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हम कितने राष्ट्रवादी हैं ?

हंगामे भरे चुनावी संग्राम के बाद अब गुजरात और हिमाचल प्रदेश मे हुए चुनावों के परिणाम भी आ गए हैं, लेकिन इन दोनों प्रदेशों में हंगामे भरा चुनावी संग्राम बहुत से प्रश्न जनता के सामने छोड़ गया है। राजनेताओं के लिए वो सवाल कतई भी चिंता भरे नहीं हैं क्योंकि वो सवाल उनकी कथनी और करनी के कारण ही सुधी जनता के सामने परोसे गए हैं।

सबसे पहला सवाल ये है कि हम कितने राष्ट्रवादी हैं। काफी सोच-विचार करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि जितने भी पढ़े-लिखे लोग हैं, कम से कम वो तो राष्ट्रवादी हैं ही नहीं.... वो या तो भाजपाई हैं या फिर कांग्रेसी यानि कि सब के सब राजनीतिक खैमों में बंटे हुए हैं। अर्थात वे राजनीति के प्रेमी है, देश प्रेमी तो कतई नहीं हैं। और राजनेता....? हाँ तो राजनेता पहले कुर्सी-प्रेमी ...दूसरे वोट-प्रेमी। अब क्योंकि राजनेताओं को वोट चाहिए तो कुछ न कुछ काम मजबूरी में करना पड़ता ही है। ...उसमें भी सबसे पहले बने-बनाए चाटुकारों के हितों की रक्षा करने के साथ-साथ कुछ नए चाटुकार पैदा करना होता है....तरीका कुछ भी हो। और जो पढ़े-लिखे जो चाटुकार होते हैं न, ये देश की साधारण अपढ़ आम जनता को राजनीतिक खैमों में घसीसटने का काम करते हैं। इस माने में अपने आप को राष्ट्रवादी/देश प्रेमी कहना अपने साथ ही ग़द्दारी करना है। भाजपा के केन्द्र में आने के बाद देशभक्ति की परिभाषा ही जैसे बदल गई है। जो भाजपा और मोदी का भक्त केवल वही देशभक्त और जो सत्तारूढ़ दल का भक्त नहीं, वह राष्ट्रद्रोही। मैं जानता हूँ कि ये बात तथाकथित राष्ट्रवादियों/देश-प्रेमियों को कतई नहीं भाएगी। कुछ लोग मुझ पर अनेक अप्रासंगिक प्रश्न उठाएंगे... गाली भी देंगे। किन्तु मैं जानता हूँ कि इनमें अक्सर वही लोग होंगे, जिनकी अपनी डाढ़ी में ही तिनके होंगे। फिर भी देश में कुछ लोग तो अपवाद के रूप में राष्ट्रप्रेमी/देशभक्त होंगे ही, तब ही तो देश चल रहा है....मैं उनके सामने नतमस्तक हूँ।

गुजरात के चुनावों में खासकार यह देखा गया कि भाजपा का “विकास” पगलाया हो या न पगलाया हो किंतु भारत का तथाकथित मुख्यधारा का जिम्मेदार मीडिया जरूर पगला गया था... राजनेताओं की तो बात ही क्या। भाजपा के अनुपम खेर तो खुले तौर पर यह कह डाला कि जो व्यक्ति झूठ बोल सकता है, वो ही एक्टर बन सकता है (कपिल शर्मा के शो में)। अब पता नहीं उनका इशारा अपनी ओर था या मोदी जी की ओर।

मोदी जी ने चुनाव प्रचार में जिस-जिस प्रकार के हथकंडे अपनाए, वो किसी नाटक से कम नहीं कहे जा सकते। मोदी जी ने एक सभा में कहा कि वो पिछ्ले तीस सालों से जातीय उत्पीड़न झेलते आ रहे हैं। कमाल तो ये है कि खुद दूसरों पर जातिवादी होने का आरोप लगाते हैं और खुद जातिवाद को केन्द्र में रखकर सत्ता हथियाने का उपक्रम करते हैं। अब देखो न कांग्रेस के मणिशंकर ने अपनी  एक टिप्पणी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “नीच” आदमी बताया और कहा, “ ये आदमी बड़ा ही नीच आदमी है। इसमें कोई सभ्यता नहीं है। और ऐसे मौके पर इस किस्म की गंदी राजनीति करने की क्या आवश्यकता है।”  इसका सर्वत्र जमकर विरोध भी हुआ... होना भी चाहिए था। खैर! इस पर विवाद होने के बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मणिशंकर अय्यर से माफी मांगने को कहा है। अय्यर ने माँफी मांग भी ली। किंतु मोदी जी ने अय्यर के बयान को तोड़ मरोड़ कर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अहमदाबाद में नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘मणिशंकर अय्यर ने कहा है कि मैं “नीच जाति” से आता हूं।  मैं नीच हूं, यह गुजरात का अपमान है।” यहाँ यह सवाल उठता है कि मोदी जी ने किस सामाजिक और राजनीतिक मर्यादा का पालन किया है। इतना ही नहीं, मणिशंकर के इस बयान को मीडिया ने पानी पी-पी कर बार-बार जनता के सामने परोसकर अपने आप को “गोदी मीडिया” होने का प्रमाण ही दिया। मोदी जी ने मणिशंकर की उन्हें नीच व्यक्ति कहने वाली टिप्पणी पर यहाँ तक कह डाला कि यह मुगल मानसिकता है। इस दौरान मुगल उनके प्रिय बने रहे।
  
