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दलित साहित्य में पत्र-पत्रिकारिता

पत्राचार ही एक ऐसा साधन है, जो दूरस्थ व्यक्तियों को भावना की एक संगमभूमि पर ला खड़ा करता है और दोनों में आत्मीय सम्बन्ध स्थापित करता है। व्यावहारिक जीवन में पत्राचार वह सेतु है, जिससे मानवीय सम्बन्धों की परस्परता सिद्ध होती है। अतएव पत्राचार का बड़ा महत्व है। साहित्य में भी इनका उपयोग होने लगा है। जिस पत्र में जितनी स्वाभाविकता होगी, वह उतना ही प्रभावकारी होगा। पत्र लेखन के विविध रूप होते हैं... जैसे: सामाजिक, व्यावसायिक, शासकीय और प्रशासकीय आदि।  जैसे-जैसे भाषा का विकास हुआ, उसी के साथ पत्र लेखन का भी विकास होता गया। इस प्रकार यह माना जा सकता है की पत्र लेखन का इतिहास बहुत पुराना है। आज के युग में मोबाइल, इंटरनेट जैसे संचार के साधन होने के बावजूद भी पत्र लेखन का महत्व वैसे ही बना हुआ है। समय के साथ पत्र लेखन की कला में भी अनेक परिवर्तन आये हैं। ई-मेल भी इन्हीं परिवर्तनों में से एक है। उल्लेखनीय है कि पत्रिकारिता भी एक प्रकार का पत्र लेखन ही है। इसलिए पत्र लेखन को पत्रिकारिता से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

यथोक्त की आलोक में, दलित साहित्य में भी पत्र लेखन की महत्वपूर्ण भूमिका देखने को मिलती है। दलित लेखकों ने नाना प्रकार से पत्र लेखन की विधा को अपनाया है। पत्र-पत्रिकारिता के जरिए दलित लेखकों ने सामाजिक/ आर्थिक/ धार्मिक मुद्दों को आवाज देने का जो काम किया है वह उल्लेखनीय है। जब कभी राष्ट्रीय अखबारों मे दलित उत्पीडन/ नरसंहार या अन्य प्रकार की घटनाएं देश के किसी कोने मे घटित होती थीं तो कुछ लेखक अपनी प्रतिक्रिया टिप्पणी स्वरुप समाचार पत्रों में भेजते थे और उनके प्रतिक्रियात्मक पत्र पाठको के कालम मे प्रमुखता से छपते थे, जिन्हें मैं अपने कालेज छात्र जीवन अर्थात 1972 से ही पढ़ता चला आ रहा था। जिनमें हिमांशु राय/ एन.आर.सागर/ आनंद स्वरूप/ धनदेवी/ जसवंत सिंह जनमेजय/ राजपाल सिंह 'राज'/ डा.सोहनपाल सुमनाक्षर/ इन्द्र सिंह धिगान/ आर.सी.विवेक/ डा.के.के.कुसुम/ शेखर पंवार आदि प्रमुख रहे थे। हिमांशु राय जी ने ‘भारतीय पत्र लेखक संघ’ भी बनाया था जिसकी बैठक अम्बेडकर भवन, नयी दिल्ली व आर.के.पुरम में स्थित निर्वाण बुध्द विहार/ रविदास टेम्पल पर तो कभी बोट क्लब पर हुआ करती थी। किंतु हिमांशु राय जी के निधन के बाद भारतीय पत्र लेखक संघ चल न सका। बाद के दिनों में  तेजपाल सिंह 'तेज' अपनी तीखी टिप्पणियों के लिए जाने-पहचाने जाने लगे| इतना ही नहीं उनके गद्य लेखन में भी उनकी गजलों/गीतों/कविताओं जैसा ही तेवर मौजूद पाया। उनकी लेखन शैली और तीक्षणता कुछ अलग ही दिखती है। ‘तेज’ ने प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च-शिक्षा का सवाल हो या हिन्दी को राजभाषा बनाने का सवाल या दलितों, पिछड़ों, महिलाओं के उत्थान के नाम पर सरकारी मशीनरी के रवैये पर  ईमानदारी से व्यंग्यात्मक रूप में बराबर सवाल उठाएं हैं।

