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अगर आपको लगता है कि मीडिया और पत्रकारों पर हमले की बातों में अतिश्योक्ति है तो आप भी शुतुरमुर्ग की तरह रेत में अपना सर डाले हुए हैं।

रात की अंतिम फ़्लाइट से छत्तीसगढ़ पुलिस ग़ाज़ियाबाद पहुंचती है। फ़िर यूपी पुलिस के साथ मिलकर पत्रकार विनोद वर्मा को सुबह 3:30 बजे उनके घर से उठा लेती है।

विनोद वर्मा एडिटर्स गिल्ड के सदस्य हैं। बीबीसी हिंदी में काम कर चुके हैं और अमर उजाला डिजिटल के संपादक रहे हैं। एडिटर्स गिल्ड के उस फैक्ट-फाइंडिंग टीम का भी हिस्सा थे जिसने छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा पत्रकारों को डराने धमकाने की छानबीन की थी।  

इस बार वो रमण सिंह सरकार में एक मंत्री से जुड़े मामले पर काम कर रहे थे। पुलिस ने जबरन फ़िरौती और धमकाने के आरोप में विनोद वर्मा की गिरफ़्तारी की है। इस आरोप की जाँच ज़रूर होनी चाहिए। ये भी आरोप है कि कांग्रेस के इशारे पर विनोद वर्मा काम कर रहे थे। मुझे नहीं पता! हो सकता है कर रहे हों। अगर ऐसा कर रहे थे और मंत्री के ख़िलाफ़ झूठी रिपोर्ट तैयार कर रहे थे तो सच्चे सरकार को इस क़दर घबराने की क्या ज़रूरत थी?  

मज़ेदार बात है कि ये आरोप छत्तीसगढ़ बीजेपी आईटी सेल के प्रकाश बजाज ने लगाए हैं। इन्हीं के आरोपों के आधार पर छत्तीसगढ़ पुलिस क्रांतिकारी ढंग से हरक़त में आई। वैसे, बीजेपी के आईटी सेल की मशहूरी किन कारणों से है ये तो दुनिया जानती ही है।  

इसमें कोई दो राय नहीं है कि अलग अलग तरीक़ों से प्रेस और पत्रकारों को डराने धमकाने चुप कराने की कोशिशें देश भर में हो रही हैं। ऐसे कई उदाहरण देखे जा चुके हैं। लेकिन अगर फ़िर भी आपको लगता है कि मीडिया और पत्रकारों पर हमले की बातों में अतिश्योक्ति है तो आप भी शुतुरमुर्ग की तरह रेत में अपना सर डाले हुए हैं।

अनुपम जी की फेसबुक वॉल से
अध्यक्ष - स्वराज इंडिया (दिल्ली)     

मुख्य संवाददाता
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