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केरल में दलित भी पुजारी: ब्राहम्णवाद की पुनर्स्थापना का षड़यंत्र

केरल में दलित कार्यकर्ताओं और पुजारी बनाए गए दलितों पर प्राणघातक हमलों की खबरें अब आम हो गई हैं। हाल ही में घटित ताजा घटना में एक दलित पुजारी पर चाकू से प्राणघातक हमला किया गया है।  केरल के पलक्कड़ में एक दलित पुजारी बीजू नारायणन पर कुछ अज्ञात लोगों ने चाकू से जानलेवा हमला कर दिया जिसमें पुजारी बुरी तरह से घायल हो गया। ये दलित पुजारी पटेललंबी का रहना वाला बताया गया है। बताया जा रहा है कि बिजू नारायणन त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड से वेदों का अध्ययन करने वाले दलित समुदाय के पहले व्यक्ति हैं।  यानी कि वो जाति से तो दलित और व्यवहार से केवल और केवल ब्राहम्णवादी ही हैं। यहाँ कहना अतिश्योक्ति न होगा कि उन्होंने वेदों का अध्ययन तो किया किंतु ब्राहमणवाद की हकीकत को जानने का कोई प्रयास नहीं किया। यहाँ सवाल उठता है कि बिजू नारायणन को दलित कैसे माना जाए। यूं तो केरल में आए दिन दलितों पर हमले और उनकी हत्या करने के मामले सामने आते रहे हैं। 

हाल ही में कन्नूर जिले में मट्टन्नुर के समीप मंगलवार को नेल्लुनी में माकपा कार्यकर्ताओं के हमले में आरएसएस का एक कार्यकर्ता गंभीर रूप से घायल हो गया था। इस घटना के बाद क्षेत्र में तनाव फैल गया था। किंतु अफसोस जब एक दलित पुजारी पर जान लेवा हमला किया गया तो इसका किसी भी स्तर पर कोई प्रतिरोध नहीं हुआ। होता भी कैसे जो लोग अपने ही घर वालों के विरोध में काम करते हैं, उनका समर्थक हो भी कौन सकता है। मैं समझता हूँ कि केरल में दलित पुजारियों की नियुक्ति जातिगत भेदभाव के खिलाफ पक्की जीत नहीं बन सकती। माना कि केरल सरकार द्वारा संचालित मंदिरों में आरक्षण के आधार पर पुजारियों की भर्ती एक बड़ी लड़ाई की अहम शुरुआत है। किंतु सामाजिक आधार पर एक दलितों से साथ यह किसी साजिश का हिस्सा ही लगता है। 

'द इंडियन एक्सप्रेस' की संपादकीय टिप्पणी के अनुसार हाल ही में त्रावणकोर देवास्वोम भर्ती बोर्ड (टीडीआरबी) ने 36 गैर-ब्राह्मणों को पुजारी के पद पर चुना है। केरल में यह अपनी तरह का पहला उदाहरण है और यह इस मायने में भी खास है कि इन 36 लोगों में छह दलित समुदाय से आते हैं। केरल के ही नहीं देश के सभी धार्मिक स्थलों पर जातिगत पूर्वाग्रह-दुराग्रह का लंबा इतिहास रहा है और इसके खिलाफ लम्बा संघर्ष भी चला है। हालांकि राज्य में गैर-ब्राह्मण भी पुजारी बनते रहे हैं लेकिन इनमें से ज्यादातर को छोटे-मोटे मठ-मंदिरों या निजी धार्मिक स्थलों में पूजा-पाठ की जिम्मेदारी ही मिलती है। पैसा कमाने वाले मन्दिरों में नहीं। सुना है कि टीडीआरबी पुजारियों की भर्ती के लिए परीक्षा आयोजित करता है। इसमें सभी जाति के लोग हिस्सा ले सकते हैं, लेकिन यह पहली बार है जब भर्ती में जातिगत आरक्षण लागू किया गया है।

ज्ञात हो कि केरल में मौजूद देवास्वोम बोर्ड सरकार द्वारा संचालित मंदिरों का प्रबंधन संभालते हैं। ये पहले भी गैर-ब्राह्मणों को पुजारी नियुक्त करते रहे हैं, लेकिन इनकी भर्ती में तब जातिगत आरक्षण लागू नहीं था। यह एक तरह की अनियमितता ही थी, क्योंकि इन बोर्डों का खर्चा सरकारी खजाने से पूरा होता है। सरकारी वित्त से चलने वाले सभी क्षेत्रों में आरक्षण लागू है तो मंदिर के पुजारियों की नियुक्ति में भी यह व्यवस्था लागू होनी ही चाहिए, यह मसला अलग-अलग मंचों से बार-बार केरल में उठता रहा है। यद्यपि यह माँग जाति-प्रथा के उन्मूलन की दिशा में नहीं मानी जा सकती, तथापि ब्राहम्णवाद को जिन्दा रखने की एक सोची-समझी कवायद ही मानी जाएगी। उल्लिखित है कि केरल में ऐसी नियुक्तियों के बाद भी जातिवाद के खिलाफ लड़ाई खत्म नहीं हुई है। केरल के बड़े और ज्यादा प्रतिष्ठित मंदिरों जैसे सबरीमाला में अपनी कुछ परंपराएं और लिखित मान्यताएं हैं जिनके तहत गैर-ब्राह्मण यहां पूजा-पाठ के काम में हिस्सा नहीं ले सकते, तो अब बड़ी लड़ाई यही है कि नव-नियुक्त पुजारियों को ऐसे मंदिरों में भी काम करने का मौका मिल भी जाये तो क्या जाति-वाद का खात्मा हो जाएगा?