1984 के बाद सभी उपरोक्त लेखक ‘भारतीय दलित साहित्य मंच दिल्ली’ (रजि.) से जुड़ गये और डा. राज के संगठनात्मक प्रयास से नये-नये कवि/लेखक जुड़ते रहे और दलित साहित्य आंदोलन अपना व्यापक आधार तैयार करता रहा जिसके संरक्षक बतौर आचार्य जनकवि बिहारी लाल हरित की भूमिका प्रमुख थी।

पत्रकारिता में डा.सोहनपाल सुमनाक्षर अपना ‘हिमायती’ पत्र स्वंय निकालते थे तो मोहनदास नैमिशराय ने अपने संपादकत्व में 1978 ‘बहुजन अधिकार’ अखबार निकलता था। बाद के दिनों में वे काशीराम साहब की बामसेफ यूनिट की अंग्रेजी पत्रिका The Oppressed India व हिंदी अखबार बहुजन संगठक से जुडे हुए थे, जिनमे हम स्वयं लेख व समाज हित कविताएं लिखा करते थे।  इधर 'भीम भारती'  पाक्षिक अखबार भी हमारे द्वारा निकाला जाता था जिसके मुख्य संपादक प्रो. डा.एल.बी.राम अनंत व मैं स्वंय तथा प्रो. आर.डी.जाटव उप-संपादक रहे थे। उन्हीं दिनों 'काला भारत'  पाक्षिक खजान सिंह गौतम के संपादन मे निकलता था। इसके बाद ‘ग्रीन सत्ता’ अखबार के संपादक/ उप संपादक खजान सिंह गौतम व तेजपाल सिंह ‘तेज’ रहे। डा. तेज सिंह के सम्पादकत्व में निकलने वाली ‘अपेक्षा’ काफी चर्चित रही।  ईशकुमार गंगानिया के प्रयासों से जून 2008 में ‘आजीवक विजन’ (मासिक व बाईलिंग्‍वल) नामक पत्रिका निकाली गई जिसके अपेक्षित लेखकीय और आर्थिक सहयोग न मिलने के कारण केवल पांच अंक ही प्रकाशित हो पाए। विदित हो कि तेजपाल सिंह ‘तेज’ इस पत्रिका के भी प्रधान संपादक रहे। इसी क्रम में  दलित  इंटेलेक्चुयल  फोरम  फार  ह्यूमन  राइट्स के अध्यक्ष परमजीत सिंह की प्रधानता में ‘अधिकार दर्पण’ नामक पत्रिका का मार्च 2012 में प्रकाशन आरम्भ किया गया जिसके संपादक तेजपाल सिंह ‘तेज’ व उपसंपादक ईश कुमार गंगानिया रहे। यद्यपि इस पत्रिका का प्रकाशन भी मार्च 2015 तक ही हो पाया तथापि मानवाधिकारों को उठाने वाली पत्रिका के रूप में खासा काम किया। आज और भी अनेक पत्र-पत्रिकाएं का प्रकाशन हो रहा है, लेकिन एक लेख में सबका उल्लेख करना संभव नहीं है। आने वाले दिनों में उनपर भी काम किया जाएगा।       

