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बहुजनों का कैसे होगा 2018... (नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ विशेष)

हम आज 2017 को कुछ खट्टे और कुछ मीठे अनुभवों के साथ विदा कर रहे हैं। 2018 का आगमन हमारे लिए शुभ रहे, इस उम्मीद के साथ नववर्ष का स्वागत करेंगे। बुद्धिजीवियों का काम है 2017 का सही आंकलन करके तस्वीर पेश करें तथा 2018 को फलदायी बनाने का मार्गदर्शन करें।

हम लोगों  को एक एसा संविधान मिला है जो भारत के हर नागरिक के हितों की रक्षा करने मेें समर्थ है। हमारे संविधान निर्माताओं का सपना था कि आजादी के बाद भारत में सभी धर्मों के लोग अपने-अपने हिसाब से प्रार्थना कर सकें, अपनी-अपनी खाने की आदतों के हिसाब से शाकाहारी या मांसाहारी भोजन कर सकें, किसी भी जाति, वर्ग और संप्रदाय का व्यक्ति कोई भी काम-धंधा और नौकरी अपनी इच्छा और योग्यता के अनुसार कहीं पर भी कर सके। हर जाति और मजहब के व्यक्ति को पूरे देश में कहीं पर भी किसी भी यातायात के साधन से भ्रमण करने, सार्वजनिक स्थानों पर घूमने, बैठक करने, सामाजिक क्रियाकलाप करने, विचार अभिव्यक्त करने, सार्वजनिक संस्थानों से शिक्षण और प्रशिक्षण प्राप्त करने की आजादी है।

परन्तु बड़े अफसोस की बात है, कि 2017 में एक ऐसा संविधान विरोधी माहौल बना जिससे संविधान निर्माताओं के सपने चकनाचूर हो गए। गौहत्या, मांस विक्रय और गोमांस भक्षण के नाम पर दलित और मुस्लिम समुदाय के सैकड़ों निर्दोष व्यक्तियों को सिरफिरे लोगों ने हिन्दुत्व के नाम पर प्रताड़ित किया, उनमें से कुछ तो मौत के शिकार बन गए। इसकी प्रतिक्रिया इतनी प्रबल थी कि गुजरात में भाजपा हार के करीब पहुंच गई। ऊना कांड का हीरो जिग्नेश मेवाणी 51 फीसदी से अधिक मत पाकर निर्दलीय विधायक केे रूप मेेेें विजयी हुए। 

संविधान में यह भी उल्लेखनीय है कि लोकतंत्र स्थापित होने के बाद सभी व्यक्ति जो भारत के नागरिक हैं, वे देश का राजा चुनने में अपनी भूमिका निभाएंगे। जिस समय देश आजाद हो रहा था, उसी समय देश साम्प्रदायिक आधार पर दो हिस्सों में बंट रहा था। उक्त घटना से भारत की ताकत कम होना स्वाभाविक थी। आज भी उसके बीज भारत में  मौजूद हैं जो गाए बजाए कभी न कभी फूट पड़ते हैं। 

आज जब मुसलमानों के ऊपर हिंदू हमला करते हैं तो ऐसा लगता है कि एक भाई दूसरे भाई को मार रहा है। जब दलितों के ऊपर हिंदू भाई हमला करते हैं तो ऐसा लगता है कि दलित हिंदू है ही नहीं। जब जाति धर्म और मजहब के नाम पर सांप्रदायिक दंगे होते हैं तो उसमें एक ही राष्ट्र के लोग आपस में लड़कर राष्ट्र को कमजोर करते हैं।

इस तरह "सबका साथ सबका विकास" का नारा सिर्फ धोखा या दिखावा लगता है। 2018 में  यह सब नहीं दोहराया जाए, इस पर सरकार और शासक पार्टी को गंभीर कदम उठाना होगा। अच्छे दिन लाने के लिए सरकार को कुछ अच्छे काम करने होंगे। 

देश में इस समय अपार बेरोजगारी, आर्थिक तंगी, महगी शिक्षा, कार्मिक अकुशलता, महंगी स्वास्थ्य सेवा, सार्वजनिक सेवा का निजीकरण, राजनीतिक भ्रष्टाचार, महंगा न्याय, ठेकेदारी प्रथा का बोलबाला और बढ़ती आपराधिक घटनाएं इत्यादि बड़ी चुनौतियां हैं। देखना होगा कि सरकार इनसे कैसे निपटती है।

