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आक्रोश और चेतना के विस्फोट का कवि: जयप्रकाश लीलवान

हिंदी दलित कविता के इतिहास पर व्यापक और ईमानदार दृष्टि डाली जाए तो एन.आर.सागर (आजाद हैं हम), मलखान सिंह (सुनो ब्राह्मण) और जयप्रकाश लीलवान (अब हमें ही चलना है) की कविताओं में अन्य दलित कवियों की अपेक्षा नया तेवर और ताप देखने को मिलता है। इन कवियों की कविताएं दलित कविता के विकास क्रम को भी दर्शाती हैं। एन.आर.सागर की कविताओं में जहां पहली बार ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद के विरुद्ध सशक्त आक्रोश और ओज का स्वर मुखरित हुआ तो मलखान सिंह की कविताओं ने ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद से टकराते हुए दलित कविता को सौंदर्यशास्त्रीय आधार प्रदान किया। जयप्रकाश लीलवान की कविताओं में आक्रोश की आग, प्रतिकार का ताप, चेतना चिंगारी और विद्रोह की खदबदाहट है| व्यापकता मेँ देखें तो जयप्रकाश लीलवान की कविता दलित समाज का स्वर, वैचारिकी का तर्क, विमर्श की व्याख्या, चेतना का प्रस्फुटन और क्रान्ति का आह्वान हैं| दमन की शब्दावली मेँ दमन का नकार, शोषक की भाषा मेँ शोषक को ललकार और अन्याय की परिभाषा मेँ अन्याय का प्रतिकार लीलवान की कविता की मुख्य पहचान है| इनमें आक्रोश और तर्क का जबरदस्त मिश्रण है| उनकी कविताओं ने दलित कविता को एक नया मुहावरा और सौंदय प्रदान किया। भाषा की दृष्टि से जयप्रकाश लीलवान की कविता मेँ जहां एक ओर प्राज्जलता का प्राचुर्य है, वहीं दूसरी ओर उसमें देशजता की ठेठता भी देखने को मिलती है| वस्तुत: परिस्थिति और पात्रों के अनुसार वह अपनी कविता की भाषा को रूप देते हैं| गाँव के ठाकुर या चौधरी से टकराते समय उनकी भाषा मेँ जितनी ठेठपन है, ब्राह्मण और बुद्धिजीवियों को चुनौती देते उतनी ही प्राज्जलता है| विचार और भाषा दोनों ही दृष्टियों से कवि लीलवान को कबीर का आधुनिक संस्करण कहा जा सकता है|        

