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दलित महिलाएं और पत्रकारिता

दलित साहित्य के विषय में सभी जानते हैं, दलितों का, दलितों के लिए दलितों द्वारा लिखा साहित्य. अब यह स्थापित साहित्य के समानान्तर माना जाने वाला सर्वमान्य साहित्य है. दलित साहित्य की आधार भूमि डॉ. भीमराव अम्बेडकर की विचारधारा है. पिछड़े दबे कुचलों की स्थिति को बताकर, उनकी समस्याओं का निदान और उनकी प्रगति परिवर्तन की दिशा में अग्रसर होने का संदेश ही दलित साहित्य का उद्देश्य है।

लेखन और प्रकाशन के क्षेत्र में दलित साहित्य अपनी विशेष स्थिति पा रहा है. देश की सभी भाषाओं में दलित साहित्य लिखा जा रहा है. अनुवाद-रूपान्तर के द्वारा अलग अलग भाषा के लोग एक दूसरे के साहित्य को पढ़कर समझ रहे हैं. पूरे देश में दलित साहित्यकारों की व्यथा, सम्पूर्ण दलित वर्ग की व्यथा के रूप में प्रचारित - प्रसारित हुई है और लगातार हो रही है.

साहित्य के विचार प्रचार का सबसे बड़ा माध्यम मीडिया है. मीडिया का अपना महत्त्व है. अभी तक मीडिया सवर्णों के हाथों में ही था. और अभी भी है. सवर्ण अपनी विचारधारा अपने ढंग से सशक्त रूप में, त्वरित रूप में फैलाते रहे हैं. यही कारण है कि देश और विदेशों में अभी भी दलितों की व्यथा को सही मूल्यांकन नहीं मिल पाया है. ‘सोने की चिड़िया’ कहलाने वाले अपने ही देश में, दलित सदियों से कितने कष्ट और अभाव का जीवन जी रहे हैं, यह सर्वविदित है. समाज में अभी तक उन्हें न तो समता सम्मान मिला, न ही भाईचारा मिल सका है. देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद भी, देश का लिखित संविधान लागू होने के बाद भी देश के दलितों की स्थिति में परिवर्तन नहीं हो सका. इसका मुख्य कारण है मीडिया पर सवर्णो का एकाधिकार होना. सवर्ण मीडिया हमेशा यही बताता रहा - ‘देश में कहीं कोई भेदभाव नहीं है, सब बराबर हैं और सब मिलजुल कर रहते हैं.’ गांधीजी ने अपने हरिजनपत्र के माध्यम से, शुरू से यही बताया था कि देश के अछूत हिन्दुओं से अलग नहीं हैं. वे सब प्रेम के साथ मिल जुलकर रहते हैं. जबकि स्थिति इसके विपरीत थी जिसे डॉ. भीमराव अम्बेडकर अच्छी तरह समझ सके थे. गांधीजी को मानने वाले गांधीवादी, ब्राम्हणवाद को मानने वाले मनुवादी और आर्यसमाजी छद्म बातों का प्रचार प्रसार करते रहे हैं और अभी भी कर रहे हैं।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने पत्रकारिता के माध्यम से ‘हरिजन’ पत्र के समानान्तर अपने समाचार पत्रों का प्रकाशन किया और अपनी बात सही रूप में देशवासियों तक पहुंचाई. उन्होंने मूकनायक, प्रबुद्ध भारत  जनता जैसे पत्रों को प्रकाशित किया था. अब बाबासाहेब को मानने वाले अम्बेडकरवादी विचारधारा का प्रचार प्रसार करके, उनके विचार और दलित शोषितों की स्थिति के सत्य रूप को समाज तक पहुंचा रहे हैं. दलित स्वयं अपनी व्यथा को कविता कहानी लेख नाटक उपन्यास और आत्मकथाओं के रूप में लिख रहे हैं और प्रकाशित कर रहे हैं, दलित पत्रिकाओं के माध्यम से उसे पूरे देशवासियों तक सभी भाषा-भाषियों तक पहुंचाया जा रहा है।

