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'स्वतंत्रता दिवस पर विशेष'- भारतीय संविधान' जन-मन का नायक तो ब्राह्मणवाद-पूंजीवाद खलनायक

ब्राह्मणवाद एक विचार है जो किसी भी व्यक्ति के दिमाग में अपना घर बना सकता है। इस मानसिक बीमारी से ग्रसित व्यक्ति अपने को दूसरे से ऊंचा मानता है। यदि ऐसी धारणा वाले व्यक्तियों का संगठन या समूह बन जाता है, तो वह समाज के भाईचारे के लिए खतरनाक साबित हो जाता है। ब्राह्मणवाद जरूरी नहीं कि ब्राह्मण परिवार में पैदा होने वाले व्यक्ति में ही व्याप्त हो बल्कि यह विचार तो गैर ब्राहम्ण वर्णों के परिवार में पैदा हुए लोगों के दिमाग मे भी घर बना सकता है। उपरोक्त बीमारी से पीड़ित व्यक्ति अपनी जाति को श्रेष्ठ सिद्ध करके दूसरों की जाति को अपनी से नीचा ठहराने की कोशिश करता है। भारत में ऊंच-नीच पर आधारित वर्ण व्यवस्था तथा उसके अंतर्गत जाति व्यवस्था एवं गोत्र व्यवस्था ब्राह्मणी सोच का अमानवीय परिणाम है। 

भारतीय संविधान का मकसद 
हमारे संविधान निर्माताओं ने कहा "हम भारत के लोग, भारत को समता, स्वतंत्रता, बंधुता और न्याय पर आधारित धर्मनिरपेक्ष एवं समाजवादी समाज की रचना तथा संपूर्ण प्रभुसत्ता संपन्न गणराज्य की स्थापना करना चाहते हैं"। इसीलिये भारत के संविधान में ऐसे उपबंध किए गए जिससे अस्पृश्यता का अंत हो। सभी वर्ग के लोगों को सभी तरह के काम-धंधे करने की आर्थिक आजादी हो। वर्ण और जाति के आधार पर किसी को अपमानित नहीं किया जा सके। देश के नागरिको के बीच धर्म, भाषा और संस्कृति के आधार पर कोई भी भेदभाव नहीं हो। इसी तरह के अनेको प्रावधानों के साथ साथ, राजनीतिक आजादी के रूप में हर वयस्क नागरिक को समान मताधिकार दिया गया। जिससे राजनैतिक रूप से प्रत्येक व्यक्ति समानता का अनुभव करने लगा। इन सभी संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद क्या भारत के लोग कह सकते हैं कि भारत में सामाजिक और आर्थिक बुर्जुआ अपने से निम्न लोगों और मजदूरो पर अमानवीय अत्याचार नहीं करते हैं? क्या भारत के सभी धर्मों से सम्बन्धित दलितों, आदिवासियों, मजदूरों और पिछड़े वर्गों के लोगो के लिये शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, भोजन और आवास की समुचित व्यवस्था हो सकी है।

उपरोक्त संबंध में आप इस बात के गवाह है कि अभी बहुत कुछ करना बाकी है। ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लड़ते हुये महामानव बुद्ध, प्रथम बोधिसत्व सम्राट अशोक, संत कबीर, गुरू रविदास, महात्मा फुले, पेरियार नायकर, नारायणा गुरू, छत्रपति शाहू जी महाराज,  द्वितीय बोधिसत्व बाबा साहब डा बी आर अंबेडकर ने अपना जीवन खपा दिया, परन्तु जातियाँ समाप्त नहीं हुईं। 

अपने पूर्वजों के जकवन संघर्ष के परिणाम से सबक लेकर, मान्यवर कांशीराम साहब ने जातियों को समाप्त करने के बजाय शूद्र जातियों को एकत्रित करके उनको बहुजन वर्ग के नाम से पहचान देकर उनको अधिकार संपन्न बनाने हेतु निर्णायक लड़ाई की नींव रखी। 

संविधान में दिये अधिकार तभी प्राप्त हो सकेंगे जब आरक्षित वर्ग की सभी जातियाँ अपनी जनसंख्या के अनुपात में देश के सभी शक्तिश्रोतो में हिस्सेदारी लेने की निर्णायक लड़ाई शुरू करें।

भारतीय संविधान, वंचितों के अधिकारों का राष्ट्रीय दस्तावेज है। राष्ट्रनिर्माताओ की विरासत और अमानत है। न्यायपालिका, विधानपालिका और कार्यपालिका  का मार्गदर्शन है। अनेकता में  एकता, खण्डता में अखण्डता और विभिन्न संस्कृतियों के बीच भाईचारा बनाने की बेमिसाल किताब है भारतीय संविधान। इस राष्ट्रीय कानूनी दस्तावेज पर अगर कोई सिरफिरा उंगली उठाने की कोशिश करता है तो वह हमारी राष्ट्रीय अस्मिता को चुनौती  है। अगर इस तरह के राष्ट्र-द्रोह के कृत्य में लिप्त व्यक्ति खुला घूमता है तो सरकार के लिए यह बड़े शर्म की बात है। 

बाबा साहब अम्बेडकर ने कहा था "संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो परंतु उसके चलाने वाले यदि अच्छे नहीं हैं तो वह अंततः बुरा ही साबित होगा। इसके विपरीत, संविधान कितना भी बुरा क्यों न हो, यदि उसके चलाने वाले अच्छे हैं तो वह अन्ततः अच्छा हक साबित होगा"। 