साहित्य में दो तरह की समृद्धि होती है, शब्द-समृद्धि और अर्थ-समृद्धि। शब्द-समृद्धि में शब्दों का महत्व होता है, इसलिए शब्द-समृद्ध साहित्य शब्द केन्द्रित होता है| इसमें शब्दों की नुमाइश, शब्दों के चमत्कार, शब्दों की जादूगरी और शब्द-सौन्दर्य को ही साहित्य की शक्ति और प्राण माना जाता है| इस प्रकार के साहित्य का उद्देश्य पाठक या श्रोता को आनंद की अनुभूति कराना होता है| इसलिए भाषा के साथ-साथ इसमें उस प्रकार की उपमा और अलंकार आदि का प्रयोग किया जाता है, जो पाठक को किसी भी रूप में आनंदित करे| भारतीय समाज में आनंद का सबसे बड़ा स्रोत यौनिकता अथवा भक्ति है, इसलिए शब्द-समृद्ध या लोकरंजन के उद्देश्य से लिखा गया समस्त साहित्य यौन और भक्ति पर आधारित है| भक्ति में भी यौनिकता है| लिंग–पूजा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है| अर्थ-समृदधि में शब्दों को अर्थ देने, उन्हें अर्थवान बनाने पर ज़ोर होता है| अर्थ-समृद्ध साहित्य का उद्देश्य मानव हित या कल्याण होता है| यह वाहवाही या आनंद का नहीं, संवेदना और उपयोगिता का साहित्य होता है| इस साहित्य के केंद्र में मानव-हित, मानव-कल्याण, मानव-अस्मिता और मानव-गरिमा है| इसलिए बहुत स्वाभाविक रूप से यह साहित्य मानव-दुख, मानव-करुणा,  मानवीय शोषण, अन्याय, अपमान, उत्पीड़न, असमानता का खुलकर प्रतिकार करता है तथा इनका समर्थन और पोषण करने वाले व्यक्ति, व्यवस्था और संस्थाओं के प्रति विद्रोह करता है| प्रतिकार और विद्रोह की अपनी एक भाषा और शब्दावली होती है, जो समाज को पुनर्जन्म, परलोक और स्वर्ग-सुख के स्वप्न न दिखाकर इसी जन्म में अपने अभाव, और दुखों से मुक्त होने के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देता है| शब्द समृद्ध साहित्य के केंद्र में जहां कुछ का सुख होता है, वहीं अर्थ-समृद्ध साहित्य के केंद्र में सब का कल्याण होता है| कुछ का सुख से सब का कल्याण अधिक महत्वपूर्ण है| दलित साहित्य शब्द-समृद्धि का नहीं अर्थ-समृद्धि का साहित्य है और जयप्रकाश लीलवान दलित साहित्य के अत्यंत प्रखर और उल्लेखनीय कवि हैं| लीलवान की विशेषता यह है कि अर्थ-समृद्ध होने के साथ-साथ उनकी कविता शब्द-समृद्धि में भी किसी से कम नहीं है| उनकी कविता शब्द और अर्थ दोनों तरह से समृद्ध है। यह अलग बात है कि उनकी शब्द समृद्धि लोकरंजक साहित्यकारों से सर्वथा भिन्न है| कवि लीलवान को शब्दों का अर्थ-ज्ञान है। शब्दों के प्रयोग के द्वारा उन्होंने कई शब्दों को नए अर्थ भी दिए हैं।     

कवि लीलवान की कविता का अपना भाव-बोध है, जिसका आधार समानता, न्याय, भ्रातृत्व और प्रेम है| यह भाव-बोध हिंसा, निषेध और वंचनाओं के विरुद्ध करुणा, प्रेम और सौहार्द्र अर्थात मनुष्यता का संचार करता है, जिसमें परमात्मा, परलोक, प्रारब्ध या पुनर्जन्म के लिए कोई स्थान नहीं है| उनका भाव-बोध मनुष्य को आसक्त या भक्त नहीं, सम्यक ज्ञान और चेतना-संपन्न नागरिक मानता और पहचानता है| किसी भी व्यक्ति को मनुष्य के रूप में देखना, पहचानना और मनुष्यवत व्यवहार करना मानवीय भावबोध है| मनुष्यता का अभाव या लोप व्यक्ति और समाज को संवेदनहीन और पाश्विक बनाता है| पाश्विक व्यक्ति हिंसक, शोषक, असहिष्णु और वर्चस्ववादी होगा, वह मनुष्यवत व्यवहार नहीं कर सकता| वह समूह बना सकता है, समाज नहीं बना सकता| व्यक्ति का समाज बनना ही मनुष्यता या मानववाद का उदय है| साहित्य व्यक्ति को समाज बनाने की एक प्रक्रिया है| जयप्रकाश लीलवान की कविता व्यक्ति को मनुष्य और समाज बनने पर बल देती है| इसमें प्रेम की बुनावट लैंगिकता के आधार पर नहीं मनुष्यता के आधार पर है तथा शोषण और दु:खों से मुक्ति यौन सुख से अधिक महत्वपूर्ण है|       जयप्रकाश लीलवान अपने विचारों में विद्रोह का ज्वालामुखी लिए फिरते थे। लीलवान की कविता की ताकत से मैं प्रारम्भ से ही प्रभावित और प्रशंसक रहा हूं। फुटकर रूप में उनकी कविताओं को सुनता और पढता रहा था। सन 2002 में उनके पहले कविता संग्रह ‘अब हमें ही चलना है’ के प्रकाशन से मुकम्मल तरीके से उनकी कविता की ताकत से परिचित हुआ। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि उनकी कविता ने मुझे चमत्कृत किया। अन्य दलित कवियों से सर्वथा अलग प्रकार के शब्द, बिम्ब और प्रतीकों से युक्त उनकी कविता मुझे दलित साहित्य में एक धमाके की तरह लगीं। मैंने उनके इस कविता संग्रह की समीक्षा लिखी थी, जिसका शीर्षक ही दिया था ‘दलित कविता में धमाका’। यह समीक्षा ‘युद्धरत आम आदमी’ में प्रकाशित हुई थी।          