जो दलित मानव सदियों तक गूंगे बहरों की तरह चुपचाप शोषण अत्याचार सहते रहे, वे अब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के संघर्षपूर्ण प्रयत्नों से अधिकार पाकर अपनी व्यथा कह रहे हैं. वे पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अपनी दखल दे रहे हैं, मीडिया के माध्यम से अपनी आवाज समाज तक पहुंचा रहे हैं. पत्रकारिता में दलितों का प्रवेश विशेष सफलता पा रहा है. हिन्दी दलित पत्रकारिता के क्षेत्र में अनेक छोटी और बड़ी पत्रिकाएं लगातार छप रही हैं. अब स्थिति यह बन गई है कि सवर्ण पत्रकारिता द्वारा भी उनका स्वागत किया जा रहा है. केवल इतना ही नहीं बल्कि सवर्ण पत्रिकाओं के विशेषांक ‘दलित विशेषांक’ के रूप में प्रकाशित किये जा रहे हैं, जिनमें पूर्ण रूप में दलितों की रचनाओं को छापा जा रहा है. इन दलित विशेषांकों का अपना महत्त्व है. दलितों द्वारा प्रकाशित की जाने वाली छोटी बड़ी दलित पत्रिकाओं का भी अधिक महत्त्व है।  
सवर्णो द्वारा प्रकाशित की जाने वाली महत्त्वपूर्ण नारीवादी पत्रिकाओं में - ‘नारी संवाद’, सं. रेनू दीवान बिहार, युद्धरत आम आदमी, सम्पादक रमणिका गुप्ता, दिल्ली है. इन पत्रिकाओं ने विशेष रूप से महिलाओं और दलितों के प्रश्नों को आवाज दी है, उनकी समस्याओं को विश्लेषण के लिए समाज के समक्ष रखा है. ऐसी अनेक पत्रिकाएँ हैं, जो विशेष रूप से महिलाओं दलितों और आदिवासियों के साहित्य को छाप रही हैं, उन्हें जोड़ रही है और उनका समाज के साथ सीधा संवाद बना रही हैं।

दलित पत्रिकाओं में विशेष रूप से ‘अस्मितादर्श’ पत्रिका महत्त्वपूर्ण है. मराठी भाषा में छपने वाली महाराष्ट्र की इस पत्रिका ने अपना इतिहास रचा है. यह दलित पत्रिकाओं की प्रमुख और मार्गदर्शक पत्रिका है. ‘अस्मितादर्श’ पत्रिका के सम्पादक गंगाधर पानतावने हैं. पत्रिका औरंगाबाद से प्रकाशित होती है. इस पत्रिका के अनेक विशेषांक भी छपे हैं।

हिन्दी दलित पत्रिकाओं में बयानने अपनी एक विशेष जगह बनाई है. ‘बयान’ के सम्पादक मोहनदास नैमिशराय हैं. दिल्ली से प्रकाशित इस पत्रिका में, दलितों की समस्याओं के साथ समसामयिक प्रश्नों को अच्छे तरीके से उठाया जा रहा है. ऐसी ही विशेष पत्रिकाएँ हैं - ‘अम्बेडकर मिशन पत्रिका’, सम्पादक बुद्धशरण हंस, पटना. ‘अरावली उदघोष’ सम्पादक बी. पी. वर्मा, जयपुर राजस्थान. ‘मूकवक्ता’, सम्पादक सी. बी. राहुल दिल्ली, ‘आश्वस्त’, सं. तारा परमार उज्जैन मध्यप्रदेश, ‘आजीवक विजन’, सम्पादक शील बोधि, दिल्ली।

मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार, दिल्ली से प्रकाशित होने वाली अनेक दलित पत्रिकाएँ हैं. कुछ पत्रिकाओं ने अपनी विशेष पहचान बनाई है. किसी भी पत्रिका को अच्छे वैचारिक मुद्दों की जरूरत होती है. समसामयिक और ज्वलन्त प्रश्नों को उठाना समय की मांग है. आवश्यक मुद्दों और ज्वलन्त प्रश्नों पर लिखी रचनाओं को महत्त्व देकर प्रकाशित करना प्रगतिवादी विचारधारा का प्रतीक है. इसके साथ उन पत्रिकाओं को महत्त्वपूर्ण माना जाता है, जिनमें स्त्रियों और अल्पसंख्यकों को स्थान प्राप्त हो।
    