दूसरी चुनौती यह भी है कि पूजा-पाठ की परंपराओं में जातिगत दुराग्रह तोड़ने के मामले में सरकार के निर्देश या कानूनी प्रावधान हमेशा कारगर नहीं होते। केरल का अपना इतिहास भी कुछ ऐसा ही इशारा करता है। यहां मनुस्मृति और दूसरी पुरानी मान्यताओं के हवाले से हिंदू समाज में मौजूद इस भेदभाव को खत्म करने के लिए जन-आंदोलनों ने अहम भूमिका निभाई है। निचली जातियों को मंदिरों में प्रवेश का अधिकार दिलाने के लिए यहां 1924 में वाइकोम सत्याग्रह और 1931-32 में गुरुवायूर सत्याग्रह जैसे प्रभावशाली आंदोलन चले थे। लेकिन उस समय यह ब्राहम्णवाद के खिलाफ एक सांकेतिक आन्दोलन था। मन्दिरों में प्रवेश करना नहीं था।

किंतु मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि आज का दलित और दमित समाज मन्दिर में प्रवेश करने और पूजा करने की मांग कतई नहीं करता, अब तो केवल ब्राह्मणवादी ताकतें गरीब और निरीह लोगों को जानबूझ कर मन्दिरों तक ले जाना चाहते हैं। कारण है कि देश का अधिकतर दलित और दमित बाबा साहेब अम्बेडर का अनुयायी है और किसी प्रकार की भी हिन्दुवादी सोच से निजात पाना चाहता है। विदित है कि आज केरल में वामपंथियों/ मार्क्सवादियों की सरकार है। यह भी कि आज मार्क्स और अम्बेडर की विचारधारा को भारतीय परिप्रेक्ष्य में प्रतियोगी माना जा रहा है। मार्क्सवादियों को भारतीय दलितों का अम्बेडवादी होना खलने लगा है। जबकि अम्बेडकरवादियों कि सोच है कि आज की तारीख में यदि मार्क्सवाद और अम्बेडकरवाद एक साथ खड़े हो जाता है तो सामाजिक न्याय की दिशा में नए आयाम खड़े हो जाएंगे। किंतु केरल में दलितों को पुजारी बनाने की मुहिम ये सिद्ध करती है कि केरल के दलितों को अम्बेडरवादी सोच से अलग-थलग करना है। केरल सरकार की इस पहल से तो यही लगता है कि भारत में जाति प्रथा बरकरार रहे और मार्क्सवादी मजदूर क्रान्ति के नाम पर अपनी रोटियां सेकते रहें। भुलावा ये दिया जा रहा है मन्दिरों को सभी जातियों के लिए खोल दिया गया है।... किंतु मुझे तो ये एक छलावे के अलावा और कुछ नहीं लगता। दरअसल केरल सरकार का मत है कि यदि किसी दलित को मन्दिर में पुजारी बना दिया जाए तो दलितों का एक बड़ा वर्ग मन्दिरों में आना–जाना शुरु कर देगा और इस प्रकार डा. अम्बेडकर का बुद्ध धम्म को अपनाने का विषय ठंडा ही नहीं, दूर की कौड़ी हो जाएगा।.... मार्क्सवाद को और देर तक जिन्दा रहने का मौंका मिल जाएगा।

‘द हिंदू’ के तिरुवनंतपुरम के सीनियर एसोसिएट एडिटर सी. जी. गौरीदासन कहते हैं, "सामाजिक रूप से इससे विवाद होना तय है। राजनीतिक रूप से भी, क्योंकि तथ्य यह है कि बीजेपी निम्न और मध्यम समुदायों के बीच अपनी पहचान बनाने की कोशिश में लगी है।" हो न हो केरल की सीपीएम सरकार का एक राजनीतिक पैंतरा है। वह इसलिए कि आरएसएस वहां हिंदुओं को एकजुट करने की कोशिश में जुटी है। जाहिर है कि सीपीएम निश्चित रूप से दलित और पिछड़े समुदाय के बीच अपनी जगह बनाने की कोशिश करेगी ही।
 
लेखक:  तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), दो निबन्ध संग्रह  और अन्य। तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।


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