लीलवान जी के विचारों में एक कड़क या ठेठपन है, जो उनके स्वभाव की कड़क की अभिव्यक्ति है। इस कारण उन्हें समझौता परस्त लोग कभी पसंद नहीं आते थे। इस प्रकार के लोगों से वह अप्रसन्न और क्षुब्ध रहते थे। पारस्परिक विचार-विमर्श और संगोष्ठियों में उनके वक्तव्यों में उनका यह क्षोभ अभिव्यक्त होता था। उनको लगता था कि समझौतावादी लोगों की सत्ता के साथ सांठ-गांठ दलित समाज के हित में नहीं है। उन्हें लगता था कि सत्ता ने अपने हितार्थ इस प्रकार के लोग पैदा कर उनका पोषण किया है। इस तरह के लोगों से उन्हें कोई उम्मीद नहीं थी। लीलवान जी मुझसे चाहते थे कि इस प्रकार के लोगों से दलित समाज को होने वाले नुकसान से बचाने के लिए हमें नेतृत्व की भूमिका में आगे आना चाहिए। जब भी वह मुझसे मिलते थे हमेशा दलित साहित्य ही नहीं, कम से कम हिंदी पट्टी में दलित चेतना आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए मुझसे आग्रह करते थे। मैं सदैव उनसे यही कहता था कि दूसरे क्या कर रहे हैं, इससे परेशान होने की अपेक्षा हमें अपने काम पर केंद्रित रहना चाहिए। सत्ता से समीपी रखने वालों या निजी हितों के लिए दलित समाज के हितों की उपेक्षा या उनका बलिदान करने वालों पर नजर रखना और सावधान रहना आवश्यक है किंतु उनके बारे में ज्यादा सोचकर अपने समय और ऊर्जा को नष्ट करनी की जरूरत नहीं है। हमें अपनी ऊर्जा सकारात्मक कार्यों में ही लगानी चाहिए। लीलवान जी के कविता संग्रह ‘अब हमें ही चलना है’ की एक कविता है ‘कर्दम के लिए’ शीर्षक से, जो इस संग्रह की प्रतिनिधि कविता है। दलित समाज के प्रति लीलवान के मन में कितना दर्द है और समाज की बेहतरी के लिए उनके मन में कितना जुनून है, यह इस कविता से सहज समझा जा सकता है। उनकी इस कविता को ज्यों का त्यों यहा दिया जा रहा है:

