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आपकी पत्रकारिता जातिवादी है या 'जूठन' ?

जिन लोगों ने ओमप्रकाश वाल्मिकी की आत्मकथा 'जूठन' को पढ़ा होगा वो बेहतर समझ सकते हैं कि ओमप्रकाश वाल्मिकी का लेखन जातिवाद फैलाने वाला था या समाज में कोढ़ की तरह फैल चुके जातिवाद पर। 'जूठन' तिरस्कृत समाज की व्यथा बयां करती हकीकत है। और मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि जो लोग जूठन को जातिवादी बता रहे हैं, उन्होंने जूठन का एक पृष्ट भी नहीं पढ़ा होगा। या फिर पढ़ने के बाद भी उनका दिमाग नहीं खुल पाया है और वो हजारों साल पुरानी जातिवादी व्यवस्था में ही जकड़े हुए हैं।      

हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला से अमर उजाला अखबार ने एक खबर छापी, जिसकी हेडिंग है 'कॉलेज विधयार्थियों को पढ़ाया जा रहा जातिवाद का पाठ' इस हेडिंग में 'जातिवाद का पाठ' ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’के लिए इस्तेमाल किया गया है। खबर के मुताबिक, 'जूठन' से जातिवाद फैल रहा है, इस किताब को पढ़ाते हुए शिक्षक 'असहज' महसूस कर रहे हैं। सवाल उठता है कि वो कौन से शिक्षक हैं जो हिंदी साहित्य की उपलब्धि मानी जाने वाली किताब 'जूठन' के अध्यायों को पढ़ाने में 'असहज' महसूस कर रहे हैं ? यह खबर रिपोर्टर राकेश भारद्वाज की है इनकी रिपोर्टिंग से साफ लगता है कि ये अभी तक खुद को जातिवादी मानसिकता से आजाद नहीं कर पाए हैं। 


मैं नहीं जानता कि इन्हें पत्रकारिता का कितना अनुभव है लेकिन खबर में कई तरह की factual गलतियां है, जैसे- इन्होंने लिखा है कि ओमप्रकाश वाल्मीकि का निधन 1913 में हुआ है जबकि उनका निधन 2013 हुआ है।  इन्होंने ओमप्रकाश वाल्मीकि को आज़ादी पूर्व का लेखक बताया है जबकि ओमप्रकाश वाल्मीकि का जन्म ही 1950 में हुआ। कोई कम पढ़ा-लिखा या अशिक्षित भी जानता है कि देश 1947 में आजाद हुआ था। अखबार मे जूठन’ को उपन्यास बताया है जबकि ये ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा का अंश है। मुझे लगता है कि ऐसी बेसिक गलतियां वही पत्रकार कर सकता है जो पूर्वाग्रह से ग्रसित हो। 

आपको बता दें कि 'जूठन' 1997 में प्रकाशित हुई और ये दलितों के दुख-दर्द, पीड़ा की कहानी है।  'जूठन' प्रगतिशील कहे जाने वाले भारतीय समाज के भीतर पनप रही उपेक्षाओं, प्रताड़नाओं का प्रामाणिक दस्तावेज है। ये आत्मकथा इतनी प्रभावशाली है कि इसका अनुवाद कई भाषाओं में हो चुका है। लेकिन जातिवादी मानसकिता के लोग इसे जातिवादी करार दे रहे हैं शायद वो दलितों द्वारा लिखे गए साहित्य को भी स्वीकार नहीं करना चाहते हैं। ये बड़ा हास्यास्पद है कि इन लोगों को 'जूठन' तो जातिवादी लगती है लेकिन 'मनुस्मृति' नहीं। 


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