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संत रविदास जी का समतामूलक दर्शन आज भी प्रासंगिक

समय-समय पर अनेकों संतों गुरुओं और महापुरुषों ने सामाजिक और आर्थिक विषमता के खिलाफ संघर्ष किया है। उनमें से संत शिरोमणि गुरु रविदास जी का समतामूलक दर्शन प्रमुख रुप से आज भी याद किया जाता है। संत गुरु रविदास मध्यकाल में उस समय पैदा हुए थे, जब देश में मुस्लिम शासकों का राज था।

उस समय अनेकों कुरीतियां समाज में व्याप्त थीं। अशिक्षा और भुखमरी जैसी समस्याएं चिंतनीय थीं। सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक असमानता चरम पर थी। सामंतशाही का बोलबाला था; मजदूरों, किसानों, दस्तकारों की कोई हैसियत नहीं होती थी। अन्याय, अत्याचार के खिलाफ कोई भी अवाज नहीं उठा सकता था। अछूत जातियों पर दोहरी मार पड़ती थी। हिन्दू होने की वजह से मुस्लिम शासकों की मार तो नीच होने की बजह से ब्राह्मणवादी व्यवस्था की मार झेल रहे थे। गरीबी का कारण सामंती व्यवस्था थी तो नीच और अछूतपन का कारण ब्राह्मणवादी व्यवस्था रही है। इसलिए संत रविदास जी ने चिंतन करने के बाद तत्कालीन सामंतवादी राज व्यवस्था तथा ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था पर जोरदार प्रहार किया। इस सम्बन्ध में उनकी निम्नांकित पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं :-

"ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिले सबन को अन्न। छोट-बड़े सब सम बसें, रैदास रहें प्रसन्न।।

इस तरह उन्होंने समाजवादी विचारधारा को अपनाने वाले  शासन की वकालत की थी। ऊंच नीच पर आधारित ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ समानता पर आधारित श्रमण सामाजिक व्यवस्था की वकालत उपरोक्त पंक्तियों में की है। ऐसा लगता है संत रविदास जी राजशाही की जगह लोकशाही पसंद करते थे। वह चाहते थे कि अमीर और गरीब सभी सामाजिक रुप से ऊंच-नीच की भावना का परित्याग करके समान रूप से सम्मान पूर्वक रहें। ऐसी राज व्यवस्था चाहते थे जो छोटी बड़ी जाति के  सभी देशवासियों के साथ समानता का व्यवहार करे। कोई भी भूखा नहीं मरे सभी को अन्न मिलता रहे, सभी को शिक्षा मिले। गरीबी के कारण लोगों की अकाल मृत्यु न हो।

उनका मानना था कि कोई भी व्यक्ति काम के बिना बेरोजगार ना रहे। सभी लोग अपना-अपना काम करके खाएं। एक व्यक्ति या वर्ग दूसरे व्यक्ति या वर्ग पर बोझ न बने। इस तरह, वह ब्राह्मणवादी दर्शन के सख्त खिलाफ थे। ढोंग, आडंबर और हरामखोरी मैं उनका विश्वास बिल्कुल नहीं था। उनका मानना था कि "मन चंगा तो कठौती में गंगा" उक्त पंक्तियों का मतलब है कि यदि आपका मन निर्मल है तो मन्दिर-मस्जिद, गंगा या तीर्थ जाने की जरूरत नहीं है। वे व्यक्ति के कर्म को ही भगवान मानते थे। यदि सभी व्यक्ति काम करेंगे तो देश में संपन्नता आएगी। एक-दूसरे से छीना झपटी बंद होगी। कानून व्यवस्था दुरुस्त रहेगी। इस तरह से एक आदर्श राज्य की स्थापना करना उनका उद्देश्य था।

संत रविदास जी ने आजीवक, श्रमण और नाथ संस्कृति को आगे बढ़ाया है। उक्त संस्कृति किसानों, मजदूरों, दस्तकारों एवं सेवाकर्मियों के हितों की सुरक्षा करती रही है। उक्त संस्कृति की रक्षा करने के लिए मान्यवर कांशी राम जी ने बहुजन समाज के नाम से पुनर्स्थापना की थी। आज बहुजन संस्कृति उपरोक्त संस्कृतियों का संगठित रूप है जिसको मानने वाले लगभग 85 प्रतिशत लोग भारत में मौजूद हैं। असमानता पर आधारित वैदिक या सनातनी संस्कृति सिर्फ ब्राह्मण वर्ण की हितैषी हो सकती है बहुजन समाज की नहीं।

आज सामंतवाद की जगह पूंजीवाद ने ले ली है और ब्राह्मणवाद की जगह संघवाद ने ले ली है। इसलिए, यह चिंता का विषय है कि भारत में आर्थिक असमानता बढ़ती ही जा रही है। गरीबी उन्मूलन पर काम करने वाली संस्था ‘ऑक्सफैम’  की रिपोर्ट के मुताबिक, बीते साल भारत में जितनी संपत्ति पैदा हुई, उसका 73 प्रतिशत हिस्सा देश के 1 फीसदी धनाढ्य लोगों के हाथों में चला गया, जबकि नीचे के 67 करोड़ भारतीयों को इस संपत्ति के सिर्फ एक फीसदी यानी सौवें हिस्से से संतोष करना पड़ा है। 2016 के इसी सर्वे के अनुसार, भारत के 1 फीसदी सबसे अमीर लोगों के पास देश की 58 फीसदी संपत्ति थी। हमारे यहां इतनी तेज बढ़ती असमानता दुनिया के नामी अर्थशास्त्रियों को भी चकित किए हुए है।

1 जनवरी 2018 को हुआ कोरेगांव का संघर्ष सामाजिक विषमता के मूल का परिणाम है तो उपरोक्त ‘ऑक्सफैम’ की रिपोर्ट' आर्थिक असमानता का उदाहरण है। किसानों की घटती आमदनी, युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी, मजदूरों की मजदूरी में कटौती के कारण आर्थिक असमानता के चलते आज हर जगह आम जनता में भारी आक्रोश है। जिसकी अभिव्यक्ति अराजकता और हिंसक प्रदर्शनों में हो रही है। अमीरों के पास संपत्ति इकट्ठा होने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इस संपत्ति का बड़ा हिस्सा अनुत्पादक होकर अर्थतंत्र से बाहर हो जाता है। उनका उपभोग न तो उत्पादन में कोई योगदान करता है, न ही उससे विकास दर को गति मिल पाती है।

वह प्लेटो की तरह से स्वप्नलोकिय दार्शनिक  नहीं थे। बल्कि वे व्यवहारिक चिंतक थे। वे एक अच्छे कवि, दार्शनिक, क्रांतिकारी, समाजवादी, चिंतक, अर्थशास्त्री, समाज सुधारक एवं संत शिरोमणि के रूप में जाने जाते हैं। उनके ऊपर अभी लेखन की बहुत आवश्यकता है। बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने संविधान में समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय की जो व्यवस्था की है, वह संत रविदास जी के दर्शन में परिलक्षित होती है। वह तथागत बुद्ध के दर्शन के हिमायती दिखाई देते हैं। महात्मा फुले का सत्यशोधक दर्शन गुरु जी के दर्शन से प्रेरित है। संत रविदास का व्यक्तित्व-दर्शन बहुआयामी है। आज की विषम परिस्थितियों में संत शिरोमणि गुरु संत रविदास जी का समतामूलक दर्शन बहुत ही प्रासंगिक है।


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