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खामोश दिलों में फिर से बिस्मिलाह की शहनाई की गूंज की जरूरत, उस्ताद बिस्मिलाह खां की पुण्यतिथि पर विशेष

21 अगस्त, 2017, आज भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की 11वीं पुण्यतिथि है। पूरी दुनिया में शहनाई को पहचान दिलाने वाले भारत रत्‍न उस्‍ताद बिस्मिल्लाह खां किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। शहनाई वादन में उन्होंने देश को दुनिया में एक अलग मुकाम दिलाया। वे शहनाई को अपनी बेगम कहते थे उनका जन्म 21 मार्च 1913 में बिहार के डुमरांव हुआ था। उनका जन्म का नाम कमरूद्दीन था लेकिन उनके बड़े दादा ने जब उन्हें पहली बार देखा तो उनके मुहं से निकला बिस्मिलाह, उसके बाद से वो बिस्मिलाह के नाम से ही जाने गए। उनके सभी पूर्वज दरबारी संगीतकार थे और वे भोजपुर राज्य में नक्कार खाना में अपने वाद्यों को बजाते थे जो आज बिहार राज्य में आता है। उनके पिता दुमराओं साम्राज्य, बिहार के महाराजा केशव प्रसाद सिंह के दरबार में शेहनाई वादक का काम करते थे।एक बार बचपन में जब वो छह साल के थे, ईद मनाने अपने मामू के घर बनारस गए थे। जिसके बाद वो अपनी जन्मस्थली वापस ही नहीं गए और बनारस ही उनकी कर्मस्थली बन गई। उनके दोनों मामू शहनाई बजाते थे, छोटे मामू यानी अली बख्श बालाजी मंदिर में शहनाई बजाते थे और वहीं रियाज भी करते थे, और बिस्मिलाह हमेशा उनके साथ रहते थे, शहनाई से उनका लगाव देखकर उनके पिता ने उन्हें उनके मामू अली बख्श के पास ही बनारस भेज दिया। बिस्मिलाह जी को गंगा और काशी विश्वनाथ से खास लगाव था, इसीलिए वो कभी काशी छोड़कर नहीं जा सके, वे घंटों गंगा के किनारे बैठकर रियाज़ किया करते थे। शहनाई पर शास्त्रीय धुन बजाकर बिस्मिलाह खां ने पूरे विश्व में शहनाई को नई पहचान दिलाई। ख़ाँ साहब ने देश और दुनिया के अलग अलग हिस्सों में अपनी शहनाई की गूंज से लोगों को मोहित किया। अपने जीवन काल में उन्होंने ईरान, इराक, अफगानिस्तान, जापान, अमेरिका, कनाडा और रूस जैसे अलग-अलग मुल्कों में अपनी शहनाई की धुन बिखेरी थी।
भारत की आजादी और बिस्मिलाह ख़ाँ जी की शहनाई का भी ख़ास रिश्ता रहा है। 15 अगस्त 1947 में आजादी की पूर्व संध्या पर जब लालकिल पर देश का झंडा फहराया जा रहा था तब उनकी शहनाई भी वहां आजादी का संदेश सुना रही थी। तब से लगभग हर साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री के भाषण के बाद बिस्मिलाह का शहनाई वादन एक प्रथा बन गई। भारतीय आज़ादी के बाद बिस्मिल्लाह खान भारत के प्रसिद्ध क्लासिकल संगीतकारों में से एक थे और साथ ही भारत में हिन्दू-मुस्लिम एकता का एक जीता-जागता उदाहरण थे। उन्होंने दुनिया में कई जगहों पर, कई देशो में अपने शेहनाई की धुन से लोगो को मंत्रमुग्ध किया था। वे अपने काम की भगवान की तरह पूजा करते थे। उन्हें सम्मान देते हुए उनकी मृत्यु के बाद शेहनाई को भी उन्ही के साथ जलाया गया था। अपने संगीत के गुणों से लोगो में शांति, एकता और प्यार फ़ैलाने के लिये उस्ताद बिस्मिल्लाह खां प्रसिद्ध थे।
पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी शहनाई सुनने के लिए उन्हें न्योता देकर बुलवाती थीं।  स्व .राजीव गांधी ने एक बार उन्हें खुद दिल्ली बुलवाया था और घंटों सोनिया गांधी के साथ बैठकर शहनाई सुनी थी। एक बार मुंबई में खान साहब की मुलाकात स्व. बाला साहब ठाकरे से हुई। बाला साहब ने उनसे शहनाई कि धुन में बधैया को सुनाने का आग्रह किया। जिसके बाद करीब 40 मिनट तक उन्होंने शहनाई की ऐसी तान छेड़ी कि बाला साहब उनसे प्रभावित हो गए। राजनेता ही नहीं अभिनेता भी उनके मुरीद थे। उन्होंने कन्नड़ फिल्म ‘सन्नादी अपन्ना’, हिंदी फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ और सत्यजीत रे की फिल्म ‘जलसाघर’ के लिए शहनाई की धुनें छेड़ी। आखिरी बार उन्होंने आशुतोष गोवारिकर की हिन्दी फिल्म ‘स्वदेश’ के गीत ‘ये जो देश है तेरा’ में शहनाई की मधुर तान बिखेरीं।  उस्ताद  लिए शहनाई ही बेगम और मौसिकी थी। इंतकाल के वक्त उन्हें सम्मान देने के लिए साथ में एक शहनाई भी दफ्न की गई थी। बिस्मिल्लाह खान साहब मुस्लिम होने के बावजूद वह हिंदू देवी और सरस्वती के बहुत भक्त माने जाते हैं।
5 दिसंबर 2016 को उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की शहनाइयां चोरी हो गई थी। घटना के बाद यूपी पुलिस ने जांच स्पेशल टास्क फोर्स को सौंपी थी। पुलिस के मुताबिक, इस घटना को उस्ताद के पोते नजरे ने ही अंजाम दिया था। उसने शहनाइयां 17 हजार रुपए में लोकल ज्वैलर को बेच दी थीं। आरोपी नजरे हुसैन ने अपने दो साथियों ज्‍वैलर सुजीत और शंकर लाल सेठ के साथ मिलकर घटना को अंजाम दिया था। उसने उस्ताद की पेटी से चार शहनाइयां चुराईं। इनमें से चार चांदी की थीं। 5वीं लकड़ी की थी।  ज्वैलर ने चारों शहनाइयों को गला दिया और इसकी चांदी निकाल ली। नजरे ने स्वीकार किया था कि उसने सुजीत सेठ को 17 हजार रुपए में शहनाइयां बेची थीं।
आज उनका परिवार बेहद तंगी के दौर से गुजर रहा है. हालात इस कदर खराब हैं कि उनके पुरस्‍कारों की कोई देखभाल करने वाला भी नहीं है। उनके पद्म विभूषण  अवॉर्ड में दीमक लग गई है। ऐसा लगता है कि इतने कम वक्‍त में ही लोगों ने उन्‍हें भुला दिया है। खुद उनके बेटे नाजिम कहते हैं कि अब्‍बा के जाने के बाद सब कुछ बदल गया है। परिवार के आर्थिक हालात बेहद खराब हैं। घर का खर्च जैसे तैसे चल रहा है। उनके बेटे नाजिम कहते हैं, अब्बा के जाने के बाद सबकुछ बदल गया। अब हमें कोई नहीं पूछता। दादा को पद्म विभूषण अवॉर्ड मिला था, लेकिन आज उसकी कोई कीमत नहीं है। उसको दीमक खा चुका है। उनके कमरे में आज भी उनका जूता, छाता, टेलीफोन, कुर्सी, लैम्प, चम्मच-बर्तन रखे हैं। नाजिम ने कहा कि रेडियो में मान्यता प्राप्त होने के बावजूद 5 साल तक रेडियो में एक प्रोग्राम तक नहीं मिला।  
उस्ताद बिस्मिलाह खां के अवॉर्ड और उपलब्धियां :- 

