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अंबेडकर जयंती पर विशेष... वर्तमान भारतीय शिक्षा प्रणाली-समस्यायें व समाधान

भारत की वर्तमान शिक्षा, संविधान में उल्लिखित प्रस्तावना ‘‘भारत को एक प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाने’’ की अवधारणा से कदापि मेल नहीं खाती क्योंकि यह सही मायने में समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा नहीं देती। भारतीय संविधान की धारा 21 ए-शिक्षा का अधिकार- जो एक मौलिक अधिकार है, 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के बच्चों को न केवल निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करती है अपितु एक समान शिक्षा जिसमें समान पाठ्यक्रम-सामग्री उपलब्ध होने का भी प्राविधान करती है। समान पाठ्यक्रम सामग्री से युक्त, एक समान शिक्षा प्रणाली सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्राप्त करने के लिए अत्यावश्यक भी है। इससे सामाजिक स्तर पर बराबरी और अवसर की समानता भी उपलब्ध हो सकेगी। इस प्रकार सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पृष्टभूमि के आधार पर कोई भेदभाव किए बिना, शिक्षा की व्यवस्था करना, इस मौलिक अधिकार की मंशा है। मूल्य-आधारित एक समान शिक्षा न केवल परस्पर बन्धुता जिसमें व्यक्ति की गरिमा सुनिशचित करने का संकल्प हो, के लिए आवश्यक है बल्कि देश की एकता और अखण्डता को भी कायम रखने के लिए अपरिहार्य है। ऐसी शिक्षा समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, अपराध, आतंकवाद, जातिभेद, सम्प्रदायवाद और सामाजिक घृणा को उखाड़ फेंकने में भी समर्थ है। अब सवाल यह है कि इस लक्ष्य की प्राप्ति कैसे सुनिश्चित हो। इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय ने “Environmental and Consumer Protect Foundation: Delhi Administration” के अपने निर्णय में समाधान देते हुए कहा है कि ‘‘यह आदेशात्मक एवं अनिवार्य है कि स्कूलों के पास योग्य अध्यापक और मौलिक आधारभूत संरचना (Basic Infrastructure) हो।’’ सरकार के तीनों अंग विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का अन्तिम लक्ष्य लोगों का कल्याण और संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित स्वर्णिम लक्ष्य को प्राप्त करना है। शिक्षा, सम्पूर्ण शैक्षिक निर्देषों से हमें अवगत कराने के साथ-साथ प्रशिक्षण और विकास की प्रक्रिया से भी अवगत कराती है जो बच्चों की औपचारिक स्कूली शिक्षा में ज्ञान, कौशल, मानसिक और चारित्रिक विकास के लिए अपरिहार्य है। ‘न्याय’ एक विभिन्न अवधारणाओं से युक्त विचार है और ‘सामाजार्थिक न्याय’(Socio-economic Justice) इसका एक विषिश्ट अंग जो गरीबों, कमजोर तबकों, दलितों, अनुसूचित जनजातियों और वंचितों के सामान्य वृद्धि एवं विकास के लिए आवश्यक है और उनको समानता के स्तर पर ले जाने के लिए भी जरूरी है। अतः सरकार को संविधान के अनुच्छेद 12, 14, 15 और प्रस्तावना की मूल भावना के अनुरूप बिना किसी भेदभाव के एक समान शिक्षा  (Uniform Education) सुनिशि्चत करना ही चाहिए। संविधान का अनुच्छेद 38(1) जहाँ लोगों के कल्याण को बढ़ावा देने हेतु सामाजिक आदेश (Social Order) प्राप्त करने के लिए सरकार को निर्देष देता है, वही अनुच्छेद 38(2), न केवल व्यक्तियों अपितु देश के विभिन्न राज्यों में निवास करने वाले जनसमूहों या विभिन्न व्यवसायों में लगे लोगों के मध्य आय की असमानता को कम करने और जीवन स्तर, सुविधाओं और अवसरों की समानता के अन्तर व असमानता को कम करने या समाप्त करने के लिए भी प्रावधान करने का निर्देश देता है। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अनुच्छेद 39, राज्य को किन नीतिगत सिद्धान्तों का परिपालन और अनुसरण सुनिश्चित करना है, का उल्लेख करता है। भारत के संविधान का अनुच्छेद 45, शिशुओं के लालन-पालन और 6 वर्ष की उम्र के नीचे के बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करने का राज्य को निर्देश देता है तो अनुच्छेद 46 अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा समाज के अन्य कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देने और सुनिश्चित करने का स्पष्ट निर्देश देता है। उपरोक्त स्पष्ट प्रावधानों के बावजूद, न तो इसे जमीन पर उतारा गया और ना ही इसका क्रियान्वयन हो सका। यह चिन्ता का विशय है। कदाचित इसीलिए संविधान-शिल्पी बाबासाहब डॉ भीमराव अम्बेडकर ने कहा था, ‘‘संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो यदि उसको लागू करने वाले बुरे हैं तो वह अन्ततः बुरा ही साबित होगा, इसके विपरीत संविधान कितना ही बुरा क्यों न हो, यदि इसको लागू करने वाले अच्छे हैं तो वह अन्ततः अच्छा ही साबित होगा।’’ राज्य/सरकारों के समक्ष यह एक बड़ा प्रश्न चिन्ह है जिसका मूल्यांकन उन्हें स्वयं करना होगा। अब अगर समीक्षा करें तो हम पाते हैं कि सरकारों की चिन्ता कहीं न कहीं इस दिशा में परिलक्षित तो होती है जिसकी परिणति ‘‘निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिनियम 2009’’ के रूप में सामने आई जो 1 अप्रैल 2010 से लागू हुआ। इसके मुख्य प्राविधान निम्न प्रकार हैं:-

