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पीएम मोदी के ‘गुजरात’ में दलित किसान ख़ुदकुशी करने पर मज़बूर...

गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी भले ही अपने राज में सबका साथ, सबका विकास का लाख दावा करें, लेकिन हकिकत में धरातल पर ऐसा कुछ दिखता नहीं है। राज्य सरकार के आदेशों का पालन नहीं हो रहा है। जिसका ताजा उदाहरण पाटन जिले की एक किसान के ख़ुदकुशी करने घटना हमारे सामने है। यहां अनुसूचित जाति समाज के लोगों को सरकारी योजना के तहत आवंटित की गई जमीन पर कब्जा न मिलने से परेशान होकर एक बुजुर्ग ने जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर आग लगाकर ख़ुदकुशी की कर ली।
 
16 फरवरी को पाटन जिले में उस वक्त हड़कंप मच गया जब अनुसूचित जाति के 9 लोग आत्मदाहा करने की मंशा से कलेक्ट्रेट परिसर में घुसने की कोशिश करने लगे। जिन्हें पुलिस ने हिरासत में ले लिया और कुछ देर बाद छोड़ भी दिया। लेकिन उन्हीं लोगों में से 60 साल के बुजुर्ग और राष्ट्रीय दलित एकता अधिकार मंच के कार्यकर्ता बानुभाई वनकर ने कलेक्ट्रेट के बाहर ख़ुद को आग के हवाले कर दिया और देखते ही देखते उसका शरीर पूरी तरह झुलस गया, जिसे तुरंत अपोलो हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। मृतक बानुभाई वनकर ऊंझा गांव के रहने वाले थे। बताया जा रहा है कि आत्मदाह करने की सूचना उन्होंने संबंधित अधिकारियों को पहले ही दे रखी थी, जिसे रोकने के लिए कलेक्ट्रेट परिसर के अंदर और बाहर बड़ी तादाद में पुलिस फोर्स की तैनाती गई थी।  

प्राप्त जानकारी के अनुसार पाटन जिले में कई गांवों में अनुसूचित जाति समाज के भूमिहीन किसानों को सरकारी जमीन देने की योजना के तहत जमीन आवंटित हुई थी, जिस पर कब्जे की मांग को लेकर लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं। एक प्रभावित किसान का कहना है कि सन 2015 में राजस्व विभाग को जरूरी शुल्क बाइस हजार दो सौ छत्तीस रुपये रुपये भी जमा करा दिया था, जिसके बाद भी उन्हें जमीन पर कब्जा नहीं दिया गया। इसी मांग को लेकर किसानों ने कलेक्ट्रेट परिसर में आत्मदाह करने का ऐलान कर रखा था।  

राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच के संयोजक और निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी ने बानुभाई की मौत पर गहरा दुख जताते हुए कहा कि ये बीजेपी सरकार के लिए शर्म की बात है कि अनुसूचित जाति समाज के लोगों को अपने अधिकारों के लिए ख़ुदकुशी जैसा कदम उठाना पड़ रहा है। उन्होंने किसान की ख़ुदकुशी के लिए जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक को जिम्मेदार ठहराया है और उनको तत्काल निलंबित करने की मांग की है। गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने भी किसान बानुभाई की मौत पर दुख जताया है और मामले की जांच के आदेश दिए हैं।  

मृतक किसान बानुभाई वनकर के आत्मदाह करने के फैसलों को हम ही नहीं बल्कि कोई भी सही नहीं ठहरा सकता है। लेकिन हमें ये भी सोचना और समझना होगा कि आखिर वो सरकार की कथित कार्यशैली से किस कदर आहत था, जिससे परेशान होकर उसने अपना जीवन ही ख़त्म कर लिया। यहां हम यही कहेंगे कि बानभाई वनकर को इस कथित व्यवस्था का और मज़बूती के साथ मुकाबला करना चाहिए था। 

मुख्य संवाददाता
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