दलित विमर्शऔर स्त्री विमर्शअब सीमित क्षेत्र का विषय नहीं है. अब इन विषयों पर विश्वस्तर पर चर्चा हो रही है. दलित पत्रिका इसमें बराबर की हिस्सेदारी निभा रही हैं. इस दृष्टि से ‘अपेक्षा’ पत्रिका ने विशेष मुकाम हासिल किया है. इस पत्रिका ने दलित लेखिकाओं को भी जोड़ा है. लेकिन यह भी सत्य है कि दलित लेखिकाएँ अधिक संख्या में आगे नहीं आ सकीं. अभी भी उनकी संख्या कम है. ‘लेखन में दलित महिलाएँ’ किस मुकाम तक पहुंची है, इसे पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके लेखन से समझा जा सकता है.

दलित साहित्य की संवाहक अपेक्षा’ पत्रिका का सन 2003 में ‘दलित आत्मवृत विशेषांक’ प्रकाशित हुआ था. इस विशेषांक के ‘दलित स्त्री चिन्तन’ खण्ड में डॉ. विमल थोरात’, माधुरी छेड़ा और तारा परमार ने दलित महिलाओं की आत्मकथाओं पर समीक्षात्मक विचार लिखे. इन्होंने महिलाओं की मराठी दलित आत्मकथाओं पर ही चर्चा की थी. डॉ. नगमा मलिक ने बेबी कामड़े की मराठी आत्मकथा ‘जीना आमुचा’ अर्थात् ‘जीवन हमारा’ की समीक्षा लिखी. डॉ. प्रेमलता चुटेेल ने कौशल्या बेसन्त्री की आत्मकथा ‘दोहरा अभिशाप’ की समीक्षा लिखी. प्रज्ञा शुक्ल, रजनी बजारिया, सुमित्रा अग्रवाल और मुन्नी चैधरी ने दलित जीवन का मूल्यांकन करते हुए, अपने विचार रखे थे. इस अंक में हिन्दी दलित लेखिकाओं की संख्या कम है।

सवाल यह है कि हिन्दी दलित लेखिकाओं की संख्या कम क्यों है ? इसका पहला और मुख्य कारण यह है कि हमारी महिलाएं लेखन के क्षेत्र में पीछे हैं. दूसरा कारण यह है कि उन्हें प्रेरणा और प्रोत्साहन नहीं मिल पाता है. तीसरा कारण है सहयोग की कमी. यदि उन्हें सहयोग के साथ प्रेरणा और प्रोत्साहन दिया जाये, तो हमारी लेखिकाएँ अधिक संख्या में आगे आयेगीं. यदि घर परिवार से उन्हें सहयोग और प्रेरणा प्रोत्साहन नहीं मिल पाता है, तो ऐसी साहित्यिक सामाजिक संस्थाएँ बनाई जायें, जो दलित स्त्रियों को लेखन और प्रकाशन के क्षेत्र में आने आगे के लिए प्रोत्साहित करें. ऐसा होने पर, यह विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि दलित महिलाएँ पुरूषों की अपेक्षा अधिक संख्या में आगे आयेंगी और लेखन प्रकाशन के क्षेत्र में अपना कीर्तिमान स्थापित करेंगी।

कई बार ऐसा होता है, दलित लेखिकाओं से रचनाएँ आमंत्रित की जाती हैं, मगर वे समय पर अपनी रचनाएँ भेज नहीं पाती हैं. जब रचनाएँ भेजी ही नहीं, तो छपेंगी कैसे ? भले ही लेखिका ने बहुत लिखा है मगर प्रकाशित नहीं किया, तब लोग कैसे जानेंगे कि लेखिका ने क्या कैसा और कितना लिखा है ? हमारी दलित लेखिकाएँ घर परिवार के काम और जिम्मेदारियों के बोझ से लदी होने के कारण, अपने लेखन और प्रकाशन को समझ नहीं पाती हैं. उसका महत्त्व समझने के लिए उनके पास समय ही नहीं होता है. वे यह भी नहीं जानती हैं कि लेखन के साथ प्रकाशन को ज्यादा महत्त्व होता है. इस अज्ञानता के कारण वे अपनी रचनाएं ठीक करके पत्रिकाओं में प्रकाशन हेतु नहीं भेजती हैं. मैं इन बातों को अच्छी तरह जानती हूँ, क्योंकि मैं स्वयं इसकी शिकार रही हूँ।

