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बाबासाहब के परिनिर्वाण दिवस पर विशेष- बाबा साहब के विचारों को आत्मसात करना ही सच्ची श्रद्धांजलि

6 दिसंबर 1956 को बहुजन समाज के मसीहा बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडकर हमारे बीच से चले गए। कांशीराम जी उस समय देहरादून में नौकरी कर रहे थे। वहां पर गोरखपुर निवासी उनका सहकर्मी बाबा के परिनिर्वाण पर बहुत दुखी था। वह रो-रो कर कह रहा था कि हमारे बीच में अब कोई बाबा पैदा नहीं होगा। आज से हम अनाथ हो गए हैं। इस बात पर कांशी राम जी ने कहा कि भाई हर किसी के मां बाप इस संसार से चले ही जाते हैं, इसी तरह बाबा भी हमारे बीच से चले गए। परंतु यदि आप बाबा के रास्ते पर चलकर बाबा का काम करोगे तभी सही रूप में बाबा के बच्चे कहला सकते हो। रोने से, पूजा करने से, माला चढ़ाने से उनके विचार को कोई फायदा नहीं होगा। यदि आप बाबा के काम को आगे बढ़ाने के इच्छुक हो तो आप भी बाबा की तरह काम करो। ऐसा करने से आप भी बाबा की तरह सम्मान पा सकते हो। आगे आने वाली पीढ़ियां आप के मरने पर ऐसे ही रोएंगी जैसे आप बाबा के लिए रो रहे हो।  

कांशी राम जी के समझाने पर वह व्यक्ति अपने गांव जाकर काम करने के लिए राजी हो गया। कांशीराम जी उनको अपनी आधी तनख्वाह मनीआर्डर से उनके घर भेजने लगे। इसीलिए कांशीराम जी ने अपना परिवार नहीं बनाया और ना ही वह अपने परिवार में वापस गए। कुछ महीनों के बाद मनीआर्डर उनके पास वापस आने लगा तो उनको चिंता हुई। कांशीराम जी सोचने लगे आखिर वह व्यक्ति कहां गया और वह पैसा लौटा क्यों रहा है?  

उन्हें पता लगा कि वह व्यक्ति बाबा के रास्ते पर चलकर शहीद हो गया। इसलिए कांशी राम जी को अफसोस हुआ कि  उनकी वजह से उस व्यक्ति ने बाबा का काम करने का संकल्प लिया था और जिसने स्वाभिमान की लड़ाई में अपनी जान गवा दी। इस बात से कांशीराम जी को गहरा  झटका लगा और उन्होंने बाबा का काम खुद आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।   

आगे आने वाले समय में उनके काम से बहुजन समाज बना। लाखों लोग नारे लगाने लगे बाबा तेरा मिशन अधूरा कांशीराम करेंगे पूरा। परंतु आज कांशीराम जी का भी मिशन अधूरा है। आइए आज हम बाबा साहब  और  कांशीराम जी के कारवां को आगे बढ़ाने का संकल्प लेकर बाबासाहब के परिनिर्वाण दिवस को याद करें ।  


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