1- 6 से 14 साल के बच्चों को मुफ्त षिक्षा उपलब्ध कराना। 
2- निजी स्कूलों द्वारा 6 से 14 साल तक 25 प्रतिशत गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा दिया जाना। फीस वसूलने पर 10 गुणा जुर्माना देना, शर्त न मानने पर मान्यता रद्द होना। मान्यता रद्द होने के बाद स्कूल चलाने पर एक लाख और उसके बाद प्रतिदिन 10 हजार जुर्माना देना। 
3- प्रवेश के लिए कैपिटेशन फीस की मनाही। अभिभावकों का साक्षात्कार, बच्चों की स्क्रीनिंग आदि पर 25 हजार का जुर्माना एवं ऐसी प्रक्रिया बदलने का वादा।
4- शिक्षकों के ट्यूशन पर प्रतिबन्ध। 
5- मुफ्त शिक्षा मुहैया कराना राज्य/केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी। 
6- गुणवत्ता समेत प्रारंभिक शिक्षा के सभी पहलुओं पर निगरानी हेतु राष्ट्रीय आयोग का गठन।
7- प्रत्येक क्षेत्र में एक स्कूल का प्रावधान। 

शिक्षा का अधिकार
निश्चित रूप से यह एक बड़ा कदम है एवं बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कदम भी। परन्तु जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है अगर मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के साथ ही सरकार एक समान शिक्षा का भी प्राविधान करती और यह सुनिश्चित करती कि देश का हर बच्चा एक ही तरह के स्कूल में जायेगा और पूरे देश में एक ही पाठ्यक्रम पढ़ाया जायेगा, तो शिक्षा का उद्देश्य पूरा हो जाता। मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अन्तर्गत निजी स्कूलों में सिर्फ 25 प्रतिशत सीटों पर ही समाज के कमजोर वर्ग के छात्रों को प्रवेश का प्रावधान है, इस तरह शिक्षा के जरिए गैर-बराबरी पाटने का जो महान सपना देखा जाता है वह भी पूरा नहीं होगा। इसे उसी चेष्टा और निष्ठा के साथ लागू करने हेतु बजट प्रावधानों का कोई प्रावधान स्पष्ट रूप से नहीं है। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि निशुल्क शिक्षा को फीस तक ही सीमित नहीं किया जा सकता। शिक्षण सामग्री, निजी स्कूलों द्वारा विभिन्न मदों यथा यूनिफार्म, टूर, एक्स्ट्रा कैरिकुलर एक्टीविटी, ट्रान्सपोर्ट, कल्चरल कार्यक्रमों सहित अन्य अनेक प्रकार से धनराशि छात्रों से वसूल की जाती है, इसका व्यय कमजोर वर्गों के छात्र कहाँ से वहन करेंगे, इसका कोई प्रावधान नहीं है। इसे कैसे और कौन वहन करेगा? स्पष्ट प्रावधान के अभाव में यह मात्र परिकल्पना लगती है। अनुच्छेद 45 के अन्तर्गत 6 वर्ष से नीचे की आयु के 17 करोड़ बच्चों की कोई बात अधिनियम में नहीं है जबकि उन्हें संतुलित आहार, स्वास्थ्य, केयर और पूर्व प्राथमिक शिक्षा का अधिकार दिया गया है जिसका कोई प्रावधान नहीं किया गया है। धारा 46 के अन्तर्गत अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए अलग से प्रावधान निजी स्कूलों हेतु नहीं परिलक्षित होता। उन्हें कमजोर वर्गों में ही शामिल किया गया है। समग्र रूप से यह तो नहीं कहा जा सकता कि देश में अन्य क्षेत्रों की प्रगति के साथ षिक्षा के क्षेत्र में कोई प्रगति नहीं हुई। 

