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'मायावती' देश की सबसे सशक्त नेता

हमारे यथास्थितिवादी समाज में निम्न जातियों  के लोगों का ऊंची जाति वाले लोग अपमान और जातीय उत्पीड़न करते हैं। ठीक इसी प्रकार पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न मर्द लोग करते हैं। इस मनुवादी व्यवस्था में दलित पुरुष केवल जातीय उत्पीड़न का शिकार होते हैं। वहीं सवर्णों की महिलायें केवल लैंगिक उत्पीड़न का शिकार होती हैं। परंतु हैरान करने वाली बात यह है कि दलित महिलायें दोहरे उत्पीड़न की शिकार होती हैं। उनको एक तरफ महिला होने के नाते लैंगिक उत्पीड़न तो दूसरी ओर दलित महिला होने के नाते जातीय उत्पीड़न का दंश भी झेलना पड़ता है। गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, भूमिहीनता, ग्रह हीनता, अशिक्षा, शारीरिक दुर्बलता, इत्यादि कमजोरियों का इलाज तो आसान है, परंतु जाति और लैंगिक असमानता  दूर करना मुश्किल काम है। यह लड़ाई काफी लंबे अरसे से चली आ रही है। इसके बावजूद भी उत्पीड़न में बहुत ज्यादा कमी नहीं आई है। सिर्फ उसका स्वरूप बदल गया है। दोहरे उत्पीड़न की लड़ाई महात्मा फुले, सावित्रीबाई फुले, डॉ. भीमराव अंबेडकर और कांशी राम ने लड़ी थी जो आज इतिहास में दर्ज है। हांलाकि एक ब्राह्मण समाज सुधारक महर्षि डॉ धोंडो केशव कर्वे ने भी महिला शिक्षा और विधवा विवाह के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। उनके द्वारा मुम्बई में स्थापित एस एन डी टी महिला विश्वविघालय भारत का प्रथम महिला विश्वविघालय है। वे वर्ष 1891 से वर्ष 1914 तक पुणे के फरगुस्सन कालेज में गणित के अध्यापक थे। उन्हे वर्ष 1958 में पडित नेहरू सरकार ने भारत रत्न से सम्मनित कर दिया। परन्तु दलित होने के नाते सबसे बड़े विद्वान समाज सुधारक बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर को लम्बे समय तक नजरअंदाज किया, उनको मरणोपरांत 1990 में भारत रत्न मिल सका। हो सकता है इस बार बहुजन आंदोलन के तेज होने के नाते 2019 से पहले कांशी राम जी और महात्मा फुले को भी यह सम्मान मिल जाये।
 
कांशीराम जी की चाहत थी कि देश और समाज को एक ऐसा नेतृत्व मिले जो जाति और लैंगिक उत्पीड़न के खिलाफ सशक्त संघर्ष करने में सक्षम हो। कांशी राम एक ऐसी दलित महिला की तलाश में थे जो महिला उत्पीड़न और दलित उत्पीड़न के खिलाफ सशक्त संघर्ष कर सके।उनकी सोच थी, एसा नेतृत्व ही समग्र बहुजन समाज के हितों को सुरक्षित रख सकता है। इस काम के लिए उन्होंने मायावती को चुना और तैयार किया। मायावती को समस्त दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और आकलियतो की ‘बहनजी’ के रूप में जाना जाने लगा। कांशीराम जी के सामने ही मायावती ने बहुजन समाज पार्टी के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए ऐसा कमाल करके दिखाया, कि लोग उनको आयरन लेडी कहने लगे। आयरन लेडी की छवि से महिलाओं और दलितों के उत्पीड़न में भले ही बहुत कमी ना आई हो, परंतु इस वर्ग में संघर्ष करने की क्षमता का विकास जरूर हुआ। मायावती के बढ़ते कद से मनुवादी और पूंजीवादी वर्ग घबरा गया।
 
यथास्थितिवादी व्यवस्था को बरकरार रखने वाले ब्राह्मणवादी तथा पूंजीवादी लोगों ने मायावती के संघर्ष को शिथिल करने के लिए उन्हें सामाजिक सम्मान तथा पूंजी के मोह में फंसाने का मायाजाल बिछाया जिसमें एक शेरनी फंस गई। यहाँ तक कि उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहते मायावती ने 2007 में सवर्ण जातियों के नेताओं के दबाव में आकर अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निरोधक अधिनियम 1989 को निष्प्रभावी कर दिया, जिसका दलित समाज में नकारात्मक सन्देश गया। तभी से दलितों और महिलाओं का अनादर होने लगा और उनके ऊपर जुर्म ज्याद्ती बढ़ने लगी। परिणामस्वरूप, यथास्थितिवादी राजनीतिक पार्टी 'भाजपा' का देश और प्रदेशों की सत्ता पर कब्जा हो गया।
 