अप्रैल - जून 2007 में अपेक्षाका अम्बेडकरवादी कहानी विशेषांक प्रकाशित हुआ था. इस विशेषांक में अनेक पुरूष दलित साहित्यकारों की कहानियाँ छपी थीं. दलित लेखिकाओं में रजनी दिसोदिया की कहानी - ‘‘एक गैर साहित्यिक डायरी’, अनीता भारती की ‘एक थी कोटेवाली’, रजतरानी मीनू की ‘वे दिन’ और सुशीला टाकभौरे की ‘रामकली’ कहानी छपी थी. इस अंक में बाबीस कहानीकारों में सिर्फ चार दलित लेखिकाओं की कहानी छपी. कारण स्पष्ट है, दलित साहित्यकारों में लेखिकाओं की संख्या कम है, साथ ही उनका लेखन भी कम है. ‘अपेक्षा’ पत्रिका नियमित रूप से त्रैमासिक रूप में छप रही है. सामान्य अंकों में इक्का दुक्का दलित लेखिकाएँ छप रही हैं. विशेषांकों में छपे दलित लेखन में दलित स्त्रियों की स्थिति को समग्र रूप में देखा और समझा जा सकता है.

जनवरी - मार्च 2008 में अपेक्षा पत्रिका का विशेषांक ‘दलित स्त्री चिन्तन’ पर केन्द्रित था. इस अंक के लिए दिल्ली की अनीता भारती ने विशेष सहयोग दिया. उन्होंने विशेष रूप से दलित लेखिकाओं से सम्पर्क करके, उन्हें प्रोत्साहित करते हुए उनसे आत्मकथांश लिखवाये थे. जिसका परिणाम यह हुआ कि अपेक्षा के इस अंक में इक्कीस दलित लेखिकाओं के आत्मकथांश छपे. उनके नाम-बेबीताई कामले, रमा पांचाल, सुशीला टाकभौरे, रजनी तिलक, उर्मिला पवार, पी. शिवकामी, रजनी दिशोदिया, अनीता भारती, रजतरानी मीनू, हेमलता महिश्वर, पुष्पा विवेक, रानी नाथ, उपासना गौतम, तबस्सुम, थेसोक्रोपी, सम्पत देवी पाल, ज्योत्सना, निर्मला रानी गीता सिंह, और स्मिता पाटिल हैं. इसके साथ विशेषांक के ‘साहित्य दृष्टि खण्ड’ में कुसुम मेघवाल, उत्तिमा केशरी और आभालता चैधरी के लेख छपे.

अपेक्षाके इस विशेषांक को दलित लेखिकाओं के लेखन के परिचय का अंक माना गया. तब दलित लेखन के क्षेत्र में यह जोरदार चर्चा चली थी - ‘क्या इतनी बड़ी संख्या में दलित लेखिकाएँ दलित साहित्य लिख रही हैं ?’ लेखिकाओं के लिए यह गौरव की बात है. यह गौरव उन्हें ‘अपेक्षा’ पत्रिका के सम्पादक डॉ. तेजसिंह ने दिया. इससे यह भी स्पष्ट है कि दलित लेखिकाओं को यदि सहयोग और प्रेरणा प्रोत्साहन दिया जाये, तो वे जरूर लेखन प्रकाशन में अपना कीर्तिमान स्थापित कर सकती हैं. जनवरी मार्च 2008 ‘अपेक्षा’ के विशेषांक में इतनी बड़ी संख्या में दलित लेखिकाओं के परिचय और लेखन प्रकाशन के बाद भी, कम लेखिकाएं ही चर्चा में हैं. लेखन - प्रकाशन लगातार होने पर ही वे सभी चर्चा में आ सकेंगी।

 

पत्रकारिता के क्षेत्र में हंसजन चेतना की मासिक पत्रिका का अपना महत्त्व है. यह प्रतिष्ठित पत्रिका इन्टरनेट पर भी पढी जाती है. हिन्दी साहित्यकार प्रेमचन्द द्वारा स्थापित और वर्तमान में राजेन्द्र यादव द्वारा संपादित यह पत्रिका सवर्णो के साथ, बहुजनों और दलितों के सरोकार से जुड़ी पत्रिका  बन गई है. दिल्ली से प्रकाशित यह पत्रिका बौद्धिकता और वैचारिकता के साथ कहानी आन्दोलन के कई आयामों को रेखांकित करती हुई आगे बढ़ रही है. समीक्षा और आलोचना में भी यह दखल रखती है।

