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हिंदू धर्म से बौद्ध धम्म तक....

 लंबे संघर्ष के बाद जब बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर को भरोसा हो गया कि वे हिंदू धर्म से जातिप्रथा और अस्पृश्यता की कुरीतियां दूर नहीं कर पा रहे हैं तो उन्होंने आहत होकर वो ऐतिहासिक वक्तव्य दिया जिसमें उन्होंने कहा कि मैं हिंदू पैदा तो हुआ हूं, लेकिन हिंदू मरूंगा नहीं. और जिस दिन बाबा साहब ने ये घोषणा की उसके करीब तीस साल बाद उन्होंने 14 अक्टूबर 1956 को उन्होंने बौद्ध धम्म अपनाया। इस बीच उन्होंने कई धर्मों को पढ़ा, और समझा, जिसके बाद उन्हें लगा कि बहुजन समाज के उत्थान के लिए बौद्ध धम्म ही सबसे बेहतर साबित होगा। लेकिन जो उम्मीद उन्होंने लगाई थी ऐसा नहीं हो सका, बहुजन समाज का बड़ा तबका बाबा साहब को मानता है लेकिन जब धर्म की बात आती है तो वो हिंदू धर्म की रूढ़ियों से बाहर नहीं निकलता दिखता। और जब वो खुद ही नहीं निकलता तो वो लोग भी नहीं आ पाते हैं जो कहीं ना कहीं उस तबके को अपना प्रेरणा स्रोत मानता है। आइए आज के इस ऐतिहासिक दिन पर चर्चा करते हैं बाबा साहब की हिंदू धर्म से बौद्ध धम्म तक के सफर पर...

बाबा साहब भीमराव अंबेडकर सन् 1950 के दशक में बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए और बौद्ध भिक्षुओं व विद्वानों के एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्रीलंका गये। पुणे बाबा साहब ने घोषणा की कि वे बौद्ध धर्म पर एक पुस्तक लिख रहे हैं और जैसे ही यह समाप्त होगी वो औपचारिक रूप से बौद्ध धर्म अपना लेंगे।  1954 में अम्बेडकर ने म्यांमार का दो बार दौरा किया। दूसरी बार वो रंगून मे तीसरे विश्व बौद्ध फैलोशिप के सम्मेलन में भाग लेने के लिए गये। 1955 में उन्होने 'भारतीय बौद्ध महासभा' या 'बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया' की स्थापना की। उन्होंने अपने अंतिम महान ग्रंथ, 'द बुद्ध एंड हिज़ धम्म' को 1956 में पूरा किया। यह उनकी मृत्यु के पश्चात, सन 1957 में प्रकाशित हुआ।  

14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में डॉ॰ भीमराव अम्बेडकर ने अपने पांच लाख से अधिक अनुयायियों के साथ बौद्ध धम्म की दीक्षा ली।  दुसरे दिन 15 अक्टूबर को बाबा साहब ने नागपुर में अपने दो लाख अनुयायियों को बौद्ध धम्म की दीक्षा दी, फिर तिसरे दिन 16 अक्टूबर को बाबा साहब ने चंद्रपुर में तीन लाख समर्थकों को बौद्ध धम्म की दीक्षा दी। इस तरह केवल तीन दिन में बाबा साहब ने 10 लाख से अधिक लोगों को बौद्ध धम्म में परिवर्तित किया।