इससे पूर्व 1976 में दिल्ली की एक मात्र त्रैमासिक पत्रिका 'धम्म-दर्पण' भारतीय बौध्द महासभा के मातहत प्रो. कैन के संपादन मे निकलती थी। महासभा का जो भी दिल्ली प्रदेश का अध्यक्ष होता था, वह इस पत्रिका का मुख्य संपादक तथा अन्य चार सदस्य संपादन मंडल में हुआ करते थे। जिसका वैचारिक केन्द्र डा. अम्बेडकर भवन, रानी झांसी रोड, नयी दिल्ली हुआ करता था। इसी स्थल से दिल्ली की सामाजिक, सांस्कृतिक व बौध्द आंदोलन की गतिविधियों का संचालन होता था। दलित सांसद मंत्रियों का आना-जाना निरन्तर लगा रहता था। वैसे भी अम्बेडकर भवन भूमि स्वयं बाबासाहब डा.अम्बेडकर ने ‘शैडयूल्ड कास्ट वेलफेयर एसोसिएशन’ के नाम से खरीद कर समाज को सौंप दी थी, जंहा से अनुसूचित जाति के प्रमाण पत्र बना करते थे, रोजगार कार्यालय व हायर सैकेंडरी स्कूल भी खुला जो आजतक चल रहा है। पत्रिका का संपादक कार्यालय,भारतीय बौद्ध महासभा का आफिस ही होता था जो अम्बेडकर भवन पर ही था। आज महासभा में आपसी गुटबाजी के कारण दो गुट हो गए फलत: धम्म-दर्पण अब मृतप्रायः है। महासभा के फाड़ होने के कारण सी.एम.पीपल के संपादन मे ‘सधम्म दर्पण’ निकालने का 2017 में पुन: प्रयास हुआ जिसका पहला अंक अक्टूबर, 2017 - मार्च 2018 (संयुक्तांक) छपा। देखना यह है कि यह पत्रिका कब तक चलेगी। स्मरणीय है कि सी.एम.पीपल भारतीय बौध्द महासभा का नया रजिस्ट्रेशन दिल्ली से कराकर महासभा पर काबिज हो गए। पूर्व ‘धम्म-दर्पण’ में पाठकों के लेख, पत्र व प्रतिक्रियाएं  लगातार छपती थीं। पत्र लेखन की जो स्वस्थ परम्परा दलित साहित्य आंदोलन मे उभरी, उसका श्रेय बाबा डा.अम्बेडकर के पत्र-लेखन को जाता है। डा.अम्बेडकर की पत्र-पत्रकारिता से पढ़ा-लिखा समाज अधिक प्रभावित हुआ और सरकारी नौकरियों में रहते स्वयं ही पढ़े-लिखे लोग दलित लेखन मे उतरते गये और इस तरह दलित साहित्य आंदोलन खड़ा होता चला गया। पत्र लेखन में एक महत्वपूर्ण नाम का उल्लेख ना करना मेरे लिए एक बडा अपराध होगा... वह शीर्षस्थ नाम है रतनलाल कैन। पत्र लेखन व सरकार की किसी भी अप्रसांगिक कार्यशैली पर  टिप्पणी करने में रतन लाल कैन जो स्वयं दानिक्स अधिकारी रहे थे, आज भी लिखते-लिखाते रहते हैं। रतन लाल कैन भारतीय संविधान के मर्मज्ञ ही नही अपितु प्रख्यात आर.टी.आई.एक्टीविस्ट भी हैं। सभी सरकारों से जितना पत्र-व्यवहार भारत में रतन लाल कैन ने किया है, शायद ही किसी और ने किया हो। पत्र लेखन समझदार व जागरुक व्यक्ति ही कर सकता है अन्य कोई नहीं।       

यद्यपि व्यक्तिगत पत्र लेखन की परम्परा आज दिन-प्रतिदिन अपना बजूद खोती जा रही है तथापि पत्रकारिता अपने चर्म पर हो रही है। पिछले वर्ष साहित्यकारों के आपसी पत्र-व्यवहारों का संपादन " संवादों का सफर" डा.सुशीला टांकभोरे ने किया जो दलित साहित्य आंदोलन की दिशा और दशा समझने मे काफी महत्वपूर्ण कृति है। वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार मोहनदास नैमिशराय भी साहित्यकारों द्वारा किए गये आपसी पत्र व्यवहार का वृहत स्तर पर संपादन कार्य में जुटे हुए हैं। कहना अतिशयोक्ति न होगा कि दलित लेखकों में दिन प्रतिदिन पत्र-पत्रिकारिता के प्रति रुचि बलबती जा रही है और अब तो सोशल मीडिया के जरिए भी पत्रिकारिता भी अपने कदम जमाती जा रही है जो निसंदेह उत्साहवर्धक और प्रशंसनीय है।

(लेखक अम्बेडकरवादी कवि, दलित चिंतक व सदस्य, हिंदी अकादमी दिल्ली है)


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