आज देश में महिलाओं, दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के  उत्पीड़न की घटनाएं लगातार बड़ रही हैं। सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों (SC/ST/OBC) के आरक्षण को निष्प्रभावी करने का षडयंत्र शासन, प्रशासन और न्यायपालिका के संरक्षण में योजनावृद्ध ढंग से जारी है। चुने हुए दलित और पिछड़ों के प्रतिनिधि अपने समाज के हितों पर बोलने में नाकाम साबित हुए हैं। पिछड़े समाज के चुने हुए प्रतिनिधियों की निगरानी में स्वयं सेवकों को लगाया गया है। अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों पर लगातार कुठाराघात हो रहा है। दलितों-आदिवासियों और पिछड़ी जातियों को आपस में लड़न का प्रयास हो रहा है। सामाजिक समरसता के नाम पर बहुजन समाज की जातियों के लोगों को गुमराह किया जा रहा है। शैक्षिक संस्थानों में जातीय भेदभाव के चलते  दलित और अल्पसंख्यक छात्रों की संस्थागत हत्या हुई हैं। निष्पक्ष पत्रकारों की बोलती बंद कर दी गई है। दलितों के अत्याचार क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के दफ्तर में न पहुंच सकें, इसी प्रयोजन के लिए दलित उत्पीड़न विरोधी अधिनियम 1989 को निष्प्राण करने का काम किया गया है।
 
उत्तर प्रदेश में हुए सपा बसपा के समझौते ने सत्ताधरी पार्टी के होश उदा दिए हैं। फूलपुर और गोरखपुर की लोकसभा सीटों के चुनाव परिणाम 14 मार्च 1018 को आये जिसमें दोनों सीटें सपा ने जीत लीं। 15 मार्च 2018 को बसपा के संस्थापक बहुजन नायक कांशीराम की 84 वीं जयंती के अवसर पर सपा और बसपा ने संयुक्त रूप से ख़ुशी मनाई। 20 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दलितों पर होने वाले अत्याचारों को रोकने हेतु बने अत्याचार निरोधक अधिनियम 1989 को कमज़ोर करने का फ़ैसला सुनाया गया। जिसके अनुसार कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के बाद अब एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामलों में तत्काल गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी गयी है और साथ ही अग्रिम जमानत पर से रोक को हटा दिया गया है। भाजपा ने उक्त फैसले पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, और न ही दलित सांसदों ने कुछ बोला। इससे लोगों को लगा कि भाजपा ओबीसी और दलितों को लड़ाने के मकसद से चुप है, और ओबीसी की प्रतिक्रिया देख रही है। परन्तु दो अप्रेल की प्रतिक्रिया देख कर सरकार की तरफ से ‘रिव्यू पिटीशन’ दाखिल की और कहा की सुप्रीमकोर्ट से संतोषजनक फैसला न आने पर सरकार अध्यादेश लाने के लिए तैयार है।
 
इस फ़ैसले का देशभर में विरोध हुआ और 2 अप्रैल को क़ानून के बदलाव के विरोध में भारत बन्द का भी आह्वान किया गया था। जो पूरी तरह से सफल रहा। भाजपा को छोड़ कर सभी राजनीतिक पार्टियों तथा बहुजन समाज की सभी जातियों और धर्मों ने बंद का पूरी तरह समर्थन किया। साथ-साथ यूनिवर्सिटी में छात्रों के बीच भी पर्चे बाँटे और जगह-जगह नुक्कड़ सभाएँ की गयीं। आज दलित उत्पीड़न सम्बन्धी घटनाओं का आँकड़ा उठाकर देखें तो पता चलेगा कि हर दिन दो दलितों की हत्या कर दी जाती है और प्रतिदिन औसतन 6 स्त्रियाँ बलात्कार की शिकार होती हैं। 2007 से लेकर 2017 के बीच में दलित विरोधी अपराधों में 66 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। 2016 में ही सिर्फ़ 48000 से ज़्यादा मामले दर्ज हैं। ऐसे में क़ानूनों को कमज़ोर बनाना सरकार की दलित विरोधी मानसिकता को ज़ाहिर करता है।
 
