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कमजोर तबकों को डराने का एक साधन है बलात्कार

आज ( 29.05.2018) जब मैं अखबार पढ़ रहा था तो बेटियों का बाप होने के नाते सब लोग ठीक वैसे ही डर गए होंगे जैसे कि क्रिकेटर गौतम गम्भीर। वैसे तो चिंता पहले से ही थी किंतु गम्भीर के इस बयान ने चिंता को और बढ़ा दिया, “मुझे डर लगता है कि कैसे समझाउंगा अपनी बेटियों को रेप शब्द का मतलब। क्रिकेटर गौतम गंभीर ने कहा कि अपनी बेटियों से ए से एब्यूज, बी से ब्रूटेलिटी, सी से क्रूएलिटी सुनना उनकी जिंदगी का सबसे बुरा दिन होगा। इन दिनों मेरा डर सार्वजनिक इसलिए लगने लगा है कि किंडरगार्टन स्कूल्स में बच्चों को गुड टच और बैड टच के बीच फर्क सिखाया जाने लगा है। बच्चों को अच्छे और बुरे स्पर्श का अंतर बताया जा रहा है।

गम्भीर ने आगे कहा कि मैंने पहली बार 'बलात्कार' शब्द 1980 में आई हिंदी फिल्म 'इंसाफ का तराजू' में सुना था। इस फिल्म में दिखाया गया बलात्कार पीडि़ताओं का दर्द और घुटन, बलात्कारी की हत्या और हमारे समाज का खोखलापन बहुत अच्छे से मुझे आज भी याद हैं। महिलाओं के बीच परवरिश के कारण फिल्म में बलात्कारी रमेश, जिसका किरदार राजबब्बर ने निभाया था, उसकी हत्या से काफी सुकून मिला था।” कठुआ गैंगरेप का जिक्र करते हुए इस खिलाड़ी ने लिखा है कि निठारी, कठुआ, उन्नाव और इंदौर जैसे ऐसे अनेकों मामले हैं जिन पर हम शर्मिंदा हुए हैं। मेरे विचार से ऐसे लोग आतंकवादियों से ज्यादा खतरनाक हैं।

यहाँ यह सवाल खड़ा होता है, “क्या ये चिंता केवल और केवल गौतम गम्भीर की है? ” नहीं गम्भीर ने तो केवल समूचे समाज की पीड़ा और चिंता को जनता और सरकार के सामने रखने का साहस किया है। अन्यथा तो समाज तथाकथित समाजसेवी इस मुद्दे पर हाथ पर हाथ धरे हुए बैठे हैं। गम्भीर ने समाज और सरकार के सामने एक चुनौती भर पेश की है। अब ये दायित्व सरकार और समाज का है कि वो गम्भीर की इस चुनौती को किस तरह लेते हैं।

जब मैं अपने यौवन काल से गुजर रहा था तो रक्षाबंधन के दिन मुझे अपनी कलाई पर बंधी ढेर सारी राखियां देखकर बहुत अच्छा लगता था। राखी बाँधने वाली केवल मेरी अपनी बहने ही नहीं होती थीं अपितु आस-पड़ोस की और भी हम-उम्र लड़कियां होती थीं। मगर आज के इस बलात्कारी समय में कौन किसी अजनबी के साथ इस तरह का रिश्ता मंजूर करेगा। खेद की बात है कि आज बच्चियों को अपने पड़ोसियों, साथियों, रिश्तेदारों, पुरुष शिक्षकों और उसे रोजाना स्कूल लाने-ले जाने वाले ड्राइवर से डर लगता है। मुझे लगता है कि चाइल्ड एब्यूज/ रेप सिर्फ शारीरिक शोषण ही नहीं है, अपितु  यह विश्वास का भी कत्ल है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों की मानें तो पिछले 10 सालों में चाइल्ड रेप के मामलों में 336 फीसदी का इजाफा हुआ है। 2015 में यह आंकड़ा 10,854 का था जबकि  2016 में बलात्कार के 19765 मामले दर्ज किए गए।

