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पुस्तक समीक्षा– राजनीतिक अंतर्द्वंदों से सीधे टकराती गजलें : संभल राजपथ वरना...

डॉ.एन.सिंह कि छियासठ गजलों का संग्रह “संभल राजपथ वरना...” अपने राजनीतिक  एवं सामाजिक सरोकारों के कारण चर्चा में है | “ गौ भक्तों की निर्मम पिटाई के शिकार / ऊना के निर्दोष दलित युवकों / तथा आहत दलित समाज को ” समर्पित ये गजलें लोकतन्त्र में निरंतर मजबूत होते जा रहे फासीवाद और उसकी जनहन्ता गतिविधियों से पाठको को लगातार रूबरू करवाती हैं | वैसे तो डॉ.एन.सिंह की कविताएँ विद्रोही चेतना की वाहक रही है| जो सम्पूर्ण राजनीति और समाज कि विद्रूपताओं पर चोट करती रही हैं | लेकिन गजल एक ऐसी विधा है, जो कोमल भावनाओं  को ही अभिव्यक्ति देती रही है | लेकिन हिंदी में दुष्यंत ने गजल को समय और समाज की उबडखाबड़ जमीन पर लाकर खड़ा कर दिया था | डॉ.एन.सिंह की  गजलें उसी परम्परा कि अगली कड़ी हैं | जब डॉ.एन.सिंह कहते हैं कि –     
       
     “ पल रहे हैं कुर्सियों पर नाग |               
        वक्त कि आवाज सुन तू जाग ||’’


सम्भवत डॉ.एन.सिंह का संदेश साफ है कि जब देश का अन्नदाता आत्महत्या कर रहा हो, देश के बच्चे बिना ऑक्सीजन के मर रहे हों | लव जिहाद के नाम पर युवक और युवतियों की हत्याएं हो रही हों | गाय  के नाम पर ऊना के दलितों की निर्मम पिटाई हो रही हो | गाय पालक पहलू खान  की हत्या केवल इसलिए कर दी जाती हो कि वह मुसलमान था | लोगों की प्लेट और फ्रिज में गाय का मांस तलाशा जा रहा हो और बकरी के मांस को गाय का मांस बताकर अख़लाक़ की  हत्या कर दी जाती हो | सहारनपुर के शब्बीरपुर गाँव में दलितों के घरों को फूका जाना या कोरेगाँव में उत्सव मनाते दलितों पर हमला करना | जो बुद्धिजीवी इन मुद्दो को उठा रहे हैं, उनकी हत्याएं करवा देना | उस पर भी देश कि बड़ी कुर्सियों पर बैठे लोगों का चुप रहना | क्या देश की  शोषित–पीड़ित जनता को सोचने–समझने को विवश नहीं करेगा ! उनके जागने के संकेत डॉ.एन.सिंह की गजलों में स्पष्ट दिखाई देते हैं –           

 “धीरे–धीरे जाग रहे हैं, अब मेरी बस्ती  के लोग|
 रामराज झूठा सपना था, जान गए बस्ती के लोग||’’
 
            **               **                 **           
   “बंजर धरती नारे भाषण, हरियाली के पेड़|
   यूं सपनों के बाग निराते, ढली समुची छाँव ||’’

वर्तमान युग में आदमी के रोजी से लेकर रोटी तक के सारे व्यवहार को राजनीति ही तय करती है | चतुर–चालक नेता इस देश की भोली–भली जनता को कभी जाति के नाम पर कभी धर्म के नाम पर और कभी वर्ग संघर्ष के नाम पर निरन्तर छल रहे हैं | आम जनता इससे निरन्तर त्रस्त होती जा रही है | डॉ.एन.सिंह आम जनता की छटपटाहट को कुछ इस तरह अभिव्यक्त करते हैं –       
    
    “कब तक छलते जाओगे, तुम भोली जनता को|
     कब तक जुड़ते ही जाएगें, ये बेमेल सिरे ||’’

ऐसा इसलिए हो रहा है कि इस देश के राजनीतिक लोगों के लिए यहाँ का आदमी, आदमी नहीं है – एक वोट है | इस वोट के लिए वह आदमी का खून करवा सकता है, बस्तियां जलवा सकता है और करवा सकता है साम्प्रदायिक दंगे | इस स्थिति पर डॉ.एन.सिंह अपनी एक गजल में कुछ इस तरह टिप्पणी करते हैं –             

“ उड़ रही हैं चिन्दियाँ कानून की |
   धार पैनी हो रही नाखून की  ||

  अर्थ बदले जा रहे हर शब्द के |
  व्याख्या यूं हो रही मजमून की ||

  जुल्म बढ़ते जा रहे हैं भाव से |    
  राजनीति हाट है परचून की  ||

  वोट की कीमत यहाँ सब आंकते |           
  किन्तु कीमत कुछ नहीं है खून की ||’’

आज आदमी किसी भी हालात पर कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है | क्योकि वह जानता है कि सत्ताधारी लोग उसकी किसी भी बात का कुछ भी मतलब निकाल सकते हैं | दुष्यंत ने कभी आपातकाल में कहा था –“ मत कहो आकाश में कोहरा घना है / यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है |’’ लेकिन डॉ.एन.सिंह इस भयावह दौर में आवाम को बोलने के लिए प्रेरित करते हैं      

“ बोलिए ! कुछ लील न चुप्पियाँ |       
   दोस्तों दहशत भरा ये दौर है || 
 

लम्बे समय से इस देश में विकास का झुनझूना बजाया  जा रहा है | लेकिन कहीं भी विकास दिखाई नहीं दे रहा है | न सडकें बनी हैं, न स्वच्छ पानी उपलब्ध है | न कोई स्कूल खोला गया और न ही युवाओं को रोजगार मिला | नोटबन्दी   के कारण बैंको कि लाइनों में अपना ही पैसा लेने के लिए भूखे –प्यासे सौ से भी अधिक गरीब लोगों की जानें चली गई | उनकी हत्याओं का जिम्मेदार कौन ! जी.एस.टी. के कारण छोटे–मोटे कारोबारी परेशान हैं | लेकिन घुटन ऐसी कि कुछ कह नहीं पा रहे हैं | फिर भी आक्रोश दिखाई देने लगा है | जब सर्वोच्च न्यायलय के चार न्यायमूर्ति जनता से न्याय मांगते हैं और कहते हैं कि संविधान और लोकतन्त्र खतरे में है | तो समझा जा सकता है कि देश किधर जा रहा है | ऐसे में डॉ. एन. सिंह का ये शेर पढ़ा जाना जरूरी है –       

“ अब बागी फूटपाथ हो चले,संभल राजपथ वरना |
 राजभवन कि नींव हिलेगी, जागी जनता भोली ||’’

डॉ.एन.सिंह की ये गजलें बहुत ही मारक हैं | इनकी अनुगूंज बहुत दूर तक जाएगी | ऐसी आशा की जा सकती है | 
         
गजल संग्रह  : संभल राजपथ वरना ...
कवि        : डॉ.एन.सिंह 
प्रकाशक     : बोधि प्रकाशन ,सी – 46, सुदर्शनपुरा इण्डस्ट्रियल एरिया एक्सटेशन नाला रोड , 22 गोदाम , जयपुर – 302006 
प्रथम संस्करण  : 2017,
मूल्य – सौ रूपए  मात्र |

सम्पर्क –आशीष भारती 139 ,टैगोर गार्डन ,पेपर मिल रोड,
सहारनपुर – 247001 (उ.प्र.)
Mo- 7830262142
E.Mail-ashishbharti24@gmail.com           


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