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अटल जी की स्मृति में... मेरी इक्यावन कविताएं : अटल जी को भारतीय होने पर गर्व नहीं

(आज जब इस बात को सोचता हूँ तो लगता है कि यदि आज की तारीख के भाजपा के किसी भी नेता के विषय में ऐसा कुछ लिख दिया गया होता तो या तो ‘देशद्रोह’ का तमगा मिल जाता या फिर जेल की हवा खानी पड़ती। किंतु वो अटल जी ही थे जिन्होंने अपनी सोच पर संघ को हावी नहीं होने दिया। - लेखक)

उल्लेखनीय है कि अटल बिहारी वाजपेयी एक राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ एक कवि भी थे। वे पहली बार  १६ मई से एक जून 1996 तक, तथा फिर 19 मार्च 1998 से 22 मई 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे।  वाजपेयी हिन्दी कवि, पत्रकार व एक प्रखर वक्ता थे। उनकी ‘मेरी इक्यावन कविताएँ’ कवि व राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी का काव्य-संग्रह वर्ष 1995 में छपा जिसका लोकार्पण 13 अक्टूबर 1995 को नई दिल्ली में भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री पी० वी० नरसिंहराव ने किया था। कविताओं का चयन व सम्पादन डॉ॰ चन्द्रिकाप्रसाद शर्मा ने किया है। पुस्तक के नाम के अनुसार इसमें अटलजी की इक्यावन कविताएँ संकलित हैं जिनमें उनके बहुआयामी व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं।    

संयोग से मुझे उनकी ये पुस्तक 1996 में मिल गई थी। मैंने पूरी किताब को तन्मयता से पढ़ा। पुस्तक में संग्रहित कविताओं में अटल जी के संघर्षमय जीवन, परिवर्तनशील परिस्थितियाँ, राष्ट्रव्यापी आन्दोलन, जेल-जीवन, भारतीय समाज की व्यथा- कथा, जातीय व्यवस्था, नारी सम्मान और असम्मान आदि अनेक आयामों की चर्चा देखने को मिलती है। किंतु सामाजिक दुष्प्रभावों के निराकरण की कोई दिशा इस संग्रह की कविताओं में देखने को नहीं मिली। फलत: इस पुस्तक पर कुछ लिखने का मेरा मन हो उठा और मैंने इस पुस्तक की समीक्षा करते हुए जो लिखा उसका संक्षिप्त भाग यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।  

 मैंने लिखा था, ‘ कविता सदैव कवि के मन की बात नहीं होती अपितु कविता में कवि की अनुभूतियों की अभिव्यक्ति/टीस भी होती है जिन्हें व्यक्त कर कवि अपने मन-मस्तिष्क का भार हल्का करने का प्रयास करता है। कविता में आत्मियता की ऊष्मा होती है। कविता जब कवि के मन से उपजी हो तो कविता होती है। किंतु जब एक राजनेता के कवि होने की बात उठती है तो उसकी ईमानदारी कुछ प्रश्न चिन्हित अवश्य होती है क्योंकि किसी भी राजनेता के विचारों में कभी भी स्थायित्व नहीं रहता। राजनीति की मांग के साथ-2 राजनेता का मन-मस्तिष्क भी बदलता रहता है। जिससे उसकी कविता भी प्रभावित हुए बिना नहीं बच पाती। ऐसा नहीं कि राजनेता समाज के दुख-दर्द से अवगत नही रहता है किंतु सच यह है कि वह दुनिया के सुख-दुख को अपने सीने से कभी लगाता। उनके प्रति भावुक नही होता। कोई भी राजनेता आम आदमी दुख-सुख को सत्ता हथियाने के भाव से परिभाषित करता है। इन अर्थों में राजनेता कवि अटल बिहारी की अक्सर कविताएं ईमानदारी से काफी दूर खड़ी नजर आती हैं। अटल जी की कविताएं किसी एक ढाँचे में भी नहीं ढली हैं। उनकी कविताओं में अनुभूतियों का चित्रण जरूर है, ‘मेरी इक्यावन कविताएं’ नामक संग्रह में उनके लड़कपन से लेकर 1995 तक की कविताएं संग्रहित हैं। अटल जी में संवेदलशीलता तो है किंतु हिन्दूवादी कट्टरता का आवरण ओढ़कर आम आदमी की बात करते हुए भी वो आम आदमी से दूर दिखाई देती हैं। बानगी के तौर पर यहाँ इस पुस्तक के पृष्ठ 18 पर छपी ‘पहचान कविता का एक अंश :-
‘आदमी न ऊंचा होता है, न नीचा होता है/ न बड़ा होता है, न छोटा होता है/ आदमी सिर्फ आदमी होता है।’  

इसके विपरीत ‘परिचय’ कविता में वो न केवल आदमियत को अपितु भारतीयता को केवल हिन्दू धर्म की परिधि में देखते रह गए हैं। इस कविता में तो उन्होंने धार्मिक कट्टरता की प्रत्येक हद को भी पार कर दिया है और हिन्दू होने भर को ही अपना परिचय माना है, भारतीय होने का जैसे उन्हे कोई गर्व नहीं है।...यथा ’हिन्दू तनमन,  हिन्दू जीवन/ रगरग हिन्दू मेरा परिचय!’

