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जयंती विशेष:- लाल बहादुर शास्त्री : स्वस्थ्य राजनीति का अंतिम पड़ाव

अक्सर लोग अपने और अपने परिवार के बारे में सोचते हैं। परिवार के दु:ख-सुख की सीमा ही उनका कार्य-क्षेत्र होता है। कुछ जाति और वर्ग तक सोचते हैं। जहाँ हित सध जाए ठीक। और कुछ लोग राष्ट्र तक ही सोचते हैं – वह भी सत्ता की राजनीति तक। उन्हें समाज के दु:ख-सुख से कुछ लेना-देना नहीं होता। इस परिप्रेक्ष्य में लाल बहादुर शास्त्री कहीं भी नहीं ठहर पाते। उनका सम्पूर्ण जीवन अपने-पराए की भावना से मुक्त रहा। एक आदमी का चरित्र ही जिया उन्होंने। बिना लाग-लपेट की राजनीति (स्वस्थ्य राजनीति), समाज के दु:ख-सुख का अहसास और उसका निवारण ही उनकी राजनीति का हिस्सा बनी रही। 

लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री बनने के बाद, यह चर्चा अवश्य उभरी कि जनवरी 1964 में जब शास्त्री जी को, हज़रत मुहम्म्द के बाल की चोरी की आड़ में हज़रत बल दरगाह काण्ड के तहत भड़के उपद्रवों को शांत कराने के लिए, कश्मीर जाना था तो नेहरू जी ने शास्त्री जी को अपना कोट और जूते देकर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। फलत: 27 मई 1964 को नेहरू जी के निधन के उपरांत सर्वसम्मति से शास्त्री जी को प्रधानमंत्री बनाया गया था। किंतु यह एक मिथक भर लगता है। उस समय के राजनीतिक भूगोल पर शास्त्री जी जैसा बेदाग न कोई चाँद था और न ही तारा। इन्दिरा गान्धी अभी अपरिपक्व थीं। परिणामत: काँग्रेस के सामने शास्त्री जी को प्रधानमंत्री बनाने के अलावा कोई विकल्प ही न था। नेहरू जी के कोट और जूते की ओट में शास्त्री जी के उन्नत, निर्मल, गरिमामय और त्यागमय व्यक्तित्व को छिपाया नहीं जा सकता। आज कितने राजनेता हैं जो शास्त्री जी की तरह आए दिन घट रही दुर्घटनाओं की जिम्मेदारी अपने सिर पर उठाकर कुर्सी का मोह छोड़ने को तैयार हैं। वे शास्त्री जी ही थे कि जिन्होंने दक्षिण-भारत में अरियालूर रेल-दुर्घटना का दायित्व अपने ऊपर लेकर मंत्री पद को त्याग दिया।

अगस्त 1962 में ‘कामराज योजना’ के तहत जब केंद्र के मंत्रियों को स्वेच्छा से अपने पद छोड़ने थे तो लाल बहादुर शास्त्री  उनमें सबसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने तत्काल अपने पद से त्याग-पत्र दे दिया था। इस त्यागमूर्ति को पदलोलुपता तनिक भी न छू सकी। फिर भी शास्त्री जी का प्रधान मंत्री बनाया जाना आश्चर्यजनक जरूर था। क्योंकि गाँधी ने नेहरू परिवार के राजकुल का पौधा बड़ी कुशलता से रोपा था। उस पौधे को किस तरह की खाद गाँधी जी ने दी, इसका अन्दाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि यह  वकील परिवार कुछ वर्षों में ही राजकुल में परिवर्तित हो गया। गाँधी जी ने लगभग वंशवाद की परम्परा को ध्यान में रखा था जिसका उदाहरण शास्त्री जी की मृत्यु के बाद का राजनीतिक काल है। राजीव गाँधी के निधन के बाद का समय भी नेहरू-कुल से ही कोई प्रतिनिधि ढूँढने में ही गुजर रहा था। यह वंश परम्परा का ही परिणाम है कि आए दिन काँग्रेस के वरिष्ठ नेता अलग-अलग झुंड बनाकर सोनिया गाँधी से भेंट-वार्ता  के लिए जाते रहे। जबकि वो न तो काँग्रेस से कोई सीधा सम्बन्ध रखती हैं और न ही किसी मंत्री जैसे पद पर हैं। फिर वंश-परम्परा के चलते प्रधान मंत्री से लेकर काँगेस के सभी राजनेता उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के काफी व्याकुल हैं। क्या ऐसे में शास्त्री जी का प्रधान मंत्री बनना एक अजूबा नहीं था। 

