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बाबा साहब डॉ भीमराव अंबे़डकर- करोड़ों लोगों को मनुष्यता का जीवन देने वाले मसीहा का समय से पहले चले जाना

भारत में 6 दिसंबर का दिन करोड़ों लोगों के लिए बहुत अहमियत रखता है। इसी दिन भारतीय संविधान निर्माता बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर का महापरिनिर्वाण हुआ था। 6 दिसंबर 1956 को उनके परिनिर्वाण के करीब 35 साल बाद 1990 में उन्हें भारत रत्न दिया गया। यहां पर 35 साल का ज़िक्र करना इसलिए जरूरी हो जाता है कि इतनी महान शख्सियत, जिसने देश के लिए इतना काम किया, एक बड़े समाज को नारकीय जिंदगी से निकाल कर मुख्यधारा का जीवन मुहैया कराया, लेकिन हमारी जातिवादी सरकारें को चाहे वे किसी भी पार्टी की रही हों, उन्हें बाबा साहब का योगदान 35 सालों बाद समझ आया।

दलितों और शोषितों के हदय-सम्राट बाबा साहब डॉ. अंबेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को अशोक विजयादशमी के दिन नागपुर में अपने लाखों समर्थकों के साथ बौद्धधर्म की दीक्षा ली थी। भारत को संविधान देने वाले महान नेता डा. भीम राव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश में हुआ था।

डा. भीमराव अंबेडकर के पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल और माता का भीमाबाई था। वे अपने माता-पिता की चौदहवीं संतान थे। भीमराव अंबेडकर का जन्म महार जाति में हुआ था जिसे लोग अछूत और बेहद निचला वर्ग मानते थे। बचपन में भीमराव अंबेडकर के परिवार के साथ सामाजिक और आर्थिक रूप से गहरा भेदभाव किया जाता था।

भीमराव अंबेडकर के बचपन का नाम रामजी सकपाल था। अंबेडकर के पूर्वज लंबे समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कार्य करते थे और उनके पिता ब्रिटिश भारतीय सेना की मऊ छावनी में सेवा में थे। भीमराव के पिता हमेशा ही अपने बच्चों की शिक्षा पर जोर देते थे।

1894 में भीमराव अंबेडकर जी के पिता सेवानिवृत्त हो गए और इसके दो साल बाद अंबेडकर की मां की मृत्यु हो गई। बच्चों की देखभाल उनकी चाची ने कठिन परिस्थितियों में रहते हुये की। रामजी सकपाल के केवल तीन बेटे, बलराम, आनंदराव और भीमराव और दो बेटियाँ मंजुला और तुलासा ही इन कठिन हालातों मे जीवित बच पाए थे। अपने भाइयों और बहनों मे केवल अंबेडकर ही स्कूल की परीक्षा में सफल हुए और इसके बाद बड़े स्कूल में जाने में सफल हुए।

बाबा साहब के एक ब्राह्मण शिक्षक थे महादेव अंबेडकर, जो बाबा साहब से बहुत स्नेह रखते थे उन्होंने ही बाबा साहब को अंबेडकर नाम दिया था। वे बाबा साहब की प्रतिभा से बहुत प्रभावित रहते थे, और उनके हालात से भी वाकिफ थे, इसीलिए वे अपने छात्र अंबेडकर को कभी कपड़े, खाना और जरूरत की चीज़े देते रहते थे। 8 अगस्त 1930 को एक शोषित वर्ग के सम्मेलन के दौरान अंबेडकर ने अपनी राजनीतिक दृष्टि को दुनिया के सामने रखा, जिसके अनुसार शोषित वर्ग की सुरक्षा उसकी सरकार और कांग्रेस दोनों से स्वतंत्र होने में है। अपने विवादास्पद विचारों, और गांधी और कांग्रेस की कटु आलोचना के बावजूद अंबेडकर की प्रतिष्ठा एक अद्वितीय विद्वान और विधिवेत्ता की थी। 15 अगस्त 1947 में देश के आजाद हो जाने के बाद उन्हें देश का पहला कानून मंत्री बनाया गया।

29 अगस्त 1947 को अंबेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना के लिए बनी संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपना लिया। 14 अक्टूबर, 1956 को नागपुर में बाबा साहब करीब पांच लाख समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण किया। 1948 से अंबेडकर मधुमेह से पीड़ित थे।

6 दिसंबर 1956 को अंबेडकर जी महापरिनिर्वाण को प्राप्त हुए। और बहुजन समाज के लिए ही नहीं पूरे देश को भारी क्षति का सामना करना पड़ा। वे देश और बहुजनों की भलाई के लिए दिन-रात काम करते थे। जिसके कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ता चला गया। वे अपने सोने और खाने का भी ख्याल नहीं रखते थे। वे कहते थे कि ‘जब तक मेरा समाज सोया हुए है, मैं नहीं सो सकता’। और इस तरह वे समय से पहले ना जाने कितने कामों को अधूरा छोड़कर चले गए।
  
बाबा साहाब डॉ अंबेडकर एक महान विधिवेता, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक थे। उन्होंने दलित समाज, मजदूर वर्ग और महिलाओं के प्रति सामाजिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई और अभियान चलाए। उनका ऋण बहुजन समाज ही नहीं पूरा देश शायद ही कभी चुका पाए। पड़ताल.कॉम की टीम करोड़ों दिलों में बसने वाले सदी के महानायक बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर जी को शत् शत् नमन करती है।
 


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