img

गुजरात में उभरी युवा शक्ति से सबक ले बीएसपी

गुजरात में ऊना आंदोलन से उभरे दलित नेता जिग्नेश मेवाणी ने गुजरात विधानसभा चुनावों में बनासकांठा जिले की वडगाम सीट पर बीजेपी के उम्मीदवार विजय चक्रवर्ती को 19696 मतों से हरा कर जीत का परचम लहराया है। दूसरी ओर पिछड़े वर्ग के नेता तौर पर उभरे युवा नेता अल्पेश ठाकोर को राधनपुर सीट से जीत हासिल हुई है। उन्होंने भाजपा के सोलंकी ठाकोर को करीब 15000 वोटों से हराया है। हार्दिक पटेल खुद चुनाव नहीं लड़े, लेकिन उनके उम्मीदवार कुछ खास प्रभाव नहीं छोड़ पाए। ये किसी से छिपा नहीं है कि शुरू से बीजेपी के लिए असली चुनौती वही बने हुए थे। जिसके चलते बीजेपी को गुजरात में प्रधानमंत्री मंत्री के जादू के लाख दावों के बावजूद अपनी पूरी ताकत झोंकनी पड़ी। वहीं बीएसपी भी इन चुनावों में पूरी ताल ठोकर मैदान में उतरी थी, लेकिन इस युवा शक्ति के उभरने से उसकी चुनावी रणनीति विफल साबित हुई और उसके प्रत्याशियों का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। गुजरात विधानसभा के इन चुनावों में बीएसपी को केवल 0.7%  (207007) वोट ही मिले हैं। जो बहुत ही चिंता का विषय है।  
 

जिग्नेश मेवाणी- दलित अधिकारों के लिए लड़ने वाले जिग्नेश मेवाणी ने बनासकांठा जिले की वडगाम सीट पर 19696 वोटों से जीत हासिल की है। मेवाणी का मुकाबला बीजेपी के विजय चक्रवर्ती से था और वह यहां पर एक विजेता के तौर पर उभरे। वडगाम एक आरक्षित सीट है और यहां पर मेवाणी को एक आसान जीत हासिल हुई। इस सीट से जब मेवाणी ने बतौर निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव लड़ने का इंतजार किया तो कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली। 36 वर्ष के मेवाणी पेशे से वकील हैं। मेवाणी उस समय खबरों में आए जब गुजरात के ऊना में दलितों पर हुए अत्याचार की खबरें आनी शुरू हुई। मेवाणी ने 'आजादी कूच' नामक एक आंदोलन शुरू किया और अपनी जमीन की मांग करने लगे। विशेषज्ञों की माने तो मेवाणी के मैदान में उतरने की वजह से बीजेपी और प्रधानमंत्री मोदी के लिए लड़ाई को काफी मुश्किल कर दिया था।   


अल्पेश ठाकोर-
40 वर्ष के अल्पेश ठाकोर एक ओबीसी नेता हैं और गुजरात में कांग्रेस की बड़ी उम्मीद थे। अल्पेश ने पाटन के राधनपुर से चुनाव लड़ा था और उनका मुकाबला बीजेपी के सोलंकी ठाकोर से था जो पहले कांग्रेस में थे, लेकिन टिकट न मिलने पर बीजेपी में शामिल हो गए। ठाकोर उस समय चर्चा में आए थे जब उन्होंने एक इंटरव्यू में दावा किया था कि पीएम मोदी रोजाना ताइवान से आने वाले मशरूम खाते हैं जिनकी कीमत लाखों रुपये तक है। अल्पेश को कांग्रेस ने टिकट दिया और इस टिकट के जरिए उसने राज्य के 30 प्रतिशत ओबीसी समुदाय को लुभाने की कोशिश की।  


हार्दिक पटेल-
साल 2015 में पाटीदारों को आरक्षण देने की मुहिम शुरू करने वाले हार्दिक पटेल के लिए चुनाव कुछ खास नहीं रहे, क्योंकि उनके तीनों ही उम्मीदवार चुनाव हार गए हैं। हार्दिक पटेल के नेतृत्व में शुरू हुए पटेल आंदोलन ने बीजेपी की चिंताएं बढ़ा दी थी। हार्दिक पटेल बीजेपी के खिलाफ लगातार माहौल बनाने के लिए हर संभव कोशिश में लगे थे। हार्दिक ने धोराजी से ललित वासोया, जुनागढ़ से अमित थुमार और काटाग्राम से जिग्नेश मेस्वा को टिकट दिया था। भले ही ये नेता जीत हासिल ना कर पाए हों,लेकिन इनकी वजह से बीजेपी की पूरी चुनावी रणनीति गड़बड़ा गई।   