एक रिपोर्ट के अनुसार, इंडियन पेनल कोड (आईपीसी) की धारा 376 और प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज (पॉक्सो) एक्ट की धारा 4 और 6 के तहत 2016 में बच्चियों से बलात्कार के 19,765 मामले दर्ज किए गए। औसतन यह आंकड़ा 54 प्रतिदिन का था। 2015 के मुकाबले बच्चियों से बलात्कार के मामले में 82 फीसदी का इजाफा दर्ज किया गया है। 2015 में जहां 10,854 मामले दर्ज किए गए थे, वहीं 2016 में 19765 मामले दर्ज किए गए। 2016 में महिलाओं और बच्चियों को मिलाकर बलात्कार पीड़िताओं की संख्या 39,068 थी। इसमें से 43 फीसदी, तकरीबन 16,863 लड़कियों की उम्र 18 साल से कम थी, जबकि 5 फीसदी यानी 2,116 पीड़िताएं तो 12 साल से भी कम उम्र की थीं। इन आँकड़ों के आधार पर समझ नहीं आता कि आखिर ऐसी घटनाओं के पीछे मकसद क्या है। कोरी सेक्स की ही कहानी तो नहीं हो सकती क्योंकि बलात्कार के अक्सर मामले कमजोर समाज की बच्चियों/औरतों के साथ ही होते हैं.... क्यों? मुझे लगता है कि बलात्कार के इस प्रकार के विभत्स कारनामे समाज के कमजोर तबकों को डराने और बलात्कारी अपने आप को दबंग साबित करने के करते हैं। और ऐसे दबंगों को अक्सर सरकार का अपरोक्ष समर्थन भी होता है, इसकी बू आती है। क्योंकि सरकार बलात्कारियों के प्रति नरम रवैया अपनाने का उपक्रम करती है। इतना ही नहीं पिछ्ले चार सालों में तो यही देखा गया है कि सत्ता के दबंग चाटुकार इस तरह की शातिराना घटनाओं को अंजाम देने में अग्रणीय देखे गए हैं।

ऐसे में पीड़ितों द्वारा बलात्कारियों के खिलाफ संघर्ष करना बेमानी हो जाता है। भारतीय समाज में ऊँच-नीच की भावना भी इस कुकृत्य के लिए जिम्मेदार है। कुछ लोग इसका कारण लिंगानुपात को भी मानते हैं। हरियाणा में सामूहिक बलात्कार से जुड़े सबसे ज़्यादा मामले सामने आते हैं। हरियाणा वो प्रदेश है जहां पर सबसे ख़राब लिंगानुपात है। लेकिन राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, कश्मीर जैसे राज्य भी तो बलात्कारियों से खाली नहीं हैं। खाप-पंचायतें भी इसके लिए इसलिए दोषी हैं कि वो बलात्कारी को सजा देने के बजाय लड़की के भविष्य की चिंता किए बिना ही बलात्कार करने वाले से ही पीड़ित लड़की की शादी करा देते हैं। गौरतलब है कि पहले तो राज्य पुलिस ऐसे मामलों की एफआईआर ही नहीं लिखती, अगर लिखती भी है तो रसूखदारों की। फिर भी उदाहरणार्थ ...

जनवरी के महीने में ही हरियाणा में ये मामले सामने आए थे। 50 साल के पुरुष को 10 साल की बच्ची के शरीर को क्षत विक्षत करने के मामले में पकड़ा गया, 15 साल के लड़के के साढ़े तीन साल की बच्ची के साथ कथित रूप से रेप करने के मामले में पकड़ा गया, 20 साल की महिला का दो लोगों द्वारा रेप किए जाने का मामला 24 साल के पुरुष को एक छात्रा को अगवा करने के मामले में पकड़ा गया, एक बच्ची का शव चोटिल और नग्न अवस्था में खेतों में पाया गया अहम बात ये है कि ये सिर्फ वो मामले हैं जिनमें शिकायत दर्ज कराई गई। जो मामले दर्ज न किए गए होंगे, जाने वो कितने होंगे... इसका सरकार के पास क्या आँकड़ा हो सकता है?

