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महात्मा ज्योतिबा फुले- आधुनिक भारत के मार्गदर्शक

महात्मा ज्योतिबा फुले (ज्योतिराव गोविंदराव फुले) को 19वीं सदी के महान क्रांतिकारी, भारतीय विचारक, समाजसेवी, लेखक एवं दार्शनिक थे। उन्होंने भारतीय समाज में फैली अनेक कुरूतियों को दूर करने के लिए सतत संघर्ष किया, अछूतोद्वार, नारी-शिक्षा, विधवा विवाह और किसानों के हित के लिए ज्योतिबा ने उल्लेखनीय कार्य किए।

ज्योतिबा फुले का जन्म 1827 ई. में पुणे में हुआ था। उनका परिवार कई पीढ़ी पहले सतारा से पुणे आकर फूलों के गजरे आदि बनाने का काम करने लगा था। फूलों के गजरे आदि बनाने का काम करने के कारण लोग उनके परिवार को 'फुले' के नाम से जानने लगे थे।  

ज्योतिबा जब मात्र एक वर्ष के थे, तो उनकी माताजी का निधन हो गया। ज्योतिबा का पालन पोषण सगुनाबाई नामक एक दाई ने किया। सगुनाबाई ने उन्हें बहुत ही  ममता और दुलार से पाला, उन्होंने कभी भी ज्योतिबा को मां की कमी महसूस नहीं होने दी।  

ज्योतिबा को सात वर्ष की उम्र में गांव के स्कूल में पढ़ने के लिए भेजा गया। लेकिन जातपात, भेदभाव के कारण उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा। स्कूल छोड़ने के बाद भी उनके अंदर पढ़ने की ललक कम नही हुई, इसलिए सगुनाबाई ने ज्योतिबा को घर पर ही पढ़ना शुरू कर दिया। घरेलु कार्यो के बाद जो समय बचता उसमे वह किताबें पढ़ते थे। ज्योतिबा  पास-पड़ोस के बुजुर्गो से विभिन्न विषयों पर चर्चा करते थे। लोग उनकी सूक्ष्म और तर्कसंगत बातों से बहुत प्रभावित होते थे।

अरबी-फ़ारसी के विद्वान गफ्फार बेग मुंशी एवं फादर लिजीट साहब ज्योतिबा के पड़ोस में रहते थे, और बालक ज्योतिबा की प्रतिभा एवं शिक्षा के प्रति  रुचि  से बेहद प्रभावित थे,  उन्होंने ज्योतिबा को दोबारा स्कूल में दाखिला दिलाया और ज्योतिबा फिर से स्कूल जाने लगे। वे हमेशा स्कूल में प्रथम स्थान पर आते।

उन्हें इस प्रश्न का उत्तर नहीं सूझता कि – इतना बड़ा देश गुलाम क्यों है? गुलामी से उन्हें नफरत होती थी। उन्होंने महसूस किया कि जातियों और पंथो में बंटे इस देश का सुधार तभी संभव है जब लोगो की मानसिकता में सुधार होगा। उस समय जात-पात, वर्गभेद अपनी चरम सीमा पर था। स्त्री और दलित वर्ग की दशा अच्छी नहीं थी। उन्हें शिक्षा से वंचित रखा जाता था। ज्योतिबा को इस स्थिति पर बड़ा दुःख होता था।

उस समय ज्योतिबा ने ही परिस्थितियों को समझते हुए सबसे पहले स्त्री और दलितों की शिक्षा के लिए सामाजिक संघर्ष का बीड़ा उठाया था। वे मानते थे कि लडकियों को शिक्षित करना बेहद जरूरी है, क्योंकि एक स्त्री जब शिक्षित होती है तो वो पूरे परिवार को शिक्षित करती है, यदि स्त्री अशिक्षित है तो पूरा परिवार अशिक्षा की ओर बढ़ जाता है।

उन्होंने उच्च वर्ग से छिपाकर अपने घर से ही स्कूल चलाना शुरू किया, ज्योतिबा दलितों और लड़कियों को अपने घर में पढ़ाते थे, वह बच्चो को छिपाकर लाते और वापस उनके घर पहुंचाते थे।  जैसे–जैसे उनके समर्थक बढ़े उन्होंने खुलेआम स्कूल चलाना प्रारंभ कर दिया।

स्कूल प्रारम्भ करने के बाद ज्योतिबा को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उनके विद्यालय में पढ़ाने को कोई तैयार न होता। कोई पढ़ाता भी तो सामाजिक दवाब में उसे जल्दी ही यह कार्य बंद करना पड़ता। इन स्कूलों में पढ़ायें कौन ? यह एक गंभीर समस्या हो गई थी। इसलिए ज्योतिबा ने अपनी पत्नी सावित्री को पढ़ना-लिखना सिखाया और फिर मिशनरीज के नार्मल स्कूल में प्रशिक्षण दिलवाया। प्रशिक्षण के बाद वह भारत की प्रथम प्रशिक्षित महिला शिक्षिका बनीं।

