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हिन्दी कविता 'प्रजातंत्र'

'प्रजातंत्र'

प्रजातंत्र के हर तंत्र में 
वही पुराना मंत्र है
ये कैसा प्रजातंत्र है ?

लोकतंत्र का झूठा नारा देकर
परिवार तंत्र ही चल रहा
भ्रष्टाचारी ही आगे बढ़ कर
भ्रष्टाचार रोकने का नाटक कर रहा
ये कैसा प्रजातंत्र है ?

जाति और धर्म से
आज हमारी पहचान बनी हुई है
फिर क्यों वे बार-बार नौटंकी करते जाति मिटाने की
जो स्वयं ही जातिवाद फैलाने की षड्यंत्र रचते हैं ?

महंगाई की मार से परेशान जन-जीवन
फिर भी लाज न आए सरकार को
छाती ठोक कहते फिरते हैं
कि महंगाई देती है शक्ति बढ़ते विकास को !

पेट सटा था जिसका पिट से
वह तो कब का जमीन में गया
जिस में भी थी हिम्मत थोड़ी
वह भी अब घबरा गया
क्या यही देश का लोकतंत्र है ?

लेखक- एडवोकेट राम खोब्रागडे


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