हंसका दलित विशेषांक अगस्त 2004 में ‘सत्ता विमर्श और दलित’ प्रकाशित हुआ. इस विशेषांक में ‘स्वानुभूति खण्ड’ में बारह दलित साहित्यकारों ने आत्मकथांश दिये थे, जिनमें सिर्फ दलित लेखिका किरणदेवी भारती का नाम है. ‘वैचारिकी खण्ड’ में भी सभी दलित पुरूष साहित्यकार हैं. ‘कहानी खण्ड’ में इक्कीस कहानीकारों में दलित लेखिकाएँ कंचन लता, अनीता रश्मि, रजत रानी मीनू, ऊषा चन्द्रा, सरिता भारत - सिर्फ पांच के नाम हैं. ‘कविता खण्ड’ में भी दलित कवयित्रियों की कविताएँ नहीं है।

हंसके इस दलित विशेषांक का अतिथि सम्पादन डॉ. श्योराज सिंह बेचैन ने किया था. इस अंक में दलित लेखिकाओं को प्रोत्साहन के साथ अधिक संख्या में छापना, उनकी जिम्मेदारी माना जा सकता है. यद्यपि यह भी जरूरी है कि दलित लेखिकाएं स्वयं आगे आकर लेखन और प्रकाशन में अपना नाम दर्ज करायें।

सवर्ण बहुजन द्वारा चलाई जाने वाली पत्रिकाओं में दलितों की भी हिस्सेदारी हो. यह पत्रिका में आरक्षण मांगने की बात नहीं है, बल्कि उत्तम रचना के साथ दलित साहित्यकारों को पत्रिका में उचित स्थान मिले, इसके लिए सम्पादकों और साहित्यकारों दोनों ने ही जिम्मेदारी उठाना चाहिए।

पत्रिका प्रकाशन के क्षेत्र में अन्यथात्रैमासिक पत्रिका लुधियाना से छपने वाली बहुत ही सुन्दर और गरिमापूर्ण पत्रिका है. इसके सम्पादक कृष्ण किशोर जी हैं. ‘अन्यथा’ पत्रिका ने भी दलित बहुजन पिछड़े वर्ग के लिए अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है. जुलाई-सितम्बर 2007 का अंक क्रमांक 10 में, विशेष रूप से ‘बनती मिटती जलती बुझती झोपड़पट्टियां’ पर विशेषांक केन्द्रित किया गया था. इस अंक में शोषित दलित जीवन से जुड़े प्रश्नो और समस्याओं पर जनवादी दृष्टिकोण से विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है।

इसके बाद अन्यथाके अक्टूबर-नवम्बर 2007 के अंक 13 को ‘हमारी कहानी संदर्भ और संभावना’ पर विशेष केन्द्रित किया है. यह अंक बहुत ही व्यवस्थित रूप में प्रकाशित हुआ है. कहानी विधा पर सवर्ण साहित्यकारों के साथ दलित साहित्यकारों के विचारों को प्रकाशित किया है. इस अंक में अनीता भारती द्वारा आयोजित दलित कहानी पर चर्चा में ओमप्रकाश वाल्मीकि, अजय नावरिया, रूपनारायण सोनकर, राज वाल्मीकि, पूरन सिंह, सुशीला टाकभौरे, टेकचन्द, उमरावसिंह जाटव, रजतरानी मीनू और सुमित्रा महरोल सहभागी हुए हैं।

इस अंक में हिन्दी दलित लेखिकाओं में कौशल्या बेसन्त्री, सुशीला टाकभौरे, और सुमित्रा महरोल के आत्मकथांश हैं. रजतरानी ‘मीनू’ का साक्षात्कार छपा है. रजनी तिलक, कुसुम मेघवाल, अनीता भारती और सुमित्रा महरोल की कहानी छपी है. विनोदिनी की तेलगू कहानी का अनुवाद है. हेमलता महिश्वर का लेख छपा है. इसके साथ मराठी दलित कविता में प्रज्ञा दया पवार, मल्लिका अमर शेख, ज्योति लांजेवार, प्रतिभा अहिरे, और हीरा बनसोड़े की कविताएं हैं. ये कवयित्रियाँ मराठी भाषी हैं।