सावित्री बाई फुले के शिक्षा ग्रहण कर लेने से उच्च वर्गीय समाज के लोगों में गुस्से में आपे से बाहर हो गए। जब सावित्री बाई स्कूल जाती तो लोग उनको तरह-तरह से अपमानित करते। उनके ऊपर गोबर फैंकते। परन्तु सावित्री बाई अपमान का घूँट पीकर भी अपना कार्य करती रहीं। इस पर लोगो ने ज्योतिबा को समाज से बहिष्कृत करने की धमकी दी। खुद उनके पिता ने उनसे नाराज होकर उन्हें घर से बाहर निकाल दिया।

पिता के घर से निकाल देने के बाद ज्योतिबा और सावित्री बाई को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। लेकिन वे अपने लक्ष्य से डिगे नहीं। एक बार अँधेरी काली रात में बिजली चमक रही थीं, महात्मा ज्योतिबा को घर लौटने में देर हो गई थी। वह सरपट घर की ओर बढ़े जा रहे थे। बिजली चमकी उन्होंने देखा आगे रास्ते में दो व्यक्ति हाथ में चमचमाती तलवारें लिए जा रहे है। वह अपनी चाल तेज कर उनके समीप पहुंचे। महात्मा ज्योतिबा ने उनसे उनका परिचय व इतनी रात में चलने का कारण जानना चाहा। उन्होने बताया हम ज्योतिबा को मारने जा रहे है।

महात्मा ज्योतिबा ने कहा– उन्हें मार कर तुम्हे क्या मिलेगा? उन्होंने कहा– पैसा मिलेगा, हमें पैसे की आवश्यकता है। महात्मा ज्योतिबा ने क्षण भर सोचा फिर कहा- मुझे मारो, मैं ही ज्योतिबा हूँ, मुझे मारने से अगर तुम्हारा हित होता है, तो मुझे ख़ुशी होगी। इतना सुनते ही उनकी तलवारें हाथ से छूट गईं। वह ज्योतिबा के चरणों में गिर पड़े, और उनके शिष्य बन गए।

महात्मा ज्योतिबा फुले ने ”सत्य शोधक समाज” संगठन की स्थापना की। सत्य शोधक समाज पूरे महाराष्ट्र में शीघ्र ही फ़ैल गया। सत्य शोधक समाज के लोगो ने जगह–जगह दलितों और लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूल खोले। छूआ-छूत का विरोध किया। किसानों के हितों की रक्षा के लिए आन्दोलन चलाया।  महात्मा ज्योतिबा व उनके संगठन के संघर्ष के कारण सरकार ने ‘एग्रीकल्चर एक्ट’ पास किया। धर्म, समाज और परम्पराओं के सत्य को सामने लाने हेतु उन्होंने अनेक पुस्तकें भी लिखी।

1. तृतीय रत्न,
2. छत्रपति शिवाजी,
3. राजा भोसला का पखड़ा,
4. ब्राह्मणों का चातुर्य,
5. किसान का कोड़ा,
6. अछूतों की कैफियत.
7. गुलामगिरी   

28 नवम्बर 1890 को उनका महापरिनिर्वाण हो गया। उनकी पुण्यतिथि को 'स्मृति दिवस' के रुप में भी जाना जाता है। बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर  महात्मा ज्योतिबा फुले के आदर्शों से बहुत प्रभवित थे, उन्होंने महात्मा ज्योतिबा फुले के लिए कहा था :-  "महात्मा फुले मॉडर्न इंडिया के सबसे महान शूद्र थे, जिन्होंने पिछड़ी जाति के हिन्दुओं को अगड़ी जाति के हिन्दुओं का गुलाम होने के प्रति जागरूक किया, जिन्होंने यह शिक्षा दी कि भारत के लिए विदेशी हुकूमत से स्वतंत्रता की तुलना में सामाजिक लोकतंत्र कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है।"

ज्योतिबा फुले जीवन भर गरीबों, दलितों और महिलाओ के लिए संघर्ष करते रहे। उनकी समाजसेवा देखकर 1888 ई. में मुंबई की एक विशाल सभा में उन्हें 'महात्मा' की उपाधि दी गई। बहुजनों और स्त्रियों में शिक्षा की जो अलख महात्मा ज्योतिबा फुले ने जलाई, उसकी रोशनी को ही बाबा साहब ने आगे बढ़ाया। इसलिए जो काम उन्होंने शुरू किए, वो आधुनिक भारत में शायद ही किसी ने किए हों। इसीलिए बाबा साहब ने उन्हें अपना तीसरा गुरू माना।  


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