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किसान-मज़दूरों ने भरी हुंकार- नहीं बदली नीतियां तो बदल देंगे सरकार

नई दिल्ली- बुधवार को संसद मार्ग लालकिले में तब्दील हो गया, दूर तक, जहां भी नज़र दौड़ाई बस लाल रंग के अलावा कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। देशभर से जुटे किसानों और मज़दूरों ने संसद मार्ग पर अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस), भारतीय ट्रेड यूनियन केंद्र (सीआईटीयू) और अखिल भारतीय कृषि श्रमिक संघ (एआईएडब्ल्यूयू) के झंडे तले सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया और रैली निकाली। और सरकार को चेतावनी दी कि अगर वो किसानों और मजदूरों को लेकर अपनी आर्थिक नीतियों में बदलाव नहीं करेगी तो आगामी चुनावों में सरकार को बदल कर रख देंगे।

मिली जानकारी के अनुसार किसानों और मजदूरों की संख्या लाखों में रही। संसद मार्ग पर हुई इस रैली में किसान और मजदूर संगठनों ने महंगाई में कमी, रोज़गार, 18000 न्यूनतम वेतन, मजदूर विरोधी कानून पर रोक, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करना, किसानों को कर्ज़ से मुक्ति, खेतिहर मज़दूरों के लिए कानून, सभी गांव में मनरेगा लागू करना, साल में 200 दिन काम, न्यूनतम 350 रुपये एक दिन की मज़दूरी, भोजन सुरक्षा के साथ सभी किसान और मजदूरों को शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा, घर मुहैया कराना, भूमिहीन किसानों को भूमि आवंटित करना, जबरन ज़मीन अधिग्रहण पर रोक, प्राकृतिक आपदा के समय गरीब मज़दूर और किसानों का पुनर्वास और उन्हें उचित मुआवजा देने की मांगे रखीं।

आशा वर्कर कमेटी की अध्यक्ष रंजना नरुला ने कहा कि सच्चाई यह है कि पूरी दुनिया में महिलाओं व बच्चों की मौत सबसे अधिक हमारे यहां होती है। बीमा के नाम पर बड़ी कंपनियों को मुनाफा दिया जा रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं का भी सरकार निजीकरण कर रही है। कामरेड तपन सेन ने कहा कि आजाद भारत में पहली बार सरकार के खिलाफ रैली में किसान और मजदूर एकजुट होकर हिस्सा ले रहे हैं। सरकार सिर्फ धनी और कॉरपोरेट घरानों के हित साधने वाली नीतियां बना रही है। इसका सीधा असर गरीब मजदूरों और किसानों पर पड़ रहा है।  किसान सभा के अध्यक्ष कामरेड अशोक धवल ने नौकरियों में भर्ती पर रोक हटाने, सबको बेहतर रोजगार देने, न्यूनतम मजदूरी 18 हजार देने की मांग रखी। उन्होंने केंद्र सरकार की नीतियों को मजदूर व किसान विरोधी बताया। सभा का संचालन सीआईटीयू अध्यक्ष कॉमरेड हेमलता ने किया। मंच से दर्जनों संगठनों ने अपनी-अपनी मांगें रखीं।


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