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मिर्चपुर दलित हत्याकांड- दिल्ली हाईकोर्ट ने 33 को दोषी करार दिया, 12 को उम्रकैद

शुक्रवार को दिल्ली हाईकोर्ट ने हरियाणा के मिर्चपुर हत्याकांड में दिए गए रोहिणी कोर्ट के फैसले को शुक्रवार को पलट दिया। जस्टिस एस मुरलीधर और आईएस मेहता की बेंच ने एससी-एसटी एक्ट के तहत मामले के 58 आरोपियों में से 33 को दोषी माना। इनमें से 12 को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। 12 दोषियों को 2-2 साल और 9 को 1-1 साल कैद की सजा सुनाई गई है। हाईकोर्ट ने दोषियों को सरेंडर करने के लिए एक सितंबर तक का समय दिया। अगर किसी ने सरेंडर नहीं किया तो गिरफ्तारी वारंट जारी होंगे। कोर्ट ने हरियाणा सरकार को दोषियों पर लगाए गए जुर्माने की राशि का इस्तेमाल पीड़ितों के पुनर्वास के लिए करने का आदेश भी दिया। 

आपको बता दें कि 2011 में रोहिणी कोर्ट में चले इस मामले में कुल 97 आरोपी थे। रोहिणी कोर्ट ने उनमें से 15 को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी। तीन को उम्रकैद, पांच को 5-5 साल की कैद एवं 7 को 2-2 साल की सजा सुनाई थी। 5 नाबालिग आरोपियों का केस हिसार के जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड में केस चला। एक आरोपी को 3 साल की सजा हुई। दिल्ली हाईकोर्ट में 58 आरोपियों के खिलाफ सुनवाई चली। 33 को सजा सुनाई गई है। 

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि आजादी के 71 साल बाद भी दलितों के खिलाफ दबंगों के अत्याचार की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। कोर्ट ने कहा कि जाट समुदाय के लोगों ने वाल्मीकि समुदाय के घरों को जानबूझकर निशाना बनाया। गौरतलब है कि हिसार के इस मामले की निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केस दिल्ली के रोहिणी कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया था। रोहिणी कोर्ट ने कुल 97 आरोपियों में से 15 को सजा सुनाई थी। 

12 दोषियों कुलविंदर, रामफल, राजेंद्र, कर्मवीर, संजय, प्रदीप, राजपाल, प्रदीप पुत्र सुरेश, धर्मवीर, जोगल, सत्यवान, पवन को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है, अन्य 12 दोषी जिनको 2-2 साल की जेल की सजा सुनाई गई उनमें कर्मपाल, धर्मवीर, सुमित, सुनील, मोनू, विकास, अमित, दीपक, प्रदीप पुत्र बलवान, सत्यवान, दयासिंह, राजबीर शामिल है। अन्य नौ  दोषी जो  जिन्हें 1-1 साल की सजा सुनाई गई उनके नाम जोगिंद्र, सोनू, जगदीश, राजेंद्र पुत्र धूपसिंह, रोशन लाल, सत्तु, प्रदीप पुत्र सतबीर, बलवान, जसवीर है। 


पीठ ने अपने 209 पृष्ठ के फैसले में कहा, ''19 एवं 21 अप्रैल 2010 के बीच मिर्चपुर में हुई घटनाओं ने भारतीय समाज में नदारद उन दो चीजों की यादें ताजा कर दी हैं जिनका उल्लेख डॉ. बी आर आंबेडकर ने 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा के समक्ष भारत के संविधान का मसौदा पेश करने के दौरान किया था। इनमें से एक है 'समानता और दूसरा है 'भाईचारा।

इस मुकदमें में जिन्होंने गवाही नहीं दी, वे लोग गांव में जाकर रहने लगे। लेकिन जिन्होंने गवाही दी, वे जाटों के खौफ और धमकियों के कारण गांव नहीं जा पाए। और इस वजह से राज्य सरकार को उनके लिए अलग से ढंढूर में टाउनशिप बनाने का निर्णय लेना पड़ा था। पीड़ित पक्ष के वकीलों ने बताया कि फैसले के बाद गवाहों की जान को खतरा है। अभी दोषियों की गिरफ्तारी नहीं हुई है। इसलिए शनिवार को हाईकोर्ट में याचिका दायर कर 29 गवाहों और उनके परिवारों को फिर से सुरक्षा मुहैया कराने की मांग करेंगे। 

गौरतलब है कि 20 अप्रैल 2010 को मिर्चपुर में कुतिया को पत्थर मारने पर विवाद हुआ था। जाट समुदाय के लोगों ने 21 अप्रैल को वाल्मीकि बस्ती को घेरकर आगजनी व हिंसा की थी। इसमें 18 घर पूरी तरह जला दिए गए थे। वाल्मीकि समुदाय के बुजुर्ग ताराचंद व उनकी दिव्यांग बेटी सुमन जिंदा जल गई थी। 50 लोगों को चोटें आई थी। इस घटना के बाद फैले डर की वजह से दलित समुदाय के 150 से ज़्यादा परिवारों को मिर्चपुर गांव से पलायन करना पड़ा था। 

विनोद लाहोट
विनोद लाहोट
संवाददाता
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