अन्यथाके इस अंक में - अश्वेत गुलाम महिलाओं की संघर्ष कथा’ खण्ड में हृदय को हिला देने वाले आत्मकथांश और उपन्यास अंश छापे गये हैं. आत्मकथांश - हैरियट जेक्बस, मैरी जैकसन के हैं. उपन्यास अंश - हैरियट बाचर, स्टोव, जोरानील हस्र्टन ओईडा सैबेस्बियन के हैं.

सोजोर्नर टूथ के प्रसिद्ध भाषण का अंश - ‘‘मैं पूछती हूँ क्या मैं औरत नही हूँ’’ - का अनुवाद कृष्ण किशोर जी ने किया है. इजाबैला बोमफ्री का सोजोर्नर टूथ छपा है. अनुवाद भवजोत ने किया है. अनेक कविताएँ भी अनुवाद करके छपी हैं.

इस अंक का महत्त्व इसलिए अधिक है कि इसमें हिन्दी, मराठी, तामिल और अश्वेत महिलाओं के मार्मिक आत्मकथांश हैं. दलित लेखन में शुरू से ही, मराठी दलित साहित्य में दलित लेखिकाओं की संख्या बहुत ज्यादा है. इसका कारण है, सर्वप्रथम महारष्ट्र में अम्बेडकरवादी दलित आन्दोलन का प्रारम्भ हुआ. यहाँ की दलित महिलाएँ भी दलित आन्दोलन से जुड़ी. महिला जागृति के साथ वे लेखन से भी जुड़ गई. साथ ही, मराठी दलित साहित्य बीसवीं शताब्दी के छठवें दशक में मराठी भाषा में प्रकाशित होने लगा था, जबकि यह हिन्दी में आठवे दसक में आया. परिणाम स्वरूप मराठी दलित साहित्य में मराठी दलित लेखिकाएँ अधिक संख्या में जुड़ गईं. मराठी पत्रिकाओं के माध्यम से मराठी दलित साहित्य का प्रचार प्रसार अधिक हुआ।




बायजापूना से प्रकाशित होने वाली, महिलाओं के प्रश्नों और समस्याओं पर केन्द्रित पत्रिका है. इससे सवर्ण महिलाओं के ‘महिला मुक्ति आन्दोलन’ और महर्षि कर्वे की नारी मुक्ति की विचारधारा का प्रचार प्रसार अधिक होता रहा है. दलित महिलाओं के ‘सेमिनार’ या ‘विचार गोष्ठी’ पर केन्द्रित अंकों में, दलित महिलाओं की समस्याओं की बात पत्रिका में छपती रही है।

सुगावामराठी पत्रिका है. 1998 में ‘सुगावा’ का ‘डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर प्रेरणा विशेषांक’ प्रकाशित हुआ था. इसका अतिथि सम्पादन विलास वाघ ने किया था. इस विशेषांक में अनेक प्रसिद्ध मराठी दलित लेखिकाओं के विचारात्मक लेख छपे थे. उनके नाम हैं - कुमुद पावड़े, डॉ. आशा थोरात, उर्मिला पवार, डॉ. तारा भावाळकर, ज्योति लांजेवार, मंगला कुलकर्णी, रजनी ठाकुर, कल्पना ढावरे, माया बोरसे, प्राध्यापक डॉ. माधवी खरात, डॉ. पदमा वेलासकर, सौ निर्मला विलास, प्राध्यापक अर्चना हातेकर, अनुपमा, मंगला वराळे, एड. शीला हिरेकर, प्रा. सुलभा पाटोळे, डॉ. सरिता जांभुळे, मीनाक्षी मून, अलका कोकणे, कुसुमताई गागुर्डे, स्नेहलता कसबे, डॉ. प्रमिला लीला सम्पत, नलनी लढ़के - इन सभी लेखिकाओं ने अपने वैचारिक लेख 1998 में लिखे थे. उनका लेखन प्रगतिशील और परिवर्तनवादी था. डॉ. भीमराव अम्बेडकर के सामाजिक आन्दोलन से जुड़कर, ‘दलित और महिला आन्दोलन’ में सक्रिय रूप में भाग लेकर, मराठी दलित लेखिकाओं ने वैचारिक परिपक्वता पाई है. दलित साहित्य लेखन में उनके अग्रसर होने का कारण महाराष्ट्र में डॉ. अम्बेडकर के आन्दोलन का विशेष प्रभाव है।
    
