह करने का काम करते हैं। उन्हें मालूम होना चाहिए कि संविधान के तहत अनुसूचित/अनुसूचित जनजातियों को नौकरियों में आरक्षण की प्रदत्त व्यवस्था इन लोगों की गरीबी हटाने के लिए नहीं अपितु शासन-प्रशासन में समुचित भागीदारी के भाव से की गई थी। संविधान में अनेक ऐसे प्रावधान भी समाविष्‍ट किए गए हैं जिससे कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोग राष्‍ट्र की मुख्‍य धारा से जुड़ने में समर्थ हो सकें। भारतीय समाज में उसी सम्मान और समानता के साथ रह सकें जैसे कि समाज के अन्य संप्रभु समाज जी रहा है।

उल्लिखित है कि संविधान का अनुच्‍छेद 46 प्रावधान करता है कि राज्‍य समाज के कमजोर वर्गों में शैक्षणिक और आर्थिक हितों विशेषत: अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का विशेष ध्‍यान रखेगा और उन्‍हें सामाजिक अन्‍याय एवं सभी प्रकार के शोषण से संरक्षित रखेगा। शैक्षणिक संस्‍थानों में आरक्षण का प्रावधान अनुच्‍छेद 15(4) में किया गया है जबकि पदों एवं सेवाओं में आरक्षण का प्रावधान संविधान के अनुच्‍छेद 16(4), 16(4क) और 16(4ख) में किया गया है। विभिन्‍न क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों के हितों एवं अधिकारों को संरक्षण एवं उन्‍नत करने के लिए संविधान में कुछ अन्‍य प्रावधान भी समाविष्‍ट किए गए हैं जिससे कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोग राष्‍ट्र की मुख्‍य धारा से जुड़ने में समर्थ हो सके। भारतीय समाज में उसी सम्मान और समानता के साथ रह सकें जैसे कि समाज के अन्य संप्रभु समाज जी रहा है। किंतु क्या ऐसा आजतक संभव हो पाया है? सच तो ये है कि आज तक अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को नौकरियों में प्रदत्त आरक्षण का एक बड़ा भाग रिक्त ही पड़ा है। यहाँ यह समझने की जरूरत है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों को नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था केवल  आर्थिक अवस्था को सुधारने भर के लिए नहीं की गई थी अपितु जाति प्रतिशत के आधार पर समाज और शासन में भागीदारी के लिए की गई थी। संविधान के अनुच्‍छेद 23 के तहत और भी जन हितकारी प्रावधान किए गए, जिनका यहाँ उल्लेख करना विषयांतर ही कहा जाएगा। गौरतलब है कि संविधान के 117वें संविधान संशोधन के तहत समाज के एस सी और एस टी को सरकारी नौकरियों में पदोन्नत्ति में आरक्षण की वकालत की गई किंतु सरकारी नौकरियों में पदोन्नत्ति की बात तो छोड़िए, उच्च शिक्षा तक में आरक्षण पर छुरी चलती जा रही है। वैसे भी सरकारी नौकरिय़ां तो ना के बराबर रह गई हैं।

ज्ञात हो कि निजी क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था नहीं है। ऐसे में भाजपा के शीर्ष नेता सुब्रहमनियम स्वामी का यह कहना, ‘सरकारी नौकरियों में एस सी और एस टी को मिलने वाले आरक्षण के नियमों को इतना शिथिल कर दिया जाएगा कि आरक्षण को किसी भी नीति के तहत समाप्त करने की जरूरत ही नहीं होगी, धीरे-धीरे स्वत: ही शिथिल हो जाएगा।’...आजकल यह सच होता नजर आ रहा है। इस पर भी दलित समाज सामाजिक हितों को आँख दिखाकर अपने – अपने निजी हितों के लिये राजनीतिक खैमों में बँटता ही जा रहा है, जबकि जरूरत तो सामाजिक और राजनीतिक पटल पर एक होने की है। और इस सबके लिए दलित समाज का तथाकथित बुद्धिजीवी और राजनीतिक वर्ग ही जिम्मेवार है।