 उनकी इस पूरी कविता में एक जगह भी भारतीय होने की बात ही नहीं की गई। पृष्ठ 99 पर छपी एक अन्य कविता भी हिन्दू का राग अलापती है। यथा ... हिन्दू-हिन्दू मिलते जाते, देखो हम बढते ही जाते।

उनकी कविताओं में विचार और व्यवहार में अंतर भी देखने को मिलता है।... देखें पृष्ठ 26 उनकी एक कविता का यह अंश :-  
‘न बसंत हो, न पतझड़/ मात्र अकेलेपन का सन्नाटा/ मेरे प्रभु! मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना/ ग़ैरों को गले न लगा सकूँ,/इतनी रुखाई कभी मत देना।’ 

उल्लेखनीय है कि ये वो समय था जब अटल जी प्रधान मंत्री बनने की कतार में सबसे आगे होने का प्रयास कर रहे थे। अटल जी को शायद नारी-जाति का उत्थान भी रास नहीं आता था। तभी तो वो नारी उत्थान को मर्द जाति के पतन की संज्ञा देते हैं। यथा....  
‘मर्दों की तूती बन्द हुई, औरत का बजा नगाड़ा है।’ (पृष्ठ 103)

संग्रह में बहुत सी ईमानदार कविताएं भी हैं जो अटल जी के राजनितिक और भावनात्मक सोच को सही से उजागर करती हैं। उन कविताओं का उल्लेख मैं इसलिए नहीं कर रहा क्योंकि मुझे जिस बात पर आना है, वो पीछे रह जाएगी।    

कहना मैं यह चाहता हूँ कि मेरी समीक्षात्मक टिप्पणी 1996 में ही फरीदाबाद से प्रकाशित ‘निष्पक्ष भारती’ के जून-जुलाई अंक में ‘अटल बिहारी बाजपेयी को भारतीय होने पर गर्व नहीं’ शीर्षक से प्रकाशित हुई थी।  गौरतलब  यह है कि संपादक महोदय नें इस शीर्षक को पत्रिका के मुख पृष्ठ पर मुख्य लीड में पेश किया था। (यह वह दौर थी जब अटल जी ने पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथा ली थी।) हुआ यूँ कि पत्रिका के संपादक नें पत्रिका की कुछ प्रतियां अवलोकनार्थ अटल जी के पास पहुँचा दी थीं। पत्रिका के अवलोकन के उपरांत अटल जी ने पत्रिका के संपादक को ही तलब कर लिया। अपने कविता संग्रह पर मेरे द्वारा लिखे लेख के बारे में जो भी अटल जी ने कहा वो मुझे तब पता चला जब पत्रिका के कार्यकारी संपादक रामानन्द भट्ट मेरे घर पधारे। उनका कहना था, ‘ अटल जी ने संपादक से कहा कि मेरे कविता संग्रह के समीक्षक के घर जाइये और उसकी कमर थप-थपाइये.... कम से कम कोई तो है कि जिसने मेरी पुस्तक की आलोचनात्मक समीक्षा की है, नहीं तो सब तारीफों के पुल बांध रहे हैं।’ मैं यह सुनकर सकपकाया भी, मन ही मन कुछ डरा भी..... कि न जाने इस संदेश के पीछे उनकी मंशा क्या रही होगी। मैंने भट्ट जी पूछा कि सब ठीक तो है ना ?  उन्होंने कहा कि सब ठीक है... कोई और बात नहीं है। मेरा मन कुछ हल्का हुआ। किंतु मैं कई दिनों तक सोचता रहा कि एक प्रधानमंत्री जिसपर पर संघ का ठप्पा लगा हुआ है, वो इतना शालीन कैसे हो सकता है। आज जब इस बात को सोचता हूँ तो लगता है कि यदि आज की तारीख के भाजपा के किसी भी नेता के विषय में ऐसा कुछ लिख दिया गया होता तो या तो ‘देशद्रोह’ का तमगा मिल जाता या फिर जेल की हवा खानी पड़ती। किंतु वो अटल जी ही थे जिन्होंने अपनी सोच पर संघ को हावी नहीं होने दिया।

लेखक:  तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), तीन निबन्ध संग्रह  और अन्य । तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक, आजीवक विजन के प्रधान संपादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।


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