जनवरी में ही भारत प्रशासित कश्मीर में यौन कुंठा और धार्मिक कट्टरता का ख़तरनाक मिश्रण एक आठ साल की मुस्लिम बच्ची के रेप और हत्या के रूप में सामने आया था। उसे अगवा करने के बाद कथित तौर पर एक हिंदू मंदिर में क़ैद किया गया। इसके बाद उसे जंगल में फेंक दिया गया। बताया जाता है कि ये घटना एक अल्पसंख्यक मुस्लिम जाति के लिए एक चेतावनी की तरह थी कि वे राज्य के अमुक हिस्से में हिंदुओं की जमीन पर अपने जानवरों को चराना बंद कर दें। इस मामले में अभियुक्त के समर्थन में रैली निकालने वाले सत्तारूढ़ बीजेपी के ही दो नेता थे जिन्हें काफी शोर-शराबे के बाद इन भाजपा नेताओं ने अपना इस्तीफा दे दिया था। इसके चलते हारकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी ट्विटर पर निंदा करनी पड़ी।

केरल में सांप्रदायिकता के बढ़ते चलन से प्रभावित एक बैंक मैनेजर ने गर्व से फेसबुक पर लिखा, "अच्छा हुआ कि चरवाह समुदाय की ये लड़की मार दी गई क्योंकि कल यही लड़की भारत के ख़िलाफ़ मानव बम बनकर आती." इसके बाद इस बैंक मैनेजर को नौकरी से निकाल दिया गया। तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्विटर पर लिखा है कि "बच्चियों को न्याय मिलेगा।" कई लोग मानते हैं कि उनकी ओर से आने वाले आश्वासन के मायने कम और विज्ञापन ज्यादा होते हैं। ज्ञात हो कि उनकी ही पार्टी के अनेक विधायकों और सांसदों पर बलात्कार के मामले दर्ज हैं और वे सत्ता में रहकर भी रेप अभियुक्तों का समर्थन करते हैं। यह बात केवल भाजपा पर ही लागू नहीं होती अपितु अन्य राजनीतिक दल के नेता भी इसकी चपेट में आते हैं। साल 2014 में जब एक महिला पत्रकार के गैंगरेप मामले में तीन पुरुषों को गिरफ़्तार किया गया था, तब समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने कहा था, "लड़कों से गलतियां हो जाती हैं। उन्हें इसके लिए फांसी की सज़ा नहीं होनी चाहिए। हम एंटी-रेप कानूनों में परिवर्तन लाएंगे।" न जाने हर रोज कितनी ही महिलाओं के रेप और हत्याओं की ख़बरें सामने आती हैं किंतु उन्हें किसी न किसी तरह महिलाओं पर ही आरोप लगाकर किनारे कर दिया जाता है। कहा जाता है कि महिलाओं को इस हक़ीकत से खुद को आत्मसात कराना है कि उन्हें खुद को बचाना है,  सही कपड़े पहनने हैं,  अकेले बाहर नहीं जाना है या फिर घर पर रहना है। अगर ये सब नहीं तो जोख़िम उठाने को तैयार रहना है। नेताओं और तथाकथित समाजसेवियों की इस प्रकार की अतार्किक बयानबाजी के चलते ऐसे मामलों की संख्या बढ़ रही है जिसमें अब बच्चों को भी निशाना बनाया जा रहा है। भारत के क्राइम रिकॉर्ड के आंकड़ों के अनुसार बच्चों के साथ रेप के मामले साल 2012 से 2016 तक दोगुने हो गए हैं। इसमें से 40 फ़ीसदी मामलों में पीड़िताएं बच्चियां थीं। कई लोगों का मानना है कि पितृसत्तात्मकता, सामंतवाद और विषम लिंगानुपात ऐसे मामलों को बढ़ावा दे रहे हैं। ऐसे में महिलाओं के प्रति सामाजिक उदासीनता भी एक पहलू है। यह भी कि महिलाओं के अधिकार और सुरक्षा कभी चुनावी मुद्दे नहीं बनते।

