img

संसद में बहुमत होने मात्र से संविधान बदलने की ताकत नहीं मिल जाती

जब से केंद्र में बीजेपी सरकार सत्ता पर काबिज हुई है, उसके मंत्री, जन प्रतिनिधि और नेता समय-समय पर अजीब बयान जारी करते रहते हैं। कभी कोई देश की राजनीतिक व्यवस्था के बारे में, कभी कोई संविधान के बारे में कुछ भी बोल देता है। तो कभी कोई समाज के कमजोर और अल्पसंख्यक तबकों को धमका देता है। इस प्रकार की मौखिक अराजकता को लेकर दिख रही चुप्पी गैर-जिम्मेदार लोगों का हौंसला बढ़ा रही है। ऐसा लगता है जैसे देश में राजतंत्र चल रहा हो और बीजेपी के नेता यहां जीवन भर अपना शासन चलाने के लिए अधिकृत कर दिए गए हों। आश्चर्य है कि इनकी अनर्गल बयानबाजी को कोई नियंत्रित करने वाला भी नहीं है। एकाध बार प्रधानमंत्री ने घुमा-फिराकर इसकी आलोचना जरूर की, पर उसके बाद वह प्राय: चुप ही रहे हैं।

जब से मोदी के नेतृत्व में भाजपा की केंद में सरकार बनी है, तब से ही संविधान की अवमानना के मामलों में बढ़ोतरी होती जा रही है। हाल ही में मोदी सरकार के मंत्री अनंत हेगड़े ने  एक बार फिर से विवादित बयान दिया है। बैंग्लोर में एक कार्यक्रम के दौरान अनंत हेगड़े ने कहा कि ‘बीजेपी’ सत्ता में संविधान बदलने के लिए ही आई है। इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि जो लोग खुद को धर्मनिरपेक्ष और बुद्धिजीवी मानते हैं, उनकी खुद की कोई पहचान नहीं होती।  

उत्तर कन्नड़ से 5 बार लोकसभा सांसद रहे अनंत हेगड़े ने कहा कि ‘मुझे खुशी होगी कि अगर कोई गर्व के साथ ये दावा करे कि वो मुस्लिम, ईसाई, ब्राह्मण या हिंदू है, क्योंकि वो अपनी रगों में बह रहे खून के बारे में जानता है’।  उन्होंने आगे कहा कि ‘लेकिन मुझे ये नहीं पता कि उन्हें क्या कहकर बुलाया जाए, जो खुद को धर्मनिरपेक्ष बताते हैं। ‘कोप्पल जिले के कूकानूर में एक कार्यक्रम में बोलते हुए अनंत हेगड़े ने कहा कि, वो लोग जो खुद को धर्मनिरपेक्ष कहते हैं, उनकी खुद की कोई पहचान नहीं होती, लेकिन वो बुद्धिजीवी होते हैं।‘

अनंत हेगड़े ने आगे कहा कि मैं आपके आगे सिर झुकाउंगा, क्योंकि आपको अपनी रगों में बहने वाले खून का पता है। अगर आप धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करते हैं, तो आप कौन हैं, इसको लेकर संदेह पैदा होता है। उन्होंने आगे कहा कि ‘हम संविधान का सम्मान करते हैं, लेकिन ये आने वाले दिनों में संविधान बदला जाएगा। हम संविधान बदलने ही आए हैं’। हेगड़े ने संविधान की प्रस्तावना पर सीधा हमला किया है। कर्नाटक के कोप्पल ज़िले में ब्राह्मण युवा परिषद के कार्यक्रम में बोलते हुए ‘सेक्युलरिज़्म’ का विचार उनके निशाने पर था। यहां यह सवाल उठता है कि क्या सरकार ‘सेक्युलर’ शब्द को संविधान से हटा सकती है? जैसी इच्छा केंद्रीय राज्य मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने जताई है? माना कि अब तक संविधान में अनेक संशोधन किए जा चुके हैं, लेकिन क्या संसद को यह अधिकार है कि वह संविधान की मूल प्रस्तावना को बदल सके?  
 
विदित हो कि 1973 में पहली बार यह सवाल सुप्रीम कोर्ट के सामने आया था। मुख्य न्यायाधीश एस. एम. सिकरी की अध्यक्षता वाली 13 जजों की बेंच ने इस मामले में ऐतिहासिक फैसला दिया था। यह केस था- ‘केशवानंद’ भारती बनाम स्टेट ऑफ़ केरला’, जिसकी सुनवाई 68 दिनों तक चली थी। संविधान के आर्टिकल 368 के हिसाब से संसद संविधान में संशोधन कर सकती है. लेकिन इसकी सीमा क्या है? जब 1973 में यह केस सुप्रीम कोर्ट में सुना गया तो जजों की राय बंटी हुई थी। लेकिन सात जजों के बहुमत से फैसला दिया गया कि संसद की शक्ति संविधान संशोधन करने की तो है लेकिन संविधान की प्रस्तावना के मूल ढांचे को नहीं बदला जा सकता है। कोई भी संशोधन प्रस्तावना की भावना के खिलाफ़ नहीं हो सकता है।  