आज जबकि स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व के जो राष्ट्रीय लक्ष्य व आदर्श जो भारतीयों को सामुहिक रूप से स्फूरित करते थे, जैसे बिखर गए हैं। राष्ट्रीय स्वाभिमान जैसे विलुप्त हो गया है। भारतीय राजनीति का शील भंग हो गया है। आस्थाएं दगमगा रही हैं। सामाजिक न्याय का लक्ष्य मात्र भाषणों और कागजों में सिमट कर रह गया है। नीति और नीयत सब डगमगा रहे हैं। भारतीयता जैसे नैपथ्य में चली गई है। धर्मान्धता , पदलोलुपता और विलासता राजनीतिक मंच पर निर्वसन थिरक रही है। समाज में हिंसा और भ्रष्टाचार निरंतर निर्बाध गति से बढ़ता जा रहा है। लोगों की मानसिकता  हिंसक होती जा रही है। राजनैतिक नारे दिशाहीनता ही पैदा कर रहे हैं। जाति-प्रथा के पोषक ही जातियता बढ़ने का शोर अलापने लगे हैं। इस सबका कारण यह कतई नहीं है कि हमारे नेता अज्ञानी हैं। उनकी दुर्बलता महज इतनी है कि वो केवल सत्ता की भाषा को ज्यादा अहमियत देते हैं। जनता के दुख-सुख से उन्हें कोई सरोकार नहीं है। वस्तुत: गाँधी ने अपने नेतृत्व में काँग्रेस को जिस ढाँचे मे ढाला, उससे जनता से सीधे सम्पर्क का दायित्व सर्वोच्च नेता के हाथ में चला गया जो जनता से अपनी बात तो करते हैं, उनकी सुनते भी हैं। आज मंत्री तो क्या उनके चमचों की संतानें/साथी/सहयोगी स्वयं को ही मंत्री जानकर व्यवहार करते हैं। ऐसे में शास्त्री जी के विचारों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। शास्त्री जी जमीन से जुड़े व्यक्ति थे। जमीन के दुख-दर्द को समझते थे। उनके जीवन की अनेक घटनाएं ऐसी हैं जो उनके व्यक्तित्व की गरिमा को न केवल व्यक्त करती हैं अपितु आज की राजनीति के गिरते आचरण का खुलासा करती हैं। 

उत्तर प्रदेश में जब वे गृह मंत्री थे तब उनके घर में कूलर तक भी नहीं था, उन्होंने अपने परिवार जनों को समझाते हुए कहा था -  “देखो! तुम देश के अति साधारण नागरिक हो। फिर यह भी संभव है कि मैं आज मंत्री हूँ, शायद कल न रहूँ। तब तुम लोगों को कूलर का अभाव और भी कष्टदायक होगा। फिर यह भी बताओ कि क्या मैं देश के सभी गरीबों के घर कूलर लगवा सकूँगा।” 

उनके प्रधानमंत्री काल में उनके परिवार के एक बच्चे द्वारा फार्म प्राप्त करने के लिए  सामान्य परिवार के बच्चों की पंक्ति में खड़े होना, अपने आप में एक अजब सी दास्तान है। किंतु है सत्य। अध्यापक के पूछने पर उस बच्चे का जवाब भी उदाहरणीय है। बालक ने कहा था – मैंने तो नियम का ही पालन किया है। जब सब जने पंक्ति में खड़े हैं तो मुझे भी पंक्ति में ही खड़ा होना चाहिए। इसी प्रकार की एक और घटना है कि शास्त्री जी मंत्री रहते हुए महीने के अंत में उनके नाती ने उनसे नई स्लेट लाने के लिए कहा। शास्त्री जी का उत्तर था कि दो-चार दिन की और प्रतीक्षा करो, महीने के आखरी दिन हैं, तनख्वाह मिलने पर स्लेट दिला दूँगा।

