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हिन्दी कविता : स्त्री अबला नहीं होती

जिसकी लहू प्रवाह हर नस में बहती है,
एक रिश्ता जो कभी खफा नहीं होती।
यह जीवन मातृत्व हेतु न्योछावर बारंबार,
यह जीवन मातृत्व हेतु न्योछावर बारंबार,
सबल बनाने वाली मां अबला नहीं होती।

प्यारी दीदी तेरी आंखों में असीम स्नेह है,
पर बिन तेरे झगड़ा-नोकझोंक नहीं होती।
बचपन से जिस आंगन में साथ पले-बढ़े,
घर छोड़ ससुराल जाती बहन अबला नहीं होती।

जब से बगावत कर बैठी जो नूर-ए-महल,
वह जीवनसाथी रूह से जुदा नहीं होती।
कभी हताश हुआ तो मेरी प्रेरणा बनकर समझाए,
ऐसी पत्नी-प्रेमिका कभी अबला नहीं होती।

इंसानियत की दुनिया में इंसान बनो भाई,
मां-बहन-पत्नी कोई अबला नहीं होती।

लेखक- सूरज कुमार बौद्ध,
(रचनाकार भारतीय मूलनिवासी संगठन के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)  


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