60 से 70 के दशक तक जहाँ स्कूल के भवन ही नहीं होते थे और प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा छप्पर एवं टीन शेड के नीचे तथा खुले आसमान में अथवा पेड़ों की छाया में होती थी, आज वहाँ स्कूल भवन उपलब्ध हैं, यह बात अलग है कि अभी भी पीने के पानी की व्यवस्था, शौचालय की व्यवस्था, उनकी सफाई, बैठने की व्यवस्था, अध्यापकों की कमी आदि की समस्या यथावत है। संक्षेप में शिक्षा व्यवस्था की मूल समस्यायें आज भी विद्यमान हैं। सरकारी स्कूलों में कक्षा-5 के सभी बच्चों के पढ़ाई के स्तर में गिरावट दर्ज की गई। माध्यमिक स्कूल के बच्चे गणित, साइंस और अंग्रेजी पढ़ने में कमजोर साबित हुए। दिल्ली के एक नवीनतम अध्ययन में शहर के केवल 54 प्रतिशत बच्चे ही कुछ वाक्य पढ़ सकते हैं। सोशल मीडिया से पता चलता है कि छात्रों को तो छोड़ दें, विद्यालयों के अध्यापक एवं प्रधानाध्यापक भी न तो सही हिज्जे लिख सके, न पढ़ सके और ना ही उन्हें शिक्षा का व्यवहारिक ज्ञान ही है। सामान्य ज्ञान तो शून्य ही है।

समस्यायें
1. मुख्य समस्या शिक्षा के प्रति सरकार की मजबूत इच्छा शक्ति का अभाव।
2. गवर्नेंस की गुणवत्ता में अथाह कमी।
3. असमावेषी शिक्षा प्रणाली का होना।
4. शिक्षक प्रबन्धन, षिक्षकों की षिक्षा और प्रषिक्षण, स्कूल प्रशासन एवं प्रबन्धन के स्तर पर कमी।
5. पाठ्यक्रमों में व्यवहारिकता का अभाव।
6. आर्थिक रूप से कमजोर विशेष के लिए किए गए प्रावधानों का लागू न किया जाना।
7. स्कूल स्तर के आँकड़ों की अविश्वसनीयता।
8. शिक्षा अधिकार अधिनियम को जमीनी स्तर पर लागू न किया जाना।
9. अवसंरचना का अभाव।
10. प्रदत्त शिक्षा एवं उद्योग के लिए आवश्यक शिक्षा के बीच गहरी खाई।
11. मंहगी उच्च शिक्षा।
12. भारतीय बच्चों के लिए आधारभूत सुविधाओं की कमी।
13. लैंगिक मुद्दों से युक्त समस्यायें।
14. शिक्षकों को शिक्षा के अलावा अन्य सभी अतिरिक्त कार्यों में लगाये रखना।
15. अनुशंसा से कम यानी 6 प्रतिशत के स्थान पर 4 प्रतिशत का बजट प्रावधान। वास्तविक खर्च का कोई रिपोर्ट न प्राप्त होना एवं बजट का दुर्विनियोजन।
16. छात्र/अध्यापक अनुपात में कमी।
17. मिड डे मील का दुरुपयोग।
18. ज्ञान नहीं भोजन की अवधारणा।
19. दोहरी शिक्षा प्रणाली।
20. शिक्षण संस्थाओं की खराब गुणवत्ता एवं खराब वैश्विक रैंकिंग।