इन संदर्भों में, एक गरीब का बेटा अंत तक गरीब ही बना रहा। शास्त्री जी कहा करते थे कि जब तक देश उन्नति नहीं कर लेता, तब तक अपनी गरीबी का भी परित्याग नहीं करूँगा। वे भगवान बुद्ध से अति प्रभावित थे। वे कहते थे कि भगवान बुद्ध ने भी कहा था कि जब तक सम्पूर्ण मानवता को मुक्ति नहीं मिल जाती, तब तक मैं इस रसहीन मुक्ति को लेकर क्या करूँगा।  शास्त्री जी के संदेश में सबके मन की बात का संप्रेषण होता था, तब ही उनका ‘जय किसान’, ‘जय जवान’ का नारा इतना फला-फूला  कि जनता, किसान और भारतीय जवानों के सामने वर्ष 1965 के युद्ध में पाकिस्तान को पराजय का मुँह देखना पड़ा। शांति-वार्ता के दौरान उनका यह कहना कि देश का साधारण व्यक्ति युद्ध नहीं करना चाहता, वह शांति चाहता है। ताशकन्द समझौते का कारण बना। समझौता सम्मानपूर्वक सम्पन्न हो गया। किंतु दुख तो इस बात का है कि जब शांति-वार्ता के बाद उन्हें  दिल का दौरा पड़ा और सदैव के चिरनिद्रा में चले गए।

आज जबकि देश के छोटे-बड़े नेता भ्रष्टाचार की लपेट में हैं – चाहे बोफोर्स तोप का मामला हो या हर्षद मेहता को शेयर काण्ड, चाहे चीनी घोटाले का मामला हो या मुलायम सिंह यादव द्वारा बन्दरबाँट, धार्मिक उन्माद का मामला हो , या मंदिर-मस्जिद का मामला, या फिर सामाजिक न्याय के मार्ग में विवाद हो, पुरातन संस्कृति का विध्न हो या फिर सत्ता-प्राप्ति के लिए मुखौटा राजनीति, श्रृषिकेश  के शंकराचार्य द्वारा यौन-शोषण का मामला हो या चन्द्रा स्वामी की राजनीतिक दलाली का किस्सा हो, सबके सब में सत्ताधीशों के होने का जग-जाहिर संकेत हैं।  मान-मर्यादा चली जाए, पर सत्ता पर कब्जा बना रहे, यह है आज की राजनीति का चरित्र। दिन को रात कहना पड़े या रात को दिन कोई परहेज नहीं, किंतु सत्ता बनी रहे। इसे राजनीति कहने में जीभ अटकती है क्योंकि राजनीति तो किसी भी राज्य/देश की वह नीति होती है जिसके अनुसार प्रजा का शासन तथा पालन और अन्य राज्यों से व्यवहार होता है। इसे कूटनीति (किटिल नीति) कहना ज्यादा उचित होगा।

यूँ तो भारत के कई नेता आजादी से पूर्व ही राजनीति त्याग कर कूटनीति में लिप्त हो गए थे किंतु भारत को आजाद करवाकर सत्ताधीश  बनाने की ललक में संगठित थे। वैसे भी उनके सामने  मसला मात्र भारत की आजादी का था, सत्ता-सुख भोगने का नहीं।  फिर भी राजनीतिक गलियारों में तत्कालीन राजनीति की स्थिति अन्धों में काणें सरदार जैसी थी। उस समय कुछ तो ठीक था ही, किंतु आज बाप-रे-बाप, किसी को कुर्सी के अलावा कुछ नजर ही नहीं आता। ऐसे में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं कि लाल बहादुर शास्त्री के निधन के साथ ही स्वस्थ्य राजनीति का पटाक्षेप हो गया। लगता है उनका दौर स्वस्थ्य राजनीति का अंतिम पड़ाव था। 

लेखक एक स्वतंत्र टिप्पणीकार व ख्यात ग़जलकार है।    


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