इस समस्या का निदान जैसे केवल और केवल हवा में होकर रह जाता है। 2012 के गैंगरेप कांड के बाद दुनिया भर में पैदा हुए आक्रोश और जनप्रदर्शनों के बाद भी कुछ नहीं बदला है। हाँ! ये जरूर है कि रेप के मामलों में पुलिस द्वारा ना-ना करते हुए भी शिकायतें दर्ज होना शुरू हो गई हैं। लेकिन बुरी ख़बर ये है कि अभी भी इस न्याय व्यवस्था से कई अभियुक्त लोग रिहा हो जाते हैं। कई लोग तो ये मानने को तैयार ही नहीं हैं कि यौन शोषण कोई समस्या है। मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी और बीजेपी की समर्थक ज़्यादातर पार्टियां तो इस समस्या का निदान निकालने के लिए तैयार नज़र नहीं आ रही हैं। निठारी, कठुआ, उन्नाव, इंदौर में जो कुछ हुआ उसे राष्ट्रीय शर्म से कम कुछ नहीं कहा जा सकता है। इन बलात्कारियों को आतंकियों से कम नहीं माना जा सकता।       

गम्भीर ने ये भी सवाल उठाया कि दोषियों को पीड़िताओं की उम्र के हिसाब से सजा क्‍यों? ऐसे लोगों को रेपिस्ट की बजाए किसी और मजबूत शब्द से बुलाया जाना चाहिए। हिंदुस्तान टाइम्स में लिखे एक आलेख में, उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा रेप के मामलों में लाए गए नए अध्यादेश का उल्लेख करते हुए कहा है कि सरकार ने अब 12 साल से कम उम्र के बच्चों के साथ दुष्कर्म करने वालों के खिलाफ मौत की सजा का प्रावधान किया है। उन्होंने सरकार के इस फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि रेप, रेप ही होता है। फिर ऐसे मामलों में दोषियों को पीड़िता की उम्र के हिसाब से सजा क्यों?      

यथोक्त के आलोक में यह कहना अतिश्योक्ति न होगा कि सिस्टम को कोसना या सरकार को बुरा-भला कहने से अच्छा होगा कि हम अपने भीतर भी झांकें। हमारे समाज में पुरुषवादी मानसिकता लड़कियों को उत्पाद के रूप में पेश करने की सोच रखती है। सबसे पहले उसे बदलने की जरूरत है। भारत में नवरात्र में कन्या पूजन की परंपरा है। किंतु अफसोस की बात ये है कि नवरात्र में परिवार के जो सबसे वरिष्ठ पुरुष होते हैं वो कन्याओं का आशीर्वाद लेते हैं और वही शक्स जब घर से बाहर निकलते हैं तो कम उम्र की लड़कियों को देखकर यौन इशारे करते हैं।.... क्या ऐसी हरकतें भारतीय संस्कृति और पुरुष मानसिकता की बखिया नहीं उधेड़तीं?

और भी ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं जैसे कि बहुत से लोगों को टेनिस में दिलचस्पी महिला खिलाड़ियों की केवल छोटी स्कर्ट के कारण होती है। उनकी अच्छी सर्विस या उनके खेल से कोई लेना-देना नहीं होता। ऐसे ही आईपीएल में चियरगर्ल्स की क्या जरूरत है? लोगों का यह भी मानना है कि आसानी से ऑनलाइन उपलब्ध एडल्ट सामग्री इस समस्या में और इजाफा करती है। स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट से पॉर्न और खासतौर से चाइल्ड पॉर्नोग्राफी की पहुंच लोगों तक आसान है। एक मैग्जीन में छपी रिपोर्ट के मुताबिक 2012 से 2014 के बीच बाल यौन शोषण से संबंधित वेबपेज में 147 फीसदी का उछाल आया।

यथोक्त के आलोक में क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि जो माँ आज अपने बच्चों को ए से एप्पल, बी से बाल और सी से कैट पढ़ा रही है, कहीं ऐसा न हो कि आने वाले दिनों में उस माँ को ए से एब्यूज , बी से ब्रूटेलिटी और सी से क्रुएलिटी पढ़ाने की नौबत आ जाए  


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