‘कर्दम,मेरे दोस्त!/ ठीक मेरी तरह/ तुम्हारी बहिन को भी/
इस देश के जमींदारों की कसाई नजरों से/ रोना आया होगा/
मेरी मां की तरह/ तुम्हारी मां ने भी/
इनकी माणसखाणी करतूतों से/ हमारी सलामती की/ दुआ मांगी होगी/
‘अरे ओ गयन्ढल चुप रह’ जैसे ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के सामने/
तुम्हारे बाप की दाढी भी/ मेरे पिता की तरह/ केवल हिलकर रह गयी होगी/
और तुम भी मेरी तरह/ यही सोचते होगे कि/ जाति-प्रथा के/
इस उमस भरे साम्राज्य को/ अब उलट देना चाहिए।
हो सकता है/ कर्दम, मेरे अजीज दोस्त/
मेरे और तुम्हारे आवास एक न हों/ लेकिन हम पर झपटने वाले/ दमन तो/
एक ही परम्परा के तम्बू से निकलकर/ हमारी गर्दनों तक पहुंचते हैं/
और मुंह अंधेरे मांगे गए सीत से/ बासी खुरचन खाकर/
स्कूल जाने की/ जिद के बावजूद/ मेरी तरह/ तुम्हारे तख्ती-बस्तों को भी/
ठाकुर, जाट, ब्राह्मणों के बिगड़ैल बेटों ने/
फुटबाल की तरह खेलकर/ तुम्हें भी रुलाया होगा/
यही वह दर्द है/ जो मेरे मुंह की बात को/ 
तुम्हारे दिल में दफन/ सच्चाई की सगी बहिन/ बना देता है/
इस कपट भरी/ परम्परा की कमर तोड़ने वाली/
तुम्हारी कलम और मेरी कविता/ आने वाले कल को/ उसकी परिभाषा देगी/
और कपट को/ कला के कपड़े पहनाते आए/ साधुओं के सफर का/
कांटा होना ही/ उनके साथ/ हमारी साझेदारी समझी जाएगी/
अब यह निश्चित है कर्दम, कि उदारवाद का कोई भी साहित्यकार/
जातियों से झुलसती/ तेज धूप में/ प्यासे मर रहे/
हमारे लोगों को/ पानी पिलाने नहीं आएगा/
कर्दम, हमारे हकों की महक/ हमारी पीढियों के/
खाद बन जाने की शर्त पर टिकी है/ सत्ता के चंद्रभान बनने पर नहीं/
और जीवन से इश्क करने की/ मौलिक शर्त यह भी है/
कि आज के उदास समय को/ क्रांति के नग्मों में ढालने के लिए/
जातियों के घास-फूंस में/ माचिस लगाने/ हमें ही चलना होगा।‘
          

भूख और अपमान के दंश के तिलमिलाते, कसमसाते और इससे उबरने के लिए शिद्दत से जूझते कवि जयप्रकाश लीलवान की कविता की चेतना और भाव-बोध को इस कविता के माध्यम से सहज समझा जा सकता है। उनके बाद में प्रकाशित हुए कविता संग्रह‘ नए क्षितिजों की ओर’, ‘समय की आदमखोर धुन’ और ‘ओ भारत माता ! हमारा इंतजार करना’ की कविताओं में उनकी इसी चेतना और भाव-बोध का विस्तार है। हाल ही में उनके एक साथ चार कविता संग्रह एक साथ आए- ‘कविता के कारखाने में’, ‘लबालब प्यास’, ‘धरती के गीतों का गणतंत्र’ और ‘गरिमा के गीतों का गणित’| उनकी चयनित कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद भी इसी साल आया| उनकी बाद की कविताओं में इसी चेतना और भाव-बोध का विस्तार है।          

प्रतिभा सम्पन्न होने के साथ-साथ एक सामाजिक यथार्थ और जातीय संबंधों की गहरी समझ रखने वाले जयप्रकाश लीलवान की कविता का ताप और तेवर एक नए वैचारिक क्षितिज और सौंदर्य-बोध का निर्माण करता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और फासीवाद से लेकर छद्म प्रगतिशीलता के खतरों की उन्हें गहरी पहचान थी। कविता जयकारा, नारा या फतवा नहीं होती। कविता का एक सुदृढ वैचारिक आधार और चेतना की एक स्पष्ट दिशा होती है। अच्छी कविता की यह मौलिक शर्त है। मौलिक दृष्टि, विचार और शिल्प से निर्मित जयप्रकाश लीलवान की कविता बहुत गहराई से इस बात का एहसास कराती है। लीलवान की एक बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने हिंदी कविता के प्रचलित मुहावरों को तोड़कर कई नए मुहावरे गढ़े हैं, और इस प्रकार साहित्य के साथ-साथ हिंदी भाषा को भी समृद्ध किया है। हिंदी दलित साहित्य को चेतना और विचार सम्पन्न बनाने में उनका योगदान बहुत महत्वपूर्ण है|        

