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दलितों व अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचार के आँकड़े भी तो देते मोदी जी

केंद्र में मोदी सरकार के चार साल पूरे हो गये हैं। वर्ष 2014 में जब इस सरकार ने सत्ता संभाली थी, तब जनता की उम्मीदें यूँ ही आसमान पर नहीं थीं, बल्कि मोदी जी ने जनता को दिन में ऐसे तारे दिखाए थे, जिन्हें भाजपा के अमित शाह ने जुमला करार देकर जनता की छाती पर दाल दलने का काम किया। गौरतलब है कि तीस साल बाद केंद्र में किसी पार्टी को जुमलेबाजी के बल पर अकेले बहुमत हासिल हुआ था। किंतु इस मजबूत सरकार से जनता को कुछ बड़े बदलावों की आशा थी और खुद मोदी और उनके सहयोगियों ने इसका वादा भी किया था। किंतु हुआ क्या? टीम मोदी जी ने नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसले लेकर देश की आम जनता और व्यापारिक वर्ग को तबाही के मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया। भाजपा बेशक इन फैसलों को अपनी सफलता मानती रहे। नोटबन्दी के फैसले के साथ जुड़ी अपेक्षाओं को लेकर कई जरूरी आंकड़े सरकार ने अभी तक भी जारी नहीं किए हैं, फिर सरकार इस नोटबन्दी को किस आधार पर अपनी सफलता से जोड़कर प्रस्तुत कर रही है?

सरकार का कहना है कि गत चार वर्षों के दौरान विभिन्न मोर्चों पर कई परेशानियों का सामना करते हुए, उसने हर परेशानी को दूर कर विकास का मार्ग प्रशस्त किया। सरकार ने दावा किया कि मुद्दा चाहे डोकलाम का रहा हो या फिर सीमा पर पाक की कार्रवाई का या फिर देश में नक्सलवाद का या फिर घरेलू मंच पर तेल का, हर मुद्दे को सुलझाने में सरकार ने बखूबी सफलता हासिल की। डोकलाम और पाक सीमाओं का तो हमें पता नहीं किंतु तेज की कीमतों का बहीखाता तो हमारे सामने है, फिर किस आधार पर ये मान लिया जाए कि मोदी सरकार ने ऐसे बड़े मामले आसानी से हल कर लिए? सरकार का यह भी कहना है कि न केवल देश में बल्कि वैश्विक मंच पर भी भारत का मान बढ़ाया, किंतु मोदी सरकार ने ये खुलासा नहीं किया कि किस प्रकार से भारतीय दूतावास के जारिए मोदी जी की सभा में प्रवासी भारतीयों की भीड़ को इक्ट्ठा किया गया?

सरकार का कहना है कि सरकार ने हर मोर्चे पर पारदर्शी रहते हुए अपने सभी फैसलों की जानकारी आम-जन तक पहुंचाई। जबकि सरकार का ऐसा कहना सच्चाई से कोसो दूर है। सच तो ये है कि सरकार की असफलता को उजागर करने वालों को सीधा देशद्रोही ठहराया जाता रहा। सरकार का यह एक थोथा दावा है कि पीएम मोदी ने सोशल नेटवर्किंग से जुड़कर लोगों को अपने रोजाना के कार्यक्रम और लोगों को अपनी सोच के बारे में बताया और उनसे सुझाव भी मांगे। हाँ! 'मन की बात' कार्यक्रम के जरिए पीएम ने अपने मन की बात तो की किंतु जनता के मन की बात न तो सुनी और न ही जनता से किए गए वादों के कार्यांवयन के बारे सही से कुछ बताया। कहा जा सकता है कि मोदी सरकार के चार साल में झूठ और धर्मान्धता की संस्कृति का इस कदर फैलाव हुआ है कि भाजपा अन्दरखाने इस फैलाव का जश्न मना रही है। सरकार को अपने इस कृत्य पर तनिक भी अफसोस नहीं है। इस बारे में जिस तरह से सोशल मीडिया पर कुतर्कों को जाल बुना गया है, वह बताता है कि यह सरकार जनता की तर्क बुद्धि का कितना सम्मान करती है।

