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दलित वैज्ञानिक के साथ भेदभाव व प्रताड़ना, प्रधानमंत्री से लगाई न्याय की गुहार

देश के जाने माने वैज्ञानिक राम राजशेखरन के साथ भेदभाव और प्रताड़ित करने का मामला सामने आया है। मैसूर स्थित देश के प्रतिष्ठित और मशहूर शोध संस्थान केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान के निदेशक प्रोफेसर राम राजशेखरन ने प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखकर न्याय की गुहार लगाई है।  

जनसत्ता के अनुसार, दलित समुदाय से संबंध रखने वाले प्रो. राम राजशेखरन ने अपने पत्र में आरोप लगाया है कि विज्ञान एवं तकनीकि मंत्रालय के तहत आने वाले वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के महानिदेशक गिरीश साहनी उन्हें जान-बूझकर परेशान कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि उनका वैज्ञानिक और अकैडमिक करियर खत्म करने की साजिश की जा रही है। प्रोफेसर राजशेखरन ने अपने पत्र की एक कॉपी राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को भी भेजी है।  

बता दें कि राजशेखरन सीएसआईआर के तहत आनेवाले केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान (सीएफटीआरआई) के निदेशक हैं। इस पद पर उनकी नियुक्ति पांच साल पहले छह साल के लिए हुई थी, लेकिन सीएसआईआर के महानिदेशक गिरीश साहनी ने कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उनका ट्रांसफर नई दिल्ली के सीएसआईआर के मुख्यालय में निदेशक स्पेशल प्रोजेक्ट्स के पद पर कर दिया है। राजशेखरन का कहना है कि जानबूझकर प्रताड़ित करने के इरादे से डीजी ने उनका स्थानांतरण ऐसे पद पर किया है, जो अस्तित्व में ही नहीं है । इसके अलावा उन्होंने आरोप लगाया है कि उनके खिलाफ साजिशन ऐसी कार्रवाई की गई है ताकि दलित समुदाय का कोई व्यक्ति किसी बड़े संस्थान के टॉप-मोस्ट पोस्ट पर ना पहुंच सके।
    
प्रोफेसर राम राजशेखरन संक्षिप्त परिचय
प्रोफेसर राम राजशेखरन को लंबे समय से देश की समस्याएं सता रही थीं। एक तो मुख्त: शाकाहारी आबादी होने के कारण आहार में प्रोटीन की कमी की समस्या और दूसरा बार-बार आने वाला सूखा। वे चाहते थे कि ऐसी कोई फसल हो जो बहुत ही कम पानी में उग सके और उसमें इतना प्रोटीन हो, जो मांसाहार में मौजूद प्रोटीन के बराबर हो।

वे तमिलनाडु की मनमदुराई तहसील के हैं और उनकी परवरिश पुश्तैनी खेत के वातावरण में ही हुई है। इस गांव में पानी का हमेशा संकट बना रहता है लेकिन साथ में जातिगत भेदभाव की भी परेशानी थी। गांव में 50 मीटर की दूरी पर स्थित दो बस्तियों में से एक में खेतों में काम करने वाले मजदूर यानी पल्लर रहते थे तो दूसरी बस्ती में थेवार यानी क्षत्रिय रहते थे। दोनों में तनाव बना रहता था। राजशेखरन के बाल मन पर इन्ही बुरे अनुभवों का गहरा असर हुआ। थोड़े बड़े होने पर उन्हें लगा कि वास्तव में पानी के अभाव से कमजोर हो चुकी इलाके की अर्थव्यवस्था ही सारे झगड़े की झंझट है। उन्हें लगा कि विज्ञान और तकनीकी में ही इसका समाधान है।

खोज- इसलिए उन्होंने विज्ञान की पढ़ाई को चुना और वे गांव के पहले ग्रेजुएट अर्थात (बी. ए. ) बने। फिर वे पीएचडी के लिए बेंगलुरू स्थित इंडियन इंस्टीट्‌यूट ऑफ साइंस शोध के लिए गए और लिपिड्‌स यानी वसा पर शोध की ओर ध्यान गया। इसकी भी वजह थी। लिपिड ऐसे वसा होते हैं, जो कोशिका में पानी को रोकने की रचना बनाते हैं। इसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गए। इलिनॉय विश्वविद्यालय के पद चिकित्सक विद्यार्थी रहे और ड्‌यूपोंट में वैज्ञानिक के रूप में वे लिपिड और मानव आहार में उसकी भूमिका पर ही शोध करते रहे। बाद में न्यू मैक्सिकों जिला विश्वविद्यालय में गए। वहां भी उनकी खोज चलती रही।

इथियोपिया में खोज- शोध और अपने काम के सिलसिले में उनका ध्यान इथियोपिया की ओर गया। उनके गांव की तरह यह देश भी बरसों से भीषण सूखे का सामना करता रहा है। वहां भी बारिश बहुत कम होती है। उन्होंने सोचा कि बरसों-बरस सूखे का सामना कर रहे इस देश में जरूर प्रकृति ने ऐसी किस्में पैदा की होंगी, जो इस स्थिति का सामना कर सकें। उन्होंने अपने अध्ययन में पढ़ा था कि जैसी परिस्थिति होती है उसी के अनुसार पेड़-पौधे व प्राणी ढल जाते हैं। उसके मुताबिक खूबियां उनमें विकसित हो जाती है। उन्हें पता चला कि इथियोपिया में टेफ नामक खसखस के दानों जैसा खाद्यान्न का इस्तेमाल किया जाता है। यह फसल बरसों से उस देश का सांस्कृतिक खाद्य माना जाता है। खास बात यह थी कि इसमें प्रोटीन की मात्रा अंडे में मौजूद प्रोटीन के बराबर ही थी। इसके अलावा यह सूखे का सामना अच्छी तरह कर लेती है। इसमें अत्यधिक प्रतिरोधी स्टार्च होता हैं, जिसका मतलब है कि भोजन में यह स्टार्च धीरे-धीरे पैदा होता है। यह डायबिटीज के रोगियों के लिए बहुत अच्छा होता है, क्योंकि इससे ब्लड शुगर एकदम नहीं बढ़ती। भारत जैसे डायबिटीज की राजधानी कहलाने वाले देश में यह वरदान ही है।

मैसूर के सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्‌यूट के निदेशक राजशेखरन ने इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च के मार्फत वहां से टेफ की 18 किस्में मंगवाई। अपनी लैब में उन्होंने इसे उगाया पर सिर्फ दो किस्में ही जीवित रह सकीं। तीन साल के गहन शोध और प्रयोगशाला व मैदानी परीक्षण के बाद अब वे यह ’वंडर ग्रेन’ भारतीय किसानों को दने की तैयारी में है। राजशेखरन को उम्मीद है कि बचपन में उन्होंने पानी और प्रोटीन की समस्या के समाधान का जो सपना देखा था, उसका इस फसल से समाधान होगा।

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