जयप्रकाश लीलवान से पहला परिचय 1994-95 के दौरान हो गया था। वह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अन्य छात्रों के साथ वह भी दलित साहित्य के कार्यक्रमों में भाग लेते थे। कार्यक्रमों के पश्चात वह अलग से मिलकर कार्यक्रम के विषय अथवा वक्ताओं के वक्तव्यों पर चर्चा करते थे। वह जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे और यदि कोई विचार उन्हें स्पष्ट नहीं होता था तो वह निस्संकोच सवाल करते थे। इंडियन ऑयल कम्पनी में नौकरी पर लग जाने के बाद वह कार्यक्रमों के अलावा मेरे ऑफिस में आकर भी मुझसे मिलते थे और कई-कई घंटे हम साहित्य और समाज से जुड़े विभिन्न विषयों पर परस्पर चर्चा करते थे। इसके अलावा पारिवारिक परिस्थितियों और समस्याओं पर भी हम लोग बात करते थे। जवाहरलालनेहरू विश्वविद्यालय मार्क्सवाद की पाठशाला रही है। इस पाठशाला के विद्यार्थी होने के कारण उन पर मार्क्सवाद का प्रभाव था। उनके विचार प्राय: मार्क्सवाद की चासनी में सने होते थे। मैंने मार्क्सवाद के उनके ज्ञान की प्रशंसा की किंतु उन्हें यह सुझाव दिया कि दलित समस्याओं के समाधान के लिए अम्बेडकर को पढना और समझना बहुत जरूरी है। अकेले मार्क्सवाद से कुछ होने वाला नहीं है। दलितों की मूल समस्या जाति है और मार्क्सवाद के पास जातिवाद के समाधान का कोई फॉर्मूला नहीं है, और न मार्क्सवादियों की इस ओर कोई रूचि रही है। मुझे खुशी है कि मेरा सुझाव मानकर उन्होंने डॉ. अम्बेडकर को पढ़ा और उनकी वैचारिकता में चमत्कारी परिवर्तन हुआ, जो उनकी कविताओं में परिलक्षित होता है।         

जयप्रकाश लीलवान प्रमुखत: कवि थे और उनकी कविता का लोहा प्राय: उनके सभी पाठकों और आलोचकों ने माना है। किंतु कविता के साथ-साथ उन्होंने गद्य भी लिखा। वस्तुत: कविता की अपनी ताकत, महत्व और प्रभाव है, किंतु विमर्श के आंदोलनों के लिए गद्य कहीं अधिक प्रभावी और आवश्यक होता है। इसलिए लीलवान जी की क्षमता को पहचान कर तथा उनकी प्रगतिशील पृष्ठभूमि, अध्ययन और तर्कशक्ति को देखते हुए मैंने दलित साहित्य (वार्षिकी) के लिए उनसे आग्रह करके लेख लिखवाए। सर्वप्रथम ‘आलोचना’ के फासीवादी विमर्श केंद्रित अंक पर और तत्पश्चात डॉ. रामविलास शर्मा की पुस्तक ‘गांधी, अम्बेडकर, लोहिया और भारतीय इतिहास की समस्याएं’ पर क्रमश: ‘वर्णवादी फासीवाद के विरूद्ध सवर्ण उदारवाद के भ्रमजालों का उर्वरक (‘आलोचना’ का फासीवाद विमर्श)’ और ‘मार्क्सवाद के नकाब में इतिहास, संस्कृति और परम्परा के फूहड़ हिंदूकरण की परियोजना (पंडित रामविलास शर्मा का चिंतन)’ शीर्षक से उन्होंने महत्वपूर्ण आलोचनात्मक लेख लिखे, जो दलित साहित्य (वार्षिकी) के 2001 और 2002 के अंकों में प्रकाशित हुए और पाठकों द्वारा सराहे गए। उनका गद्य किसी भी मायने में उनके पद्य से कमतर नहीं है। उनका दिल्ली से बाहर स्थानांतरण हो जाने और बीच में तीन साल की अवधि के लिए मेरे मॉरिशस चले जाने के कारण हमारा सम्पर्क कम रहा और मैं उनसे कुछ और नहीं लिखवा सका। मेरा विश्वास है कि यदि ये परिस्थितियां उत्पन्न नहीं हुई होतीं तो मैं निश्चित ही उनसे कुछ और गद्य लिखवाता।           