14 अक्टूबर 1956 को अपने अनुयायियों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ निर्धारित कीं जो बौद्ध धर्म का एक सार या दर्शन है। डॉ॰ भीमराव आंबेडकर द्वारा 10,00,000 लोगों का बौद्ध धर्म में रूपांतरण ऐतिहासिक था क्योंकि यह विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक रूपांतरण था। उन्होंने इन शपथों को निर्धारित किया ताकि हिंदू धर्म के बंधनों को पूरी तरह पृथक किया जा सके। भीमराव की ये 22 प्रतिज्ञाएँ हिंदू मान्यताओं और पद्धतियों की जड़ों पर गहरा आघात करती हैं। ये एक सेतु के रूप में बौद्ध धर्मं की हिन्दू धर्म में व्याप्त भ्रम और विरोधाभासों से रक्षा करने में सहायक हो सकती हैं। इन प्रतिज्ञाओं से हिन्दू धर्म, जिसमें केवल हिंदुओं की ऊंची जातियों के संवर्धन के लिए मार्ग प्रशस्त किया गया, में व्याप्त अंधविश्वासों, व्यर्थ और अर्थहीन रस्मों, से धर्मान्तरित होते समय स्वतंत्र रहा जा सकता है। ये प्रतिज्ञाए बौद्ध धर्म का एक अंग है जिसमें पंचशील, मध्यममार्ग, अनिरीश्वरवाद, दस पारमिता, बुद्ध-धम्म-संघ ये त्रिरत्न, प्रज्ञा-शील-करूणा-समता आदी बौद्ध तत्व, मानवीय मुल्य (मानवता) एवं विज्ञानवाद है।

बौद्ध धर्म की दीक्षा लेने के लिए 22 प्रतिज्ञाएं:-

1- मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं करूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा।
2- मैं राम और कृष्ण, जो भगवान के अवतार माने जाते हैं, में कोई आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा। 
3- मैं गौरी, गणपति और हिन्दुओं के अन्य देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा।
4- मैं भगवान के अवतार में विश्वास नहीं करता हूँ।
5- मैं यह नहीं मानता और न कभी मानूंगा कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे, मैं इसे पागलपन और झूठा प्रचार-प्रसार मानता हूँ।
6- मैं श्रद्धा (श्राद्ध) में भाग नहीं लूँगा और न ही पिंड-दान दूँगा।
7- मैं बुद्ध के सिद्धांतों और उपदेशों का उल्लंघन करने वाले तरीके से कार्य नहीं करूँगा। 
8- मैं ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह को स्वीकार नहीं करूँगा।
9- मैं मनुष्य की समानता में विश्वास करता हूँ।
10- मैं समानता स्थापित करने का प्रयास करूँगा।
11- मैं बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग का अनुशरण करूँगा।
12- मैं बुद्ध द्वारा निर्धारित परमितों का पालन करूँगा।
13- मैं सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया और प्यार भरी दयालुता रखूँगा तथा उनकी रक्षा करूँगा।
14- मैं चोरी नहीं करूँगा।
15- मैं झूठ नहीं बोलूँगा।
16- मैं कामुक पापों को नहीं करूँगा।
17- मैं शराब, ड्रग्स जैसे मादक पदार्थों का सेवन नहीं करूँगा।
18- मैं महान आष्टांगिक मार्ग के पालन का प्रयास करूँगा एवं सहानुभूति और प्यार भरी दयालुता का दैनिक जीवन में अभ्यास करूँगा।
19- मैं हिंदू धर्म का त्याग करता हूँ जो मानवता के लिए हानिकारक है और उन्नति और मानवता के विकास में बाधक है क्योंकि यह असमानता पर आधारित है, और स्व-धर्मं के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाता हूँ।
20- मैं दृढ़ता के साथ यह विश्वास करता हूँ की बुद्ध का धम्म ही सच्चा धर्म है।
21-  मुझे विश्वास है कि मैं फिर से जन्म ले रहा हूँ (इस धर्म परिवर्तन के द्वारा)।
22-  मैं गंभीरता एवं दृढ़ता के साथ घोषित करता हूँ कि मैं इसके (धर्म परिवर्तन के) बाद अपने जीवन का बुद्ध के सिद्धांतों व शिक्षाओं एवं उनके धम्म के अनुसार मार्गदर्शन करूँगा।

अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध और उनके धम्म को पूरा करने के तीन दिन के बाद 6 दिसम्बर 1956 को बाबा साहब का महापरिनिर्वाण दिल्ली में उनके घर पर हो गया। 7 दिसंबर को मुंबई में दादर चौपाटी समुद्र तट पर बौद्ध परंपरा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके लाखों समर्थकों, कार्यकर्ताओं और प्रशंसकों ने भाग लिया। उनके अंतिम संस्कार के समय उन्हें साक्षी रखकर उनके करीब 10,00,000 अनुयायियों ने बौद्ध धम्म  की दीक्षा ली थी,  विश्व के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था।


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