 अब सुप्रीम कोर्ट से सामने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों और प्रदत्त प्रावधानों के बीच क्रीमी लेयर की दीवार खड़ी करने का काम किया जा रहा है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों को पदोन्नति में आरक्षण दिया जाना चाहिए या नहीं। यहाँ उल्लेखनीय है कि पहले तो भाजपा सरकार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण को शिथिल करने की जुगत लगा रही है, वहीं जो थोड़े-बहुतों को नौकरियां मिल भी गई हैं तो उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से निचले पायदार पर ही रोकने/रखने की, जैसे भी हो, कवायद की जा रही है।        

हाल के दिनों में ही नहीं दशकों से विभाजनकारी ताकतें देश में आरक्षण की ‘मियाद’ को लेकर चिल्लपौं कर रही है यानी आरक्षण ‘मियाद’ तय करने की वकालत करने में लगी हुई हैं। उनका मानना है कि ‘पिछड़ी जातियों को दिए गए आरक्षण की कोई अवधि तय नहीं की गई। इसके कारण भारतीय समाज में संतुलन तेजी से नष्ट हो रहा है।’ वास्तव में यह उन लोगों की मानसिक बौखलाहट इसलिए है कि आज उन्होंने कभी भी कभी भी कोई सार्थक दलील के हक में कोई सबूत पेश नहीं किया और किसी सन्दर्भ का हवाला दिया।       

आज तक ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता जिससे आरक्षण सामाजिक ‘संतुलन’ को बिगाड़ने का काम करता है, बल्कि सामाजिक संतुलन बनाने में मदद करता है। आरक्षण जातिवाद भी नहीं फैलाता, क्योंकि जातिवाद तो पहले से ही भारतीय समाज में व्याप्त है। सच तो ये है आरक्षण जातीय भेदभाव और गैरबराबरी को दूर करने की दिशा में काम करता है। आरक्षण सैकड़ों वर्षो से वंचित रहे समुदायों को सामाजिक प्रतिनिधित्व प्रदान करता है और प्रशासन में कायम कुछ खास जातियों के एकाधिकार को खत्म करने की कोशिश करता है। इसलिए आरक्षण खत्म करने या फिर उसकी मियाद तय करने की बात करना न सिर्फ अतार्किक है, बल्कि समता-विरोधी भी है।