राजनीति में इन तीनों युवाओं ने अपनी जो धमक दी है उससे भविष्य में बड़े बदलावों की उम्मीद जगी है। इन्हें देखकर लगता है कि बेशक नई लाइन खड़ी करना मुश्किल भरा काम है, लेकिन असंभव नहीं है। अगर ईमानदार कोशिश की जाए तो नई लाइन खड़ी ही नहीं की जा सकती बल्कि पुराने पुरोधाओं के लिए सबक साबित हो सकती है।  


बहुजन समाज पार्टी ने भी दोनों राज्यों में अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन दोनों ही जगहों पर प्रदर्शन बहुत ही निराशाजनक रहा है। ऐसे में पार्टी के आलाकमान को ये समझना होगा कि बिना किसी तैयारी और मेहनत के सिर्फ अपने उम्मीदवार मैदान में उतार देने से कुछ नहीं होगा। जो पार्टी देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनने की ओर अग्रसर थी अब वो रेंगती हुई नज़र आ रही है। लोगों से बातचीत में महसूस होता है कि बसपा के समर्थक, कार्यकर्ता और यहां तक की जो पार्टी से मजबूरीवश चले गए या निकाल दिए गए वे भी चाहते हैं कि पार्टी तेजी से दोड़े और बिना किसी नए नेतृत्व और नई लाइन के खड़ी हो। वो इंतजार में हैं कि बहन जी की तरफ से इशारा हो और वो जी जान से अपनी पार्टी को फर्श से अर्श पर लाने की जी-तोड़ मेहनत में जुट जाएं। तो फिर ऐसा क्या कारण है कि ये भावनाएं बहन जी के पास जा ही नहीं पा रही हैं।  


क्या इस बात को नकारा जा सकता है कि कांशीराम जी के बाद से पार्टी का ग्राफ लगातार नीचे गिरता जा रहा है। बहुजन समाज अपने आप को चौराहे पर ठगा हुआ महसूस कर रहा है। आखिर क्या मजबूरी है कि पार्टी नेतृत्व से काम करने का इशारा ही नहीं मिल पा रहा है। जबकि लाखों-करोड़ों लोग बसपा की तरफ उम्मीद के साथ देख रहे हैं। क्या वाकई आज पार्टी में उन लोगों के लिए दरवाजे बंद कर दिए गए हैं, जो कभी उनकी पार्टी हुआ करती थी।  चुनावी नजरिये से देखा जाए तो साल 2012 गया, 2015 गया और 2017 भी अपने अंतिम दौर में है, लेकिन पार्टी के रवैये से ऐसा नहीं लगता कि इनसे किसी तरह का सबक लेने की कोशिश की गई हो। अब ये ईमानदारी से स्वीकार करना होगा कि ‘अभी नहीं तो कभी नहीं'।      


' पड़ताल ' से जुड़ने के लिए धन्यवाद अगर आपको यह रिपोर्ट पसंद आई हो तो कृपया इसे शेयर करें और सबस्क्राइब करें। हम एक गैर-लाभकारी संगठन हैं। हमारी पत्रकारिता को सरकार और कॉरपोरेट दबाव से मुक्त रखने के लिए आर्थिक मदद करें।

संबंधित खबरें

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked with *

3 Comments

  •  

    Comment *

  •  

    ??? ??? ?? ?????? ?? ????? ????? ?? ??? ????? ?? ?????? ?? ?????? ?????? ????? ?? ?????

  •  
    Your Name *
    2017-12-19

    Sir you are absolutely right. Hame aatm manthan karna chahiye sache dil

मुख्य ख़बरें

मुख्य पड़ताल

विज्ञापन

संपादकीय

वीडियो

Subscribe Newsletter

फेसबुक पर हमसे से जुड़े