दो अप्रेल के भारत बंद से भाजपा सरकार की नीद खुल गयी, दलित हितैसी पार्टियों सहित बहुजन समाज पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने इसे गंभीरता से लिया। उन्होंने सोचा अब बहुजन समाज के बुद्धिजीवी वर्ग की चाहत के अनुकूल राजनीति करनी होगी।  परिणामस्वरुप मायावती, अखिलेश यादव, देवेगौड़ा, शरद पवार, ओम प्रकाश चौटाला, लालू प्रसाद यादव, शरद यादव, जीतन राम मांझी, सावित्रीबाई फुले जैसे भाजपायी तथा बहुजन राजनीति करने वाले छोटी पार्टियों के नेताओं ने आपसी सहमति बनाना शुरू कर दिया। अगर इन नेताओं की उपरोक्त मुहिम साकार होती है, तो निश्चित तौर पर बहुजन राजनीति सत्ता की धुरी बन जाएगी। 2019 के लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज के वोटरों को सख्त निर्णय आज ही लेना होगा। यदि अपना उत्पीड़न रोकना है तो बहुजन राजनीति को सशक्त बनाने के लिए वोटों को बटने से रोकना होगा। नकारात्मक वोटिंग की जगह सकारात्मक वोटिंग करनी होगी। ताकि बहुजन समाज के सच्चे और अच्छे प्रतिनिधि जीतकर विधानसभा और लोकसभा में जा सकें। याद रहे, हमारे उत्पीड़न में हमारे समाज के लोग भी जिम्मेदार हैं, जो मनुवादी दलों के एजेंट के रूप में अपने निजी स्वार्थों के चलते समाज को बरगला कर अपना उल्लू सीधा करते हैं। देश के अधिकांश लोग आज विभिन्न तरह के सरकारी, सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक उत्पीड़न के शिकार हैं। 
 
लैंगिक उत्पीड़न को रोकने में पुरुष नेतृत्व सक्षम साबित नहीं हो सकता है। महिलाएं पुरुष नेतृत्व को पसंद नहीं करती हैं। लैंगिक उत्पीड़न के खिलाफ नेतृत्व में ममता बनर्जी और सोनिया गांधी जैसे नेता सक्षम साबित हो सकते हैं। परंतु उच्च जाति की महिला होने के कारण बहुजन समाज के लोग उनका नेतृत्व स्वीकार नहीं कर पायेंगे। इसलिए बहुजन समाज के स्त्री और पुरुष की पसंद देखनी पड़ेगी। आज बहुजन समाज राष्ट्रीय नेतृत्व में अपनी हिस्सेदारी चाहता है। ऐसे में मायावती ही एकमात्र दलित वर्ग की सशक्त महिला नेता हैं जिन्हें बहुजन समाज का समर्थन मिल सकता है। वे उपरोक्त संदर्भ में एक सक्षम नेता साबित हो सकती हैं। ऐसा होने से बहुजन समाज पार्टी का ग्राफ तो बढ़ेगा ही परंतु अन्य बहुजन दलों का ग्राफ भी बढ़ेगा। इसके साथ ही सशक्त महिला के नेतृत्व में  महिलाओं, अल्पसंख्यकों और दलितों का उत्पीड़न रुकने में भी मदद मिल सकती है।

आज का समय जगजीवन राम का नहीं है, जब उन्हे दलित होने के नाते दो बार प्रधान मंत्री पद तक पहुँचने से सवर्ण मानसिकता के नेताओं ने रोका था। कांशी राम जी ने 1984 में बहुजन समाज पार्टी इस लिए बनाई थी कि केवल बहुजन समाज के वोटों को तैयार करके अपने दम पर पार्टी को राष्ट्रीय दर्जा दिलाकर अपना प्रधानमंत्री बनायेंगे। आज समय अनुकूल दिखाई दे रह है।  उत्तर प्रदेश की तर्ज पर दलित, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का गठजोड़ बनाने की कोशिश जिस तरह बहुजन समाज पार्टी अन्य प्रदेशों में कर रही है, उससे लगता है 2019 में बहुजन की बहनजी राष्ट्र की बागडोर संभाल सकती हैं।   


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2 Comments

  •  
    Kali Charan
    2018-05-02

    Ideas are based on common opinion of SC/ST/OBC people now time is very sort to take concrete decisions like do and die for our future generation.

  •  
    Your Name *
    2018-05-02

    I like Thanks

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