समाधान
1. निःषुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के साथ एक समान शिक्षा व्यवस्था लागू किया जाय।
2. समावेषी शिक्षा प्रणाली पर बल दिया जाय एवं तदैव शिक्षा नीति का निर्माण किया जाय।
3. शिक्षा का बजट 6 प्रतिषत तक बढ़ाया जाय।
4. गुणवत्ता परक शिक्षा को बढ़ावा दिया जाय।
5. शिक्षा क्षेत्र में ढाँचागत विकास हेतु पी0पी0पी0; मॉडल अपनाया जाय।
6. शिक्षकों की योग्यता एवं प्रशिक्षण पर बल दिया जाय।
7. शिक्षकों से शिक्षा के अतिरिक्त अन्य कार्य यथासंभव न लिये जाये।
8. शिक्षा के क्षेत्र में अमीर-गरीब के बीच गहराती जा रही खाई को सषक्त रूप से पाटने का संकल्प लेकर तदैव कदम उठाया जाये।
9. ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालयों में शिक्षकों की उपस्थिति 100 प्रतिषत सुनिश्चित कराई जाय।
10. ग्रामीण विशेषकर सुदूर अंचलों के विद्यालयों में निर्धारित संख्या में अध्यापकों की तैनाती सुनिश्चित हो और शहर के निकट उनका केन्द्रीकरण रोका जाय।
11. शिक्षा की दोहरी प्रणाली समाप्त की जाय।
12. शिक्षा का राष्ट्रीयकरण किया जाय।

अन्त में यह उल्लेख करना समीचीन होगा कि 14 जुलाई 1964 को डॉ डी. एस. कोठारी की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय शिक्षा आयोग का गठन किया गया था। इस आयोग ने भी 29.06.1966 को प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में वर्तमान शिक्षा नीति की तीव्र आलोचना करते हुए बदलती परिस्थिति में ‘‘अनुकूल शिक्षा नीति’’ बनाये जाने की सिफारिश की थी और Equalisation of Educational Opportunities” पर बल दिया था। इसकी सिफारिशों के आधार पर ही वर्ष 1968 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा की गई थी जिसमें निम्न प्रमुख अनुशंसा की गई थीः

1. 14 वर्ष की आयु तक निशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा।
2. राष्ट्रीय आय का 6 प्रतिशत शिक्षा पर व्यय करना।
3. अध्यापकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था तथा उनके लिए मानक तय करना।
4. कृषि तथा औद्योगिक/व्यावसायिक शिक्षा का विकास।
5. शिक्षा का समानीकरण (Equalisation)

करीब 40 वर्षों बाद यह आंशिक रूप से लागू हो पाया। उक्त के अतिरिक्त बिहार राज्य हेतु श्री मुचकुन्द दूबे की समिति ने भी अपनी रिपोर्ट शिक्षा के सम्बन्ध में दी है जिसमें “Common School System” की अनुशंसा की गई है। वर्ष 1986 में नवीन शिक्षा नीति, टी. आर. सुब्रह्मण्यम् समिति, भारतीय शिक्षा नीति हेतु के. कस्तूरी रंगन समिति का भी गठन किया गया जिनकी अनुशंसा पर कार्यवाही होनी है।

शिक्षाविद ‘‘मल्कम एक्स’’ ने कहा है कि ‘‘शिक्षा भविष्य का पासपोर्ट है क्योंकि भविष्य उनका है, जो उसके लिए आज प्रयास करते हैं। इसी प्रकार डा. नेलसन मण्डेला का कथन है कि ‘‘वस्तुतः कोई देश तब तक विकास नहीं कर सकता जब तक उसके नागरिक शिक्षा नहीं प्राप्त कर लेते।’’ और आखिर में डा. अम्बेडकर कहते हैं- ‘‘शिक्षा मस्तिष्क को उपजाऊ बनाती है और मस्तिष्क का उपजाऊ होना मानव मात्र की अस्मिता का अन्तिम लक्ष्य है।’’ अतः अन्त भला सो सब भला और अन्तिम लक्ष्य प्राप्त होने पर ही सब कुछ हासिल हो सकता है। इसके लिए सभी स्तरों पर कृतसंकल्प होकर गुणवत्तापरक शिक्षा के विकास, समस्याओं के निदान और उसमें एकरूपता के लिए अथक प्रयास करने की जरूरत है और इसका एकमात्र विकल्प स्कूली शिक्षा का राष्ट्रीयकरण ही है।

लेखक- हीरालाल, आईएएस (सेवानिवृत्त), नोएडा


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