स्मरण रहे कि संविधान ने तीन समाजिक वर्गो को आरक्षण मुहैया कराया है। पहला वर्ग एससी (अनुसूचित जाति/दलित) का है, दूसरा एसटी (अनुसूचित जनजाति/आदिवासी) और तीसरा ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) है। एससी को आरक्षण इसलिए दिया गया, क्योंकि वे हमेशा छुआछूत के शिकार रहे हैं और वे हर क्षेत्र में वंचित रहे हैं। दूसरी तरफ एसटी जातीय समाज से पृथक जंगलों पहाड़ों व दुर्गम स्थानों में रहते रहे हैं, मगर वे भी एससी की ही तरह हर क्षेत्र में वंचित रहे हैं। ओबीसी सामाजिक और शैक्षणिक तौर से पिछड़े हैं। इन वर्गो के आरक्षण पर कुछ लोग सवाल तो उठाते हैं, मगर वे इस बात का जिक्र नहीं करते कि क्या वाकई में ये सामाजिक वर्ग समाज में बराबरी पा चुके हैं? वे लोग तर्क देते हैं कि ‘हर चीज की एक उम्र होती है, लेकिन आरक्षण की कोई उम्र तय नहीं की गई है।’ यदि उनके इस तर्क को मान भी लिया जाय तो क्या उन लोगों के पास इस बात का उत्तर है कि जातिवाद की मियाद क्या है। उनसे कौन पूछे कि जब हजारों-साल पुरानी जाति अभी तक भी जिंदा है तो उससे उम्र में कहीं छोटा आरक्षण के औचित्य पर क्यों सवाल उठाया जा रहा है? आरक्षण विरोधियों से यदि यह पूछ लिया जाए कि आरक्षण के प्रावधान क्या हैं?... तो शायद इसका आपके पास कोई उत्तर नहीं होगा। कारण यह है कि उनका विरोध किसी ज्ञान पर आधारित नहीं, केवल पूर्वाग्रही है। उनको जान लेना चाहिए  कि आरक्षण के चलते सामान्य वर्ग के प्रत्याशियों की मैरिट लिस्ट और कोटे वालों की मैरिट लिस्ट अलग-अलग बनती है। समझ नहीं आता कि आरक्षण विरोधी स्वघोषित ज्ञानी लोग अपने बराबर के लोगों से तो  मुकाबला कर नहीं सकते और आरक्षित वर्ग के साथ मुक़ाबला करने का मन बनाए होते हैं। उनको यह भी मालूम होना चाहिए कि देश की 85 % जनता को महज 50% आरक्षण का प्रावधान है, वो भी रुग्ण मानसिकता वाले प्रशासन द्वारा पूरा नहीं किया जाता और शेष 15%  भारतीय सवर्ण आवादी  को 50%। फिर यहाँ मैरिट की बात को लेकर टकराव कहाँ है? एक बात और कि निजी सेक्टर में समाज के उपेक्षित वर्ग की नुमाइंदगी काफी कम है। जिसका साफ-साफ कारण है कि निजी सेक्टर में आरक्षण का प्रावधान ही लागू नहीं है। 

आजकल अक्सर ये सवाल उठाया जाता है कि आखिर आजादी के सत्तर साल बाद भी आरक्षण की क्या आवश्यकता है। ऐसा सवाल उठाने वालों को ये समझ लेना चाहिए कि आरक्षण का प्रावधान केवल पेट भर भोजन पाने के लिए नहीं है। आरक्षण भारतीय समाज में समता, समानता और मैत्री भाव उत्पन्न करने का एक साधन ही नहीं अपितु समाज के उपेक्षित वर्ग की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में भागीदारी निश्चित करने की एक विधि है। यह भी कि आरक्षण के संवैधानिक प्रावधान के बावजूद भी तय कोटा आज तक भी पूरा नहीं किया गया है। और तो और भाजपा के शासन में बकाया पदों को निरस्त कर अनारक्षित वर्ग को दे दिया जा रहा है। अटल सरकार से पहले एस सी/ एस टी का मिलाजुला आरक्षण 22.5% था किंतु अटल जी सरकार के दौरान इसे दो हिस्सों में बांट दिया गया... यथा एस सी को 15% और एस टी को 7.5% .... इस प्रावधान से एस सी और एस टी की न भरे जाने वाली सीटें या तो खाली रहेंगी या अनारक्षित वर्ग को दे दी जाएंगी। पहले ये होता था कि यदि एस सी और एस टी की सीटे एक दूसरे को प्रदान कर दी जाती थीं...अब नहीं। आज न तो एस सी, एस टी और ओ बी सी का कोटा शतप्रतिशत पूरा किया गया है और न इसके प्रयास ही किए जा रहे है। ऐसे में आरक्षण का जारी रहना अत्यंत ही जरूरी है।

हैरत की बात तो ये है कि आज की मोदी सरकार तो सारे के सारे आरक्षण को ही निगल जाना चाहती है। आज तक भी अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है। इसका मूल कारण यह है कि अभी तक भी  रिजर्वेशन लागू करने के लिए कोई कानून ही नहीं बना है। सो  जरूरत इस बात की है कि रिजर्वेशन लागू करने के लिए जल्द से जल्द कानून बनाया जाए।      


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