बाबा साहब ने एक बात और कही थी कि "सामाजिक आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े हुए लोग अपने राजनीतिक समानता के अधिकार 'वोट' का उपयोग वह अपने हित में नहीं कर पायेगे" ।

बाबा साहब के उपरोक्त दोनों वाक्य आज सत्य साबित हुए हैं। आज अगर संविधान के लक्ष्य पूरे नहीं हो सके हैं तो सरकारों की नियत पर संदेह पैदा होता है। दूसरी तरफ वंचित वर्गों में जो नेता पैदा हुए हैं वह अपने-अपने वर्गों के हितों की देखभाल न करके अपनी अपनी राजनीतिक पार्टियों के हितों की चिंता में लगे रहते हैं। सदियों से वंचित रहे वर्गों  के जनप्रतिनिधियों द्वारा अपने राजनीतिक आकाओ की पूजा के प्रति बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने संविधान निर्माताओं की भावना को तोड़ कर रख दिया है।

संविधानिक अधिकारों की वजह से दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों के कुछ प्रतिशत लोगों में खुशहाली जरूर आई है। परन्तु वे ब्राह्मण के सामाजिक स्तर पर कभी नहीं पहुँच सकते हैं। इसलिए वे ब्राह्मणवाद से ग्रसित होकर अपने ही जाति भाइयों के बीच अपने को श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश करते हैं। यह भी संविधान की भावना का निरादर है, एसे लोगों को अपने व्यवहार में परिवर्तन लाना चाहिए।

अर्थव्यवस्था
देश में समाजवाद की स्थापना होगी यह हमारे संविधान का लक्ष्य है। परन्तु उसकी जगह आज पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की स्थापना हो चुकी है। देश के 1%  धनपतियों के हाथों में 73% संपदा इकट्ठी हो चुकी है। यह ऑक्सफाम की रिपोर्ट में दिये गए  ताजा आंकड़े बताते हैं। भ्रष्टाचार पूंजीवाद का पुत्र है। काला धन उसका आभूषण है।

इस समय मोदी सरकार एक ओर  ब्राह्मणवाद के वायरस 'जातिवाद' और साम्प्रदायिकतावाद से ग्रसित है तो दूसरी ओर पूंजीवाद के वायरस 'वैचारिक भ्रष्टाचार' और कारपोरेटिक पक्षपात से ग्रसित दिखाई देती है। परिणामस्वरूप, व्यक्तिवाद 'राष्ट्रवाद' पर हावी है। इन बुराइयों  के काले साये ने मोदी सरकार के अच्छे कामों को भी ढक लिया है। कानून व्यवस्था ठीक से काम नहीं कर पा रही है। पिछले दिनों वंचित वर्गों के हितों से संबंधित न्यायपालिका के कई निर्णय संविधान प्रदत्त अधिकारों के विरुद्ध आये हैं जिससे कमजोर वर्गो में असुरक्षा की भावना घर कर गई है। देश में एक  खास वर्ग द्वारा अछूतपन के प्रेत को फिर से जगाने की कोशिश हो रही है। पिछले दिनों देश के प्रथम नागरिक महामहिम राष्ट्रपति जी  राजस्थान के पुष्कर में स्थित मंदिर और उड़ीसा के जगन्नाथ पुरी मंदिर में  पूजा करने के लिए अपने परिवार के साथ गए थे दौनों ही मंदिरों में प्रवेश करते समय पुजारियों द्वारा अभद्रता का परिचय दिया था।

बुंदेलखंड के हमीरपुर में वहां की स्थानीय दलित महिला विधायक अनुरागी के मन्दिर में प्रवेश करके  लौटने के बाद मंदिर को दूध और गंगा जल से शुद्ध किया गया। दलित और पिछड़े समाज ने इन खबरों की घोर निन्दा की तथा सोशल मीडिया ने कहा कि आजादी का क्या मतलब है। चिंता व्यक्त की गयी है कि देश भारतीय संविधान से या मनुस्मृति से चलता है?      

9 अगस्त 2018 को तो हद ही हो गयी जब भारत राष्ट्र का सर्वोच्च सम्मानित ग्रंथ "संविधान" जिसकी सभी सरकारी ओहदेदार शपथ लेते हैं उसकी प्रति को  कुछ शरारती तत्वों के द्वारा जंतर मंतर पर जलाया गया। संविधान निर्माताओं को भी गाली दी। एसे लोगों द्वारा पिछले दिनों लेलिन, पेरियार, गांधी और अम्बेडकर की  मूर्तियां अलग-अलग राज्यों में तोड़ी। लेकिन एसे शरारती तत्व सरकार और कानून से बिलकुल नहीं डरते। ऐसे लोग किसी के दोस्त नहीं होते वे बाद में अपने निर्माताओं के ही काल बन जाते हैं। संविधानिक पदों पर आसीन व्यक्ति, जनप्रतिनिधि और भारतीय संविधान हमारी राष्ट्रीय  अस्मिता हैं। हमें इन सबका आदर करना चाहिए।     

उपरोक्त घटनाओं से राष्ट्र निर्माण को ख़तरा पैदा होता है। सरकार को इन घटनाओ को हल्के में नहीं लेना चाहिए। कहीं इन घटनाओं के माध्यम से मोदी सरकार की छवि को धूमिल करने की साजिश तो नहीं है?  यह वर्तमान सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।इसकी पूर्ण जांच करके जनता को जवाब देना चाहिए ताकि देश के कमजोर और वंचित वर्ग अपने को सुरक्षित महसूस कर सकें


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