यह केस इसलिए भी ऐतिहासिक रहा क्योंकि इसने संविधान को सर्वोपरि माना। न्यायिक समीक्षा, पंथनिरपेक्षता, स्वतंत्र चुनाव व्यवस्था और लोकतंत्र को संविधान का मूल ढांचा कहा और साफ़ किया कि संसद की शक्तियां संविधान के मूल ढांचे को बिगाड़ नहीं सकतीं। संविधान की प्रस्तावना इसकी आत्मा है और पूरा संविधान इसी पर आधारित है। यूं भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भी एक बार 1976 में संशोधन किया गया है जिसमें ‘सेक्युलर’’ और ‘सोशलिस्ट’ शब्दों को शामिल किया गया। लेकिन इससे पहले भी ‘पंथनिरपेक्षता’ का भाव प्रस्तावना में शामिल था। यानी भारत के संविधान की प्रस्तावना में पंथनिरपेक्षता हमेशा से है। प्रस्तावना में सभी नागरिकों को विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता और समानता का अधिकार पहले से ही लिखित है। 1976 के 42वें संशोधन में ‘सेक्युलर’ शब्द को जोड़कर सिर्फ इसे ही स्पष्ट किया गया था।  

भाजपा द्वारा संविधान को बदलने की बात करना कोई नया मामला नहीं है। संविधान पर पुनर्विचार आरएसएस का ‘हिडेन एजेंडा’ है। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि भारतीय संविधान में बदलाव कर उसे भारतीय समाज के नैतिक मूल्यों के अनुरूप किया जाना चाहिए। संघ प्रमुख भागवत ने हैदराबाद में एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि संविधान के बहुत सारे हिस्से विदेशी सोच पर आधारित हैं जबकि ज़रूरत है कि आज़ादी के 70 साल के बाद इस पर ग़ौर किया जाए। वाजपेयी सरकार द्वारा भी 1998 में संविधान की समीक्षा के लिए एक कमेटी बनाई गई थी। तब ये बहस उठी कि संविधान के मूल ढांचे के प्रभावित करने की कोशिश है, पंथनिरपेक्षता और आरक्षण को खत्म करने की कोशिश है। लेकिन तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने उस वक्त एक लंबे लेख में केशवानंद भारती केस का ज़िक्र करते हुए लिखा कि सेक्युलरिज़्म भारत की संस्कृति में है। इस तरह संविधान संशोधन का मामला टल गया। नवभारत टाइम्स के मत से कि जब देश के नीति-निर्माता सरकारी मंचों से अपराधियों की भाषा बोलने लगें तो फिर देश का भविष्य क्या होगा?, कतई सहमत हुआ जा सकता है। एक समय था यदि कोई नेता संविधान या व्यवस्था को लेकर जरा भी हल्की बात कह देता तो लोग उस पर आपत्ति करते थे। लेकिन अभी लोग भी चुप हैं। उनको समझना होगा कि यह सिलसिला जारी रहा तो एक दिन ऐसा भी आएगा जब संविधान से मिले अधिकारों पर कैंची चलाने की कोशिशें गंभीरता से शुरू हो जाएंगी।

दरअसल आर एस एस और भाजपा को संविधान की आत्मा से कोई खास परहेज नहीं है। इनकी दिक्कत ये है कि संविधान निर्माता के रूप में बाबा साहेब डॉक्टर अंबेडकर का नाम संविधान से जुड़ा है। ये मौके-बेमौके दलित बस्तियों में समरसता भोज तो आयोजित करते हैं, लेकिन छूआछूत और शोषण की पैरोकार वर्णव्यवस्था के ख़िलाफ़ चुप क्यों रहते हैं? संविधान समीक्षा करने के बहाने आर एस एस का जो मूल मकसद है..... वो है - भारतीय   संविधान के रचियता के रूप में बाबा साहेब डॉक्टर अंबेडकर का होना। आर एस एस अथवा समस्त हिन्दूवादी संगठन केवल इस बात को लेकर ही ज्यादा परेशान हैं इसलिए नहीं संविधान अच्छा या बुरा है।

सिद्धांत रूप में संसद मतदाताओं को धोखे में नहीं रख सकती। सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि यदि सरकार के पास पूर्ण बहुमत है, तो उसे संविधान को संशोधित करने का अधिकार नहीं मिल जाता। सरकार को उस कानून को बदलने का अधिकार नहीं मिल जाता जिसके बल पर संसद म्रें पहुँची है। बहुमत से निर्वाचित हो जाने मात्र से ही किसी को संविधान बदलने की ताकत नहीं मिल जाती।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

   लेखक:  तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र)दो निबन्ध संग्रह  और अन्य। तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं। 



' पड़ताल ' से जुड़ने के लिए धन्यवाद अगर आपको यह रिपोर्ट पसंद आई हो तो कृपया इसे शेयर करें और सबस्क्राइब करें। हम एक गैर-लाभकारी संगठन हैं। हमारी पत्रकारिता को सरकार और कॉरपोरेट दबाव से मुक्त रखने के लिए आर्थिक मदद करें।

संबंधित खबरें

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked with *

0 Comments

मुख्य ख़बरें

मुख्य पड़ताल

विज्ञापन

संपादकीय

वीडियो

Subscribe Newsletter

फेसबुक पर हमसे से जुड़े