उपरोक्त बिन्दुओं के ऊपर दृष्टि दौड़ाने पर लगता है कि देश संकट के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में हमारी सरकार और समाजसेवियों का दायित्व है कि वह अपनी राजनीतिक लड़ाई, सांप्रदायिक एवं जातीय द्वेष को भूलकर राष्ट्र को सुदृढ़ करने के लिए सामाजिक और आर्थिक विकास के मुद्दों पर अपना ध्यान आकर्षित करें।

देखना होगा कि 2018 मैं हमारी आकांक्षाएं हमें कैसे एकजुट रख सकती हैं। हमारा लक्ष्य होना चाहिए हम इन आवश्यकताओं के अनुरूप काम करें। युवकों में बढ़ते असंतोष को रोकने के लिए उन्हें योग्यता के अनुसार रोजगार मिले। प्रतिव्यक्ति आमदनी बढ़े, हमारा स्वास्थ्य अच्छा रहे जिससे हमारे जनमानस को अच्छे दिनों का अहसास हो।

हाल ही में संसद को प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने रोजगार सृजन और आधारभूत संरचना के वित्तपोषण के लिए कोई रोडमैप तैयार करके नहीं दिया। जबकि उसने  वृहत अर्थव्यवस्था, कृषि और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया है। हाल ही में ऐसा प्रेस के माध्यम से अर्थशास्त्रियों का विचार हमारे सामने आया है। इसमें से कुछ मुद्दे बड़े आशावादी हैं।जिनमें श्रमिकों की कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए कौशल प्रशिक्षण और अर्थव्यवस्था के अनुरूप उत्पन्न हो रहे रोजगारों के साथ तालमेल बिठाने की बात अच्छी है।

ध्यान से देखने पर पता चला है कि उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में लाखों लोग न तो ठीक से पढ़ सकते हैं और ना ही लिख सकते हैं। सरकारी स्कूलों की पढ़ाई का स्तर देखकर ग्रामीण अभिभावक भी अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने के लिए विवश हैं। केवल स्कूलों में नाम लिखाने से उनके आंकड़े तो बढ़ सकते हैं, सर्वशिक्षा अभियान तो चल सकता है, मगर वास्तव में ऐसे बच्चों का भविष्य दिशाहीन ही होगा। नई व्यवस्था में ऐसे लोगों की जगह कहां पर होगी, इनके बिना देश का समग्र विकास सम्भव नहीं है। हमारी सरकार उन्हें हताशा के भंवर से कैसे निकाले, यह ऐसे गंभीर सवाल हैं जो 2017 के साथ पीछे नहीं छूट रहे हैं बल्कि उन्हें हमें 2018 में हल करना होगा।

देश के बड़े निजी अस्पतालों ने गरीब और आम लोगों से महंगे इलाज के चलते अनाप-शनाप बिल वसूली की, यह बहुत शर्मनाक है। आज भी अधिकांश लोगों को इलाज का खर्च खुद उठाना पड़ता है, पैसों के अभाव में बहुत से मरीज मर जाते हैं। 2018 में हमें इसे बदलना होगा और सभी नागरिकों को सरकार द्वारा फ्री हैल्थ केयर की गारंटी  देनी होगी, ताकि कोई मरीज इलाज के अभाव में मरे नहीं।  

सरकार को कानून का राज स्थापित करना होगा। जिसमें  इस वर्ष की तरह गोरक्षा इत्यादि के नाम पर हिंसा न हो तथा घृणा की राजनीति को फैलने से रोका जाए। उम्मीद है कि 2018 में ऐसी घटनाएं बंद होंगी, क्योंकि सब लोग देश में एक बेहतर माहौल चाहते हैं। यदि सरकार इस तरह की घटनाओं को रोकने में विफल रही तो 2019 में भाजपा को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। गुजरात के चुनाव के परिणाम ने इस दिशा में एक संकेत दिया है। इसलिए सरकार का दायित्व है कि 2018 में संविधान की सुरक्षा और सभी नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी दे। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह समाज में भाईचारा पैदा करे तथा समाज को विश्वास दिलाए कि देश में संविधान का राज है।


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