सरकार ने मीडिया की गुलामगीरी पर कोई स्पष्टीकरण नही दिया।….क्यों? विदित हो कि मोदी सरकार ने सबसे ज्यादा पैसा मीडिया को मौन रखने और सरकार की वाहवाही करने के लिए खर्च किया है। सरकार को इसका खुलासा करना चाहिए। कोई तो बात होगी कि भारत का मीडिया 180 देशों के रिपोर्ट कार्ड में 138वें स्थान पर आ गया है। भारतीय प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया सत्ता का पैरोकार बनने को मजबूर किया गया है या फिर उसकी आदत बन गई है कि अब चाटुकारिता के अलावा कुछ और कर ही नहीं सकता। सरकार को इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि दो करोड़ की रिश्वत माँगने के आरोप में जेल जाने वाले पत्रकार सुधीर चौधरी को इस सरकार ने वाई श्रीणी की सुरक्षा मुहैया कराई हुई है और रवीश कुमार, पुन्य प्रसून वाजपेयी, अभिसार शर्मा, बरखा दत्त जैसे ईमानदार पत्रकारों को सुरक्षा प्रदान करने में कोताही क्यों बरती जा रही है, जबकि उन्हें हिन्दुवादी हिंसक ताकतों द्वारा न केवल हिन्दू विरोधी करार दिया जा रहा है अपितु उन्हें जान से मार देने की धमकियां दी जा रही हैं। होना तो ये चाहिए कि सरकार को इन बातों का खुद संज्ञान लेकर ऐसे पत्रकारों को सुरक्षा मुहैया करानी चाहिए। खेद की बात है कि भाजपा के शासन काल में पिछ्ले शासन काल के मुकाबले सबसे ज्यादा पत्रकारों की हत्याएं की गई हैं।.... सरकार ने इस पर कोई बयान क्यों नहीं दिया? इस दौरान रोहित वैमुला, नजीब जैसे कई प्रतिभाशाली छात्रों को जमींदोज करने का काम भी किया गया है, क्या ऐसे मुद्दे मोदी सरकार के एजेंडे से बाहर के मुद्दे हैं? क्या आरएसएस के मुद्दे ही आज की सरकार के मुद्दे हैं?  क्या हिन्दुत्व ही मोदी जी का मूल मुद्दा है? जब वो अपने को ओबीसी का बताते हैं तो फिर वो कैसे ब्राहम्णवाद का समर्थन कर सकते हैं? अगर वो ब्राहम्णवाद का समर्थन करते हैं तो फिर ओबीसी (दलित) कैसे हो सकते हैं?  

मोदी सरकार ने पिछ्ले चार साल में जनहित के नाम पर लगभग सौ से भी ज्यादा योजनाओं की घोषणाएं की हैं। ये एक अच्छी बात है। किंतु इन योजनाओं के क्रियांवयन पर ये सरकार खाली कागजी आँकड़े पेश करके ही संतुष्टी का ढोंग कर जनता को 2019 के बजाय 2022 तक अपने वादों को पूरा करने का झुनझुना थमा दे रही है। रिटायर हो चुके लोगों को अब न्यू पेंशन स्कीम का झुनझुना थमा दिया। अब वो इस झांसे को समझ गये हैं। सच ये है कि मोदी सरकार की एक भी स्कीम का कार्यान्वयन जमीनी आधार पर नहीं हुआ है। खाली कागजों को रंगने का काम किया है मोदी सरकार ने।

सरकार ने इस बात का भी कोई उल्लेख नहीं किया कि बैंकों का पूरा सिस्टम क्यों ध्वस्त है? सरकार ने माल्या, नीरव मोदी, मोहल भाई और न जाने और भी कितने ही ऐसे भाई लोग हैं जो बैंकों को चूना लगाकर इस मोदी राज में परदेशी हो गए। उनपर कोई चर्चा क्यों नहीं की? उल्टा बैंक कर्मियों  को ही दोषी ठहराने का काम किया जा रहा है। राजनेता चाहे कांग्रेस के हों या भाजपा के, सब दूध के धुले हैं, यह सिद्ध करना ही उनका काम रहा है। वेतन ना तो बैंक कर्मियों का बढ़ाया जा रहा है और न ही डाकियों का। यह है भाजपा की जनहित योजना का दर्शन।

वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार के अनुसार दो ऐसे सेक्टर हैं जिनको ये सरकार फैलाने का काम कर रही है...एक- झूठ और दूसरा- धर्मांधता। माना कि हर सरकार के दौर में एक राजनीतिक संस्कृति पनपती है, किंतु मोदी सरकार के दौर में “झूठ” नई सरकार की संस्कृति बनकर उभरी है। अब सवाल किया जा सकता है कि जब प्रधानमंत्री ही झूठ बोलते हों तो फिर दूसरों के बारे में क्या कहें? उल्लेखनीय है कि धर्मांधता की धारा को आगे बढ़ाने के मकसद से भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस से इत्तेफाक रखने वाले कई संगठन बनकर खड़े हो गए हैं जो काम तो इन्हीं के लिए करते हैं मगर अलग इसलिए हैं ताकि बदनामी उन पर न आए।

सरकार ने इस सत्य पर भी कोई टिप्पणी नहीं की कि उनकी सरकार नौकरी के फ्रंट पर फेल रही है। रोजगार न दे पाने के कारण भी सरकार की चमक फीकी हो रही है, किंतु इस मसले पर सरकार मौन रही है और पकौड़े तलने जैसे सुझाव देकर ही अपनी असफलता को छुपाने के काम में लगी रही। अफसोस की बात है कि अपना सबसे बड़ा वादा मोदी सरकार पूरा नहीं कर पाई। चुनावी घोषणा पत्र में उसने हर साल 2 करोड़ रोजगार पैदा करने का वादा किया था, मगर हकीकत कुछ और ही निकली। सरकार की सोच है कि सिर्फ नौकरी को ही रोजगार न माना जाए। लेकिन ऐसा तब होता जब काफी लोगों को स्वरोजगार के साधन उपलब्ध हो पाते। स्टार्ट-अप योजना के जरिए इस दिशा में एक कोशिश जरूर हुई पर वह लहर दो साल भी नहीं चली। सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले रियल एस्टेट सेक्टर का हाल बुरा है। इस सदी में सबसे ज्यादा मध्यवर्गीय नौकरियां टेलिकॉम सेक्टर में मिलती थीं, जो अचानक समस्याग्रस्त लगने लगा है। नौकरियों में आरक्षण पर कुठाराघात, एस सी/ एस टी पर अत्याचार के विरोध में पूर्व पारित सरकारी आदेश का सुप्रीम कोर्ट द्वारा निरस्त किया जाना, क्या मोदी सरकार के संज्ञान में नहीं आया? यदि नहीं, तो क्यों?

और भी बहुत से सवाल हैं जो देश की दलित और अल्पसंख्यक आवादी से जुड़े हुए हैं जिन्हें मोदी सरकार ने चार साल पूरे होने के जश्न के दौरन छुआ तक नहीं। मसलन कश्मीर में हिंसा को रोकने के लिए क्या किया? एक सिर के बदले दस सिर लाने वाले मोदी जी ने यह भी नहीं बताया कि उनके शासन काल में कितने सैनिक शहीद हुए और कितनों को यथावत सम्मान दिया गया? कितनों के सिर देश में लाए। मोदी सरकार के पिछ्ले चार सालों में कितने दलितों और अल्पसंख्यकों को मौत के घाट उतारा गया और किस आधार पर? मोदी सरकार के पिछ्ले चार सालों में कितनी किशोरियों की लाज लूटी गई और कितनों की हत्या की गई? मोदी सरकार ने यह भी नहीं बताया कि मोदी जी के पिछ्ले चार सालों में शासन-प्रशासन ने दलितों और अल्पसंख्यकों के साथ कितने फर्जी केस दर्ज किए और कितने फर्जी एनकाउंटर किए? केवल और केवल सरकारी आँकड़ों के बल पर सुर्खियां बटोरने का काम करना न केवल राजनीतिक है अपितु समाज विरोधी भी है।

खैर! सरकार के पास अभी एक साल का वक्त और है। इस बीच वह जनता की कुछ मुश्किलें दूर कर दे तो सरकार को अपना गुणगान करने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी अपितु जनता उनका ये काम खुद ही कर देगी। विकास का काम जमीन पर ऐसे ही दिखना चाहिए जैसे कि दलितों और अल्पसंख्यकों के साथ लगातार हो रहे अत्याचार तो फिर माना जा सकता है कि सरकार विकास के कार्यो के लिए कटिद्ध है, अन्यथा नहीं।            


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