गत वर्ष उन्होंने मुझे बताया था कि उनके एक साथ चार कविता संग्रह प्रकाशन के लिए तैयार हैं और अप्रैल, 2017 तक प्रकाशित किए जाने की योजना है। इनमें से एक कविता संग्रह ‘कविता के कारखाने में’ की भूमिका लिखने का आग्रह उन्होंने मुझसे किया था। साथ ही इस कविता संग्रह का लोकार्पण वह फिल्म अभिनेता आमिर खान से करवाना चाहते थे। आमिर खान से सम्पर्क करने का आग्रह भी उन्होंने मुझे ही सौंपा था। उस समय मेरे पास लगभग पंद्रह पुस्तकें भूमिका लिखने के लिए आयी हुई थीं और भूमिका लेखन में मेरा बहुत समय लग रहा था और मैं इस कारण रचनातमक लेखन नहीं कर पा रहा था। मैंने फेसबुक के माध्यम से लेखक मित्रों से विनम्र निवेदन किया था कि भूमिका के लिए पाण्डूलिपि न भेजें ताकि मैं अपना भी कुछ लिख सकूं। किंतु इसके उपरांत जयप्रकाश लीलवान के कविता संग्रह पर भूमिका लिखना मैंने सहर्ष स्वीकार किया था। लीलवान जी के साथ जिस प्रकार मित्रवत संबंध थे और वह मुझे जितना मान-सम्मान देते थे, उनकी पुस्तक की भूमिका लिखने से मैं इंकार नहीं कर सकता था। लेकिन पुस्तक की पाण्डुलिपि मेरे पास रखी रही और कुछ ऐसा हुआ कि अपनी निजी अस्त-व्यस्तता के कारण पुस्तक की भूमिका नहीं लिख सका और अपनी व्यस्तता के चलते वह भी मुझे याद नहीं दिला सके। कई माह बाद उन्होंने अचानक भूमिका की मांग की तो मुझे अपराध-बोध सा हुआ। मैंने उनसे पंद्रह दिन का समय मांगा किंतु शायद तब तक पुस्तक प्रकाशन के अंतिम दौर में पहुंच चुकी थी और इतना समय नहीं था। अत: एक छोटी टिप्पणी ही मैं उन्हें लिखकर दे सका। उन्होंने यह भी बताया कि उनकी कविताओं को नॉबेल पुरस्कार के लिए विचारार्थ भेजा जा रहा है, और इस हेतु अपनी चुनिंदा कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद उन्होंने स्वयं किया था। इस संदर्भ में मुझसे भी उन्होंने कुछ सामग्री की मांग की थी, जो मैंने उन्हें ढूंढकर उपलब्ध करायी थी।          

जयप्रकाश लीलवान नहीं रहे। यह सुनना अविश्वसनीय था। इतने उत्साही, ऊर्जावान और क्रांतिकारी कवि और वर्षों से दलित साहित्य आंदोलन के घनिष्ठ साथी के बारे में यह सोचा भी नहीं जा सकता था। 23 अगस्त, 2017 की मध्य रात्रि में वह गुड़गांव पुलिस को मूर्छित अवस्था में सड़क किनारे अपनी कार के पास पड़े मिले, जिन्हें पुलिस द्वारा पहले पास के एक सरकारी अस्पताल में और फिर दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के ट्रॉमा सेंटर में लाकर भर्ती कराया गया। ‘एम्स’ के डॉक्टरों द्वारा ‘ब्रेनडेड’ घोषित कर दिए जाने के बाद उन्हें इलाज हेतु गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में ले जाया गया। किंतु, चिकित्सकों द्वारा उनका जीवन बचाने की कोशिशों के उपरांत वह मूर्छा से बाहर नहीं आ सके और 26 अगस्त, 2017 को उन्होंने अपने जीवन की अंतिम सांस ली। अप्रतिम प्रतिभा के धनी तथा साहसी और जुनूनी लेखक जयप्रकाश लीलवान का अचानक रहस्यपूर्ण तरीके से निधन हो जाना बहुत कुछ अधूरा छोड़ गया है।
  
सम्पर्क: बी-634, डी.डी.ए. फ्लेट्स
ईस्ट ऑफ लोनी रोड़,
दिल्ली-110093
फोन- 9871216298,
ईमेल: jpkardam@rediffmail.com

'पड़ताल न्यूज़' जयप्रकाश लीलवान जी को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है। और संदिग्ध हालात में हुई उनकी मौत की जांच की मांग करता है।


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