उत्तर भारत में, लेखन में यह प्रभाव 1980 के समय आया. मराठी दलित साहित्य से प्रभावित होकर अनेक हिन्दी दलित लेखकों ने अपनी रचनाएँ और पुस्तकें प्रकाशित कीं. मगर इनमें लेखिकाओं की संख्या कम ही रही. इसके कारणों को खोजकर, उनके निदान की आवश्यकता है. तभी दलित लेखिकाओं के लेखन और प्रकाशन को बढ़ाया जा सकेगा.

दलित लेखिकाओं की संख्या आज भले ही कम है, लेकिन उनके लेखन का आधार विरोध, आक्रोश और विद्रोह है. वे सदियों से चली आ रही हिन्दूवादी नारी शोषण की परम्पराओं को तोड़ने की बाते कह रही हैं. दलित लेखिकाएँ अपनी अस्मिता, और अस्तित्व की बात अपने लेखन के माध्यम से कर रही हैं. वे जातिभेद के कारण होने वाले अन्याय अत्याचार के विरोध की बात भी कह रही हैं. वे नारी शोषण, दलित शोषण के विरूद्ध अपने विचार रखते हुए, दलित मानस में मनोबल का निर्माण करने का काम कर रही हैं.

दलित लेखन मात्र लेखन नहीं, बल्कि दलित आन्दोलन का साधन है. इस साधन का उपयोग दलित लेखिकाएँ भी समाज व्यवस्था में परिवर्तन के लिए कर रही हैं. दलित महिलाओं के अपने संगठन हैं. समय समय पर महिलाओं के सम्मेलन सेमिनार शिविर और विचार गोष्ठियाँ होते हैं, जिनमें दलित महिलाओं की वर्तमान स्थिति और भविष्य की प्रगति पर चर्चा करके सुझाव और प्रस्ताव रखे जाते हैं. महिला संगठनों के ऐसे कार्यक्रमों से जुड़कर, दलित लेखिकाएं दलित आन्दोलन का उद्देश्य और अपने लेखन का लक्ष्य समझ रही हैं. इस तरह उनका लेखन उद्देश्यनिष्ठ बन गया है।


दलित लेखिकाएँ और कार्यकर्ता महिलाएँ संगठित होकर अपने उद्देश्य की ओर लगातार बढ़ रही हैं. वे अपने साथ अधिक से अधिक महिलाओं को जोड़ रही हैं. इस क्षेत्र में ‘कदम’ और ‘नेक्डोर’ जैसी एन. जी. ओ. के माध्यम से यह काम प्रयत्नपूर्वक किया जा रहा है. दलित महिलाओं के लेखन और प्रकाशन में वृद्धि हो रही है. भाषान्तर के द्वारा भी अलग भाषा भाषी लेखिकाओं का परिचय बढ़ रहा है।

लेखन प्रकाशन के साथ प्रचार माध्यमों से जुड़ना दलित लेखिकाओं के लिए आवश्यक है. इसलिए यह जरूरी है कि दलित लेखिकाएँ पत्रिकाओं से जुड़कर, लेखन प्रकाशन का प्रचार प्रसार करें. महिलाओं की अपनी पत्रिकाएँ हों, जिनके माध्यम से वे अपनी समस्याओं और सवालों को राष्ट्रीय स्तर पर और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उठायें. तभी उनका लेखन और ‘महिला जागृति आन्दोलन’ पूर्णता के साथ सफलता पा सकेगा।
लेखिका- सुशीला टाकभौरे   चर्चित लेखिका. दो उपन्यास. तीन कहानी संग्रह , तीन कविता संग्रह सहित व्यंग्य,नाटक, आलोचना की किताबें प्रकाशित. संपर्क :9422548822साभार:- स्त्रीकाल.कॉम 
 

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