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गुजरात के सबक से 2019 में किसकी राह होगी आसान

गुजरात में हुए तजा विधानसभा के चुनावी परिणामों के हिसाब से भाजपा जीत गयी है, उसे 49 फीसदी वोट शेयर के साथ 182 में से केवल 99 यानी 54 फीसदी सीटें मिली हैं। गुजरात में इस बार कांग्रेस हारने के वाबजूद  उत्साह में दिख रही है, उसने अपने सहयोगियों को मिलाकर 42.7 फीसदी वोट शेयर के साथ 182 में से 81 यानी 44.5 फ़ीसदी सीटें जीती हैं। इस बार कांग्रेस ने भाजपा की 2012 की  पुरानी सीटों में से 32 सीटें छीन ली हैं। अभी बसपा को गुजरात में मात्र 0.7 फीसदी वोट शेयर के साथ एक भी सीट नहीं मिल सकी है। वहीं भारतीय ट्राइबल पार्टी का कांग्रेस के साथ समझौता था, उसे 0. 7 फीसदी वोट शेयर पर दो सीटें भी मिल गयी हैं। यदि बसपा का भी कांग्रेस के साथ समझौता होता तो वह भी कम से कम 5 सीटें जीत जाती। बसपा+भारतीय ट्राइबल पार्टी+एनसीपी का कांग्रेस के साथ  गठबंधन उक्त चारों पार्टियों की सरकार बना सकने के लिए काफी था। धर्मनिरपेक्ष तथा बहुजन समाज की हितैषी पार्टियों को गुजरात, उत्तर प्रदेश के तजा चुनाव परिणामों से सबक लेकर 2019 के लिए गठबंधन की अभी से तैयारी शुरू कर देनी चाहिए।     
 
 

राहुल गांधी के लिए यह अच्छा मौका है, जिनकी पार्टी के अध्यक्ष पद पर अभी-अभी ताजपोशी हुई है। 2019 के लोक सभा चुनाव को जीतने के लिए, उत्तर प्रदेश में सपा+बसपा+कांग्रेस+लोकदल का गठबंधन जरुरी है, जो 80 में से कम से कम 60-65 सीटें दिला सकता है। हर प्रदेश में विश्लेषण के आधार पर सही पार्टियों के साथ धर्मनिरपेक्ष गठबंधन, कांग्रेस तथा अन्य बहुजन हितैषी पार्टियों के लिए संजीवनी का काम करेगा। गठबंधन होने पर धर्मनिरपेक्ष और बहुजनवादी सामाजिक संगठनों का भी भरपूर सहयोग मिल सकता है।  

इस बार कांग्रेस के वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी हुई, लेकिन भाजपा के प्रति जो आक्रोश जनता में था उसे कांग्रेस अपनी तरफ नहीं खींच पाई। चुनाव अभियान का पूरा दारोमदार राहुल गांधी पर रहा। कांग्रेस का कोई राज्य स्तर का नेता, कोई चेहरा इस चुनाव में नहीं दिखा। जिग्नेश, अल्पेश और हार्दिक  तीनों युवा चेहरे गुजरात कांग्रेस की मजबूती बन गए। इन चेहरों का उपयोग कन्हैया कुमार के साथ राष्ट्रीय स्तर पर किया गया तो परिणाम काफी सकारात्मक होगा जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। 



राहुल गांधी हिंदी में बोलते थे और मोदी गुजराती में इसलिए मोदी राहुल राहुल की अपेक्षा जनता से ज्यादा जुड़े हुए नजर आए। आखिर वह 'धरती पुत्र' से, 'गुजरात की अस्मिता', 'गुजरात की आन-बान और शान' थे, जिन्हें एक अति उत्साही और आक्रमक कांग्रेस नेता ने' नीच' कहकर ओबीसी समुदाय को, जिससे मोदी आते हैं, कांग्रेस के खिलाफ लामबंद कर दिया। हार्दिक पटेल के अनामत आंदोलन के चलते ओबीसी समुदाय के वोटों को कांग्रेस ठीक से मैनेज करने में विफल रही, जो संख्या में पाटीदारों से कई गुना ज्यादा है जिसका भाजपा को फायदा मिला।  ऐसे ओबीसी वोटर जो अल्पेश ठाकोर के नेतृत्व में पाटीदारों को ओबीसी कोटे के तहत आरक्षण का विरोध करते थे वे भाजपा के साथ चले गए। अल्पेश के और हार्दिक के दबाव में कांग्रेस ने तीस से अधिक वफादार पार्टी कार्यकर्ताओं की कीमत पर नए लोगों को टिकट दिए, जो भारी असंतोष और अंतर्कलह का कारण बना। भाजपा के प्रति किसानों में, व्यापारियों में दर्जनों कारणों से नाराजगी थी, लेकिन कांग्रेस को वोट देने की अपेक्षा उन्होंने अपना वोट नोटा को दिया। इस बार गुजरात के 5.5 लाख लोगों ने नोटा को पसंद करके भाजपा और कांग्रेस दौनों को ख़ारिज कर दिया। इन सबके बावजूद पिछले 22 सालों में कांग्रेस का जनाधार गुजरात में 38-39 प्रतिशत पर सिमटा था वह बढ़कर 42 प्रतिशत की ऊंचाई पर जा पंहुचा, ये कांग्रेस के लिए एक सकरात्मक संकेत है।  

भाजपा की जीत के पीछे मोदी मैजिक, नेताओं का ईवीएम की मशीनों में गड़बड़ी का आरोप, अमित शाह का जाति प्रबंधन के तहत वोट काटने के लिए अनगिनत निर्दलीय उमीदवारों को खड़ा किया जाना इत्यादि कारण गिनाये जा  सकते हैं। भाजपा ने वोटों को बिखेरने के लिए बड़ी संख्या में निर्दलीय मुस्लिम उमीदवार मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में उतारे। भाजपा की यह चिरपरिचित रणनीति उजागर हो चुकी है इसलिए इसकी काट के लिए रणनीति बन सकना भी संभव है। मोदी-अमित शाह गुजरात का  विधानसभा चुनाव तो जीत गए लेकिन उनकी आगे की राह कठिन है। 2019 की राह किसकी आसान होगी यह समय बताएगा।


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