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गुजरात- पहले जाति पूछी... जब पता चला दलित है... तो थाने में मौजूद सभी पुलिसवालों के चटवाए जूते

गुजरात से एक ऐसी घटना सामने आई है जिससे ये पता चलता है कि सवर्ण समाज में जातिवादी मानसिकता की गंदगी किस गहराई तक जमी हई है। और अगर उसमें सत्ता का नशा मिल जाए तो वो गंदी मानसिकता अमानवीयता की सारी हदें पार कर जाती है। 

अहमदाबाद के अमराईवाड़ी थाने में कुछ ऐसा ही मामला सामने आया है जिसमें एक बड़े पुलिस अफसर ने हिरासत में लिए गए एक व्यक्ति से उसकी जाति पूछी और जब उन्हें पता चला कि वो दलित है तो उससे थाने में मौजूद सभी 15 पुलिस वालों के जूते चटवाए गए। हर्षद जाधव नाम के पीड़ित व्यक्ति ने मामले की एफआईआर दर्ज करवाई है, पुलिस ने उस आरोपी कांस्टेबल का नाम तो लिख लिया है जिसने बेवजह पीड़ित को पूरे मामले में फंसाया लेकिन डीसीपी हिमकार सिंह का नाम तक नहीं लिखा है जिनके इशारे पर ये शर्मनाक घटना हुई।  

साईंबाबा नगर सोसायटी के रहने वाले हर्षद जाधव, टेलिविजन मैकेनिक हैं। हर्षद ने अपनी शिकायत में कहा है कि साईंबाबा मंदिर के नजदीक मैंने अपने घर के पास 29 दिसंबर को शोर सुना, तो बाहर निकला और देखा कि एक भीड़ हंगामा कर रही थी। मैंने अपने पास खड़े एक व्यक्ति से पूछा कि क्या हुआ है, तो उस व्यक्ति ने मुझे थप्पड़ मार दिया। मैंने भी उसे धक्का दे दिया, इस पर उस व्यक्ति ने डंडे से मेरे सिर पर वार कर दिया, जिससे बचने में मेरी उंगली में चोट आई।”

जाधव का कहना है कि उस व्यक्ति ने खुद को पुलिस वाला बताया। इस हंगामे को सुनकर उनकी पत्नी जब बाहर आईं तो उन्हें भी पीटा गया, और फिर उन्हें पकड़कर अमराईवाड़ी थाने ले जाया गया। जाधव का कहना है कि उनके साथ उनके परिवार के तीन सदस्यों को पुलिस स्टेशन पर लाया गया और जाधव को कॉन्स्टेबल पर हमले के आरोप में हवालात में बंद कर दिया गया। उन पर पुलिस कांस्टेबल पर हमले का आरोप लगाया गया।

जाधव की शिकायत के मुताबिक कुछ घंटे बाद दोपहर के वक्त डीसीपी हिमकार सिंह थाने पहुंचे और उन्हें हवालात से निकाला गया। डीसीपी हिमकार सिंह ने उन्हें पीटते हुए कहा कि तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई एक पुलिस वाले पर हाथ उठाने की। जाधव ने आरोप लगाया है कि इसके बाद डीसीपी ने उनसे उनकी जाति पूछी। जब उन्होंने अपनी जाति दलित बताई तो उन्हें और पीटा गया और कहा गया कि कांस्टेबल विनोद बाबू भाई के पैर छूकर माफी मांगो जब वो ऐसा करने लगे तो उनसे विनोद भाई और थाने में मौजूद सभी 15 पुलिस वालों के जूते चाटने को कहा गया।

और जब हर्षद ऐसा करने से मना कर दिया तो उनसे जबरन जूते चटवाए गए। और इसके बाद जाधव को दोबारा हवालात में डाल दिया गया। यही नहीं उन्हें धमकी दी गई कि इस घटना के बारे में जज के के सामने कुछ नहीं बोलना वरना इससे भी बुरा हाल करेंगे। और तुम्हारे साथ-साथ तुम्हारे परिवार का भी सबक सीखा देंगे। जाधव ने अपनी शिकायत में कहा है कि धमकी से डरकर उन्होंने जज के सामने कुछ भी नहीं बताया। जाधव का कहना है कि पुलिस प्रताड़ना की वजह से उनकी पत्नी को भी अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा है।

आपको बता दें कि हर्षद जाधब इंग्लिश लिटरेचर में ग्रेजुएट है और उनका कहना है कि कि इस घटना के बाद से अपने आप पर शर्म आने लगी और उनका मन आत्महत्या करने का करने लगा। शाम के वक्त उन्हें एक जज के सामने पेश किया गया लेकिन उन्हें धमकी दी गई थी कि जज के सामने कुछ न कहें। जज ने उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया।

शाम को उन्होंने यह बात अपने पिता को बताई, तो जाधव के पिता ने बिरादरी के दूसरे लोगों को इस बारे में बताया। इस पर दलित समुदाय के लोगों ने अमराईवाड़ी थाने का घेराव किया और इस मामले में एफआईआर दर्ज करने की मांग की। घेराव से परेशान होकर पुलिस ने उनसे लिखित शिकायत ली और मामला दर्ज किया।

इस घटना के बारे में गुजरात दलित संगठन के संयोजक अशोक सम्राट का कहना है कि पुलिस ने एफआईआर में सिर्फ कांस्टेबल विनोद का नाम लिखा गया है जबकि डीसीपी हिमकार सिंह का नहीं, जिनके आदेश पर यह शर्मनाक घटना हुई। उन्होंने बताया कि इस मामले में अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर ए के सिंह से मुलाकात कर इसकी जांच कराने की मांग की गई है।  

कांस्टेबल के खिलाफ अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निरोधक कानून के तहत केस दर्ज कर मामला अपराध शाखा को सौंप दिया गया है, हालांकि अभी तक उसकी गिरफ्तारी नहीं हुई है। कुछ लोगों के थानों के घेराव करने के बाद जाधव ने एफआईआर दर्ज करवाई। डीसीपी हिमकार सिंह सभी आरोपों को खारिज कर रहे हैं।
(photo courtesy-TOI)

मुख्य संवाददाता
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