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दलितों को गुमराह करती राजनीति

2019 में लोकसभा चुनाव होना अपेक्षित है। समय पर चुनाव होंगे कि नहीं, यह एक बड़ा प्रश्न है। कारण ये है कि भाजपा के पिछ्ले चार वर्ष में सामान्यत: कुछ विकास दिखा ही नहीं है सिवाय इसके कि कभी गाय के नाम पर, कभी लव जिहाद के नाम पर, कभी देशभक्ति के नाम पर दलितों और अल्पसंख्यकों के ऊपर अत्याचार का सर्वांगीण विकास हुआ है। देश और समाज के हित में कुछ किया गया हो, इसका भान तक नहीं होता दिख रहा। अब मोदी जी और उनकी टीम को, कोई माने न माने, पिछ्ले चार सालों में चहूमुखी बट्टा लगा है। मोदी जी के देश और देश के बाहर दिए गए सभी भाषण बेशक चुनावी भाषण कहे जा सकते हैं। दलितों और अल्पसंख्यकों का निर्बाध उत्पीड़न, बच्चियों के साथ अनवरत बलात्कारों की तो जैसे बाढ़ आ ही गई है। 

नवभारत टाइम्स (दैनिक हिंदी) 20.04.2018 में छपी रिपोर्ट के अनुसार बीजेपी नेताओं के खिलाफ महिलाओं से अपराध के सबसे ज्यादा मामले दर्ज हैं। क्रिमिनल बैकग्राउंड वालों को टिकट देने में भी बीजेपी अव्वल है। बीजेपी के 12 सासंदों और 45 विधायकों पर महिलाओं के खिलाफ अपराधिक मामले दर्ज हैं। वहीं, शिवसेना के 7 और टीएमसी के 6 विधायकों पर महिला अपराध से जुड़े मामले दर्ज हैं।  जिन 1,580 एमपी-एमएलए के केस की जांच की गई, उनमें 48 ने अपने ऊपर महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित केस होने की बात कबूली। इनमें 45 एमएलए और 3 एमपी हैं। 327 ऐसे उम्मीदवारों को चुनाव में सभी प्रमुख दलों ने टिकट दिया। पिछले 5 वर्षों में बीजेपी ने सबसे ज्यादा 47 ऐसे केस के आरोपियों को टिकट दिया है। महाराष्ट्र से सबसे ज्यादा आरोपी नेता हैं। इनकी संख्या 12 है। इसके बाद पश्चिम बंगाल का नंबर है। आंध्र प्रदेश, गुजरात और बिहार के एक-एक एमएलए ने अपने खिलाफ रेप के आरोप की बात मानी है। अन्य राजनीतिक दल कमोबेश ऐसी ही हालत है।

ऐसे समय में, जब महिलाओं से जुड़े अपराध का मुद्दा पूरे देश में छाया हुआ है और इसके लिए कड़ा कानून बनाने की मांग उठने पर सरकार ने हाल ही में एक अध्यादेश लाकर कानून बनाया है कि 12 वर्ष तक बालिकाओं से साथ बलात्कार के आरोपियों को फांसी की सजा हो सकती है। इस बदलाव से किसी अपराधी को मौत की सजा मिले न मिले किंतु 12 वर्ष से ऊपर की बच्चियों के साथ बलात्कार के मामलों के इजाफा होने का संदेह जरूर है।  

महिला उत्पीड़न के मामलों में शील भंग करने के इरादे से किसी महिला पर हमला, अपहरण या बलात शादी, रेप, घरेलू हिंसा एवं मानव तस्करी के लिए मजबूर करने से संबंधित मामले भी शामिल हैं। चुनाव सुधार की दिशा में काम करने वाली संस्था एडीआर (एसोसिएशन ऑफ डेमाक्रैटिक रिफॉर्म्स की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, बीजेपी के सबसे ज्यादा सांसद और विधायकों के खिलाफ इससे जुड़े केस लंबित हैं। वहीं, शिवसेना और टीएमसी दूसरे और तीसरे नंबर पर हैं। एडीआर और नेशनल इलेक्शन वॉच (एनईडब्ल्यू) ने सिफारिश की है कि गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने पर रोक हो। मालूम हो कि वर्तमान में यूपी के बीजेपी एमएलए कुलदीप सिंह सेंगर पर एक नाबालिग लड़की से रेप करने के आरोप में बड़ा सियासी विवाद हो रहा है। सुना है कि सेंगर ने बीजेपी को धमकी दी है कि यदि बीजेपी ने उनकी मदद नहीं की तो वो बीजेपी द्वारा ईवीएम के जरिये की गई हेराफेरी का खुलासा कर देंगे।  

अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों को उत्पीड़न और भेदभाव से बचाने वाले एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों में खुद को दलित हितैषी बताने की जो होड़ मची है।  उससे यही स्पष्ट हो रहा है कि सभी राजनीतिक दलों को दलित हितों की चिंता कम,  बल्कि आगामी लोकसभा चुनावों के लिए वोट जुटाने की चिंता ज्यादा की जा रही है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि ऐसा करते हुए छलकपट का सहारा लेने से भी नहीं बचा जा रहा है। विडंबना यह भी है कि यह काम राजनीतिक दलों के बड़े नेता भी करने में लगे हुए हैं।

सियासतदां महज गलतबयानी ही नहीं, बल्कि देश की जनता को खासकर दलित और अल्पसंख्यक वर्ग को गुमराह करने वाला काम निरंतर कर रहे हैं। सच तो ये है कि राजनेता स्थितियों को सही तरह समझने के बजाय भ्रम का माहौल बनाकर राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगे हुए हैं। यदि दलित आज भी शोषित-वंचित हैं तो उसके लिए राजनीतिक दल ही सबसे अधिक जिम्मेदार और जवाबदेह है। आज बीजेपी दलित हितैषी होने का सबसे ज्यादा दावा कर रही है जबकि मोदी जी की सरकार ने पिछ्ले चार सालों में न जाने कितने दलित विरोधी कार्य किए हैं। नौकरियों में दलितों के प्रमोशन पर कैंची चलाने का काम किया गया, भीम सेना के प्रमुख रावण को हाईकोर्ट से जमानत मिल जाने पर भी उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार के द्वारा रासुका के तहत फिर जेल में डाल दिया गया, दो अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी/एसटी एक्ट को निष्क्रिय करने के खिलाफ शांतिपूर्ण आन्दोलन करने वाले दलित युवाओं को जेलों में ठूंस दिया गया (जबकि उपद्रव करने वाले गैरदलित असामाजिक तत्वों की खोज तक न की गई), संविधान को बदलने की कवायद करना आदि आदि सब बीजेपी सरकार के पिछ्ले चार साल का दलितों के हक में किया गया विकास कार्य है। इतना ही नहीं 5 मार्च 2018 को यूजीसी ने आरक्षण के संदर्भ में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को जो सर्कुलर जारी किया है उसके अनुसार अब कॉलेजों को रोस्टर डिपार्टमेंट वाइज बनाना होगा, पहले कॉलेज को एक यूनिट मानकर सिनियरटी के आधार पर 2-7-1997 से 200 पॉइंट पोस्ट बेस रोस्टर बनाया जाता था लेकिन अब सब्जेक्ट्स व डिपार्टमेंट वाइज, इससे यदि किसी छोटे डिपार्टमेंट 2 या 4 पोस्ट होंगी तो एससी, एसटी नहीं आ पाएगा क्योंकि विभाग की स्वीकृत पदों की संख्या 4 ही है इसमें 1 ओबीसी और 3 सामान्य वर्ग को सीटें मिल जाएंगी एससी/एसटी को कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा। इसलिए 5 मार्च के सर्कुलर खिलाफ  निरंतर विरोध जारी है किंतु सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है।

इतने पर भी बीजेपी अपने आप को दलितों की पक्षधर सिद्ध करने में लगी है। इस बारे में मोदी जी अपने  लम्बे-लम्बे भाषणों में दलितों के हितों में किए गए कार्यों का ऐसे बखान करते हैं, जैसे उनका कोई सानी नहीं है। यह बात अलग है कि उनके भाषणों में मिथ्या बयानी ज्यादा होती है। भाजपा और कांगेस के शीर्ष नेताओं में दलित बस्तियों में जाकर दलितों के घर खाना खाने का जोरों से प्रचार-प्रसार किया जा रहा है।.... यह सब दिखावा किसलिए?  केवल वोट हथियाने के लिए। सुना तो ये भी गया है कि ऐसे नेता दलितों के घर में बैठकर खाना तो खाते है किंतु खाना बाहर से मंगाया जाता है। यह काम कांग्रेस भी कर रही है। ऐसे में गैर दलित राजनीतिक दलों के मुंह पर ताला लगा रहा है। किसी ने भी दलितों के हकों की साधना के लिए कोई आवाज नहीं उठाई...उठाते भी कैसे गुलामी की आदत जो पड़ गई है.....। अब केवल एक मार्ग शेष है कि आम जनता कुछ ऐसा करें कि कोई उसके हितों की अनदेखी न कर सके  

लेखक:  तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), दो निबन्ध संग्रह  और अन्य। तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक, आजीवक विजन के प्रधान संपादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।        


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