  • संगीत नाटक अकादमी अवार्ड (1956)
  • पद्म श्री (1961)
  • ऑल इंडिया म्यूजिक कांफ्रेंस, अल्लाहाबाद में बेस्ट परफ़ॉर्मर का पुरस्कार (1930)
  • ऑल इंडिया म्यूजिक कांफ्रेंस में तीन मेडल्स, कलकत्ता (1937)
  • पद्म भुषण (1968)
  • पद्म विभूषण (1980)
  • संगीत नाटक अकादमी शिष्यवृत्ति (1994)
  • रिपब्लिक ऑफ़ ईरान द्वारा तलार मौसिकुई (1992)
  • Tansen Award by Govt. of Madhya Pradesh.
  • भारत रत्न (2001)
उस्ताद बिस्मिलाह खां के एलबम :-
  • सनादी अपन्ना – फिल्म में राजकुमार के किरदार के लिये शेहनाई बजाई थी।
  • गूँज उठी शेहनाई (1959) – राजेन्द्र कुमार के किरदार के लिये शेहनाई की धुन दी थी।
  • मेस्ट्रो चॉइस (फरवरी 1994)
  • मेघ मल्हार, वोल.4 (सितम्बर 1994)
  • क्वीन एलिज़ाबेथ हॉल में लाइव शो (सितम्बर 2000)
  • लन्दन में लाइव परफॉरमेंस, वोल.2 (सितम्बर 2000)

मुख्य संवाददाता
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