चुनाव प्रचार के दौरान ऐसी आपत्तिजनक अनेक घटनाएं घटती रहीं और चुनाव आयोग मूकदर्शक बना सबकुछ शांत भाव से देखता रहा। कहना अतिशयोक्ति न होगा कि चुनाव आयोग ही नहीं अपितु और भी जितने आयोग हैं, सरकार के बन्धुआ मजदूर की भूमिका में ही नजर आते हैं क्योंकि उनके मुखिया की नियोक्ता सरकार होती है।

खेद की बात तो ये है कि हमारे प्रधानमंत्री व उनके मंत्रिमंडल के समाजसेवी सदस्य समाज में नित्यप्रति घट रहीं अमानवीय व अपराधिक घटनाओं पर कुछ भी नहीं बोलते। ...क्यों? रामसमन्द(राजस्थान) की आपराधिक घटना लगभग उसी समय में घटी थी जब मणिशंकर अय्यर ने प्रधानमंत्री को "नीच" कहा था। प्रधानमंत्री जी ने उसको तो चुनावी मैदान में हथियार के रूप में प्रयोग करने में देर नहीं लगाई किन्तु रामसमन्द की घटना पर प्रधानमंत्री तो क्या कोई भी नेता नहीं बोला। ....अय्यर की टिप्पणी की निंदा करना बुरा नहीँ, .....अय्यर की टिप्पणी की निंदा की ही जानी चाहिए किन्तु क्या अन्य समाज विरोधी घटनाओं पर उन्हें नहीं बोलना चाहिए?  समाज में भय फैलाने के भाव से, जरूर ही इस घटना के पीछे किन्हीं न किन्हीं अलगाववादी ताकतों का हाथ रहा होगा, ऐसा प्रतीत होता है। वर्तमान नफरत भरे राजनीतिक और धार्मिक परिदृश्य के चलते मेरे तर्क को एकदम सिरे से खारिज कर देना, मुझे नहीं लगता कि किसी भी सहृदय व्यक्तित्व के लिए संभव हो सकता है। अब राजसत्ता इस जघन्य घटना पर आंसू बहायेगी।....जांच कमेटी का गठन करेगी। पीड़ित परिवार को सरकारी आर्थिक मदद दी जाएगी। ....अपराधी पर वर्षों तक न्यायिक मामला चलेगा। इतने में मामला ठंडा हो जाएगा। किन्तु क्या इस सब से समाज में उत्त्पन्न अराजकता के घाव भर जाएंगे?

राजनेताओं ने सत्ता हथियाने के लिए गुजरात के चुनाव को हिन्दू और मुसलमान का चोला पहना दिया है...राम मंदिर के निर्माण को लेकर राजनीति इस हद तक गर्क में चली गई है कि तमाम राजनीतिक/सामाजिक/धर्मिक/आर्थिक/भाषिक मर्यादाएं ध्वंस हो गईं हैं। देश में अशांति का माहौल है।....देश मजहबी बारूद के ढेर पर बैठा है। .....न जाने कब क्या हो जाए। कहना अतिश्योक्ति न होगा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा राम मुद्दे को फरवरी 2018 तक खिसकाने के बाद प्रधानमंत्री क्रोधित हैं, कांग्रेस कुपित है और जनता चिन्तित है। देश में शांति बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दायित्व बढ़ जाता है। देश हित को ध्यान में रखते हुए क्या सुप्रीम कोर्ट को उन गैरजिम्मेदार टीवी चैनल्स पर ऐसी खबरें और कार्यक्रमों के प्रसारण को बैन कर देना चाहिए जिनमें बहस के जरिये भड़काऊ व्यक्तव्य खुलकर दिए जा रहे हैं ?

शायद यह पहला मौका था कि जब गुजरात के चुनावों में प्रधानमंत्री सहित समूचा केन्द्रीय मंत्रीमंडल व समूचा मीडिया गुजरात के प्रवास पर रहा।  लगभग एक माह के प्रवास के बाद यानी गुजरात चुनाव के आखरी दौर के बाद भारत सरकार..sorry.. मोदी सरकार दिल्ली लौटी। किन्तु इस दौरान देश यथावत चलता रहा।.....शायद किसी विदेशी ने किसी भारतवासी के “ What are your views about Indian Government?” इस सवाल जवाब में ठीक ही कहा था.....”That there is no Govt. In India. India is running itself.......। ”

अंत में यह कहना शायद अप्रासंगिक न होगा कि सरकार के समर्थक घटक प्रत्येक स्तर पर भय का वातावरण बनाने पर तुले हुए हैं फिर चाहे बात लव जिहाद की हो या गौरक्षा की, धार्मिक विद्वेश की बात हो या फिर हिन्दू-मुसलमान की। अब एक और जिहाद सामने आया है... वह है “लेंड जिहाद” का जिसका केंद्र मेरठ रहा है। यदि लोकतंत्र में भी "ताकत" ही "न्याय" है तो "लोकतंत्र" और "एकतंत्र" में क्या अंतर रह जाता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

   लेखक:  तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), दो निबन्ध संग्रह  और अन्य। तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।


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