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एक नई परम्परा को जन्म देते निबंध

“अम्बेडकरवाद:एक समसायिक विमर्श” : एक दृष्टि

निबन्ध  गघ लेखन की एक ऐसी विधा है जिसकी गणना अक्सर किसी विषय की तार्किक और बौद्धिक विवेचना करने वाले लेखों के लिए ही की जाती है। शिक्षा-काल में हमें बताया गया था कि  निबंध की विषय-वस्तु को प्रस्तुत करने के लिए प्राय: सन्दर्भ यानी प्रस्तावना, रचना अथवा विषय-वस्तु, प्रस्ताव और अंत में सारांश  का उल्लेख किया जाता है। पहले आलोचना को दो रूपों में जाना जाता था...एक – आलोचना; दो – समालोचना.....”आलोचना” का प्रयोग लेखन अथवा विषय विशेष के प्रस्तुतिकरण में हुई खामियों/कमजोरियों पर चर्चा करना और “समालोचना” का प्रयोग लेखन अथवा विषय विशेष के प्रस्तुतिकरण में पाए जाने वाली विशेषताओं की चर्चा करना माना जाता था। किंतु आज के साहित्यिक क्षेत्र मे “आलोचना” और “समालोचना” दोनों ही सिमटकर केवल “आलोचना” में निहित हो गईं। 

निबन्ध वैचारिकी के प्रदर्शन का एक सशक्त माध्यम बन गया है। अन्य विधाओं की अपेक्षा ज्यादा स्वतंत्र भी है। वर्तमान में मध्ययुगीन धार्मिक, सामाजिक रूढ़ियों से मुक्ति का द्वारा खोलने का काम यदि कोई साहित्यिक विधा कर रही है तो वह निबन्ध ही है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, “निबंध लेखक अपने मन की प्रवृत्ति के अनुसार स्वच्छंद गति से इधर-उधर फूटी हुई सूत्र शाखाओं पर विचरता चलता है जो लेखकों के दृष्टि-पथ को निर्दिष्ट करती है।”  इसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि निबंध में सहज, सरल और आडम्बरहीन ढंग से तथ्यों की अभिव्यक्ति होती है। लेखक बिना किसी संकोच के अपने पाठकों को अपने जीवन-अनुभव सुनाता है और अपने साथ जोड़ता है। मेरा यह भी मानना है कि निबन्ध न केवल लेखक के व्यक्तित्व की अभिव्‍यक्ति होती है अपितु लेखक अपने निर्णय तक आने के लिए अनेक संदर्भों/उद्दहरणों का सहारा भी लेता है.....विशेषकर वैचारिक निबन्धों में। 

लेखक ईश कुमार गंगानिया की पुस्तक “अम्बेडकरवाद : एक समसायिक विमर्श” के निबन्ध इसी साहित्यिक पृष्ठभूमि पर आधारित हैं। उन्होंने जैसे अपने परिणाम पर आने के लिए विधागत प्रतिबन्धों को पीछे छोड़ते हुए नए प्रयोग किए हैं। निबंध का आरंभ कैसे हो, बीच में क्या हो और अंत किस प्रकार किया जाए, ऐसे किसी निर्देशों और नियमों को मानने की बाध्यता उन्हें छू तक नहीं पाई। इसका अर्थ यह भी नहीं कि उनके निबन्धों में उच्छृंखलता है। सामयिक सामाजिक/राजनीतिक/धार्मिक परिस्थितियों के दबाव में जो भी उनके  अनुभव रहे हैं, उसी भाव को उन्होंने अपने निबन्धों में बेखौफ और बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत किया है। साहित्यकार और उसके लेखन की सार्थकता भी इसी में है।  मेरी दृष्टि में ये निबन्ध नई परम्परा के निबन्ध कहे जा सकते हैं। 

उल्लेखनीय है कि उनके निबन्धों का केन्द्र-बिन्दु डा. अम्बेडकर का जीवन संघर्ष, उनका सामाजिक/आर्थिक/धार्मिक दृष्टिकोण विशेष रहा है। यह एक ऐसी विचारधारा है कि समाज के तमाम विषयों की परतें स्वत: ही उखड़ती चली जाती हैं। फलत: नए-नए विषय स्वत: जहन में आते रहते हैं और एक समग्र विशलेषण का कारण बन जाते हैं। यहाँ भी ऐसा ही हुआ है।.....गंगानिया जी ने अम्बेडकर की विचारभूमि से मार्क्सवाद और ब्राह्मणवाद  की आलोचना के विषयों का बखूबी विशलेषण किया है। प्रस्तुत निबन्धों में केवल डा. अम्बेडकरवाद और मार्क्सवाद का तुलनात्मक अध्ययन ही सामने नहीं आया है, अपितु गंगानिया जी ने दलित वर्ग में जातिगत विखराव पर भी जमकर प्रहार किया है। ‘दलित लेखक संघ’ के नामकरण को लेकर चल रहे समग्र विचार को ध्यान में रखकर ‘अम्बेडकरवादी लेखक संघ’ की स्थापना की संकल्पना को भी अपने निबन्धों में बहस का मुद्दा बनाया है।  

यह तो पाठकों को ही तय करना है कि गंगानिया जी के निबन्ध अपने चर्म तक पहुँच पाए हैं कि नहीं। 
पुस्तक का नाम : “अम्बेडकरवाद : एक समसायिक विमर्श”लेखक : ईश कुमार गंगानियाप्रकाशक : अनुभव प्रकाशन, गाजियाबाद (उ. प्र.)                        


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