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पुस्तक समीक्षा : 'बेस्ट ऑफ़ करवाचौथ'

रजनी तिलक का नवीन कहानी संग्रह ‘ बेस्ट ऑफ़ करवाचौथ’ उनके व्यक्तिगत जीवन के संघर्षो के अलावा सामाजिक आन्दोलन में उनके द्वारा नजदीकी से देखी गयी घटनाओं का विश्लेषित विवरण है। ये दर्शाता  है कि अम्बेडकरवादी कहानियां अब केवल व्यक्तिगत संघर्षो का दस्तावेज ही नहीं रहेगा अपितु वहां से आगे बढ़ चुकी है और अब उन लोगों के जीवन संघर्ष भी इसमें शामिल हैं जो शायद स्वयं को अभिव्यक्त न कर पाएं।

उनकी कहानियां हमें जीवन के यथार्थ से परिचय करवाती हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि ये कहानियां बेबाक है जिनका एक ही उद्देश्य है कि कैसे ब्राह्मणवादी पितृसत्ता हमारे जीवन में कार्य करती है और शायद उसके संवाहक मात्र सवर्ण या ब्राह्मण ही नहीं अपितु बड़े बड़े विचारो का दावा करने वाले भी होते है। रजनी की कहानियों ने हमारे समाज के बड़े बड़े चिंतको के दोहरे मापदंडो का भी पर्दाफाश किया है। वैसे समाज में काम करने वाले अधिकांश लोग इन बातों को जानते भी हैं लेकिन लिखते या बोलते वक़्त इन बातों को या तो चालाकी से छिपा देते हैं या घर का मामला कहकर हल्का करने की कोशिश करते हैं। ये सारी कहानियां करवाचौथ पर नहीं हैं लेकिन उसके सहारे लेखिका ने परम्परावादी समाज में महिलाओं के उत्पीड़न की दस्तानों को संजोया है जो हमारे जीवन से बहुत नजदीकी से जुडी हुई हैं।

इस कहानी संग्रह की एक कहानी ‘अस्मितावादी’ आदिवासी हितों पर कार्य करने वाली एक बड़े नाम की सवर्ण साहित्यकार का परिचय करवाती है जो बिलकुल वैसी ही है जैसे बड़े बड़े घरो की किट्टी पार्टी महिलाओं के सामाजिक कार्य जहाँ पर वे बाल मजदूरी या महिला हिंसा पर चर्चा कर रहे होते हैं लेकिन सभी के घर पर न्यूनतम वेतन से कम पर चौबीस घंटे काम करने वाली महिलाएं काम कर रही होती हैं। वैसे, जिन लेखिका को इंगित करती रजनी जी ने अस्मिता कहानी लिखी वो वाकई में हकीकत बयां करती है। बहुत से लोग अपने विशेषाधिकारों के कारण चाहे उनके जातीय या आर्थिक ताकत के बल पर कार्य करते हैं और उनकी पूरी कोशिश ‘हितैषी’ दिखने की तो होती है लेकिन वे अपने विशेषाधिकार छोड़ने को तैयार नहीं होते। कहानी असल में हमारी वैचारिक बेईमानी को दर्शाती है कि हम जाति ख़त्म करने या आदिवासी हितों की तो बात करेंगे लेकिन वो केवल भाषणों या मंचो पर, अपने व्यक्तिगत जीवन में हम उससे दूर नहीं होते क्योंकि उससे हमें सामाजिक और आर्थिक ताकत मिलती है। जो लोग उससे दूर होते है वे समाज में अलग थलग पड जाते है। अकेलेपन के भय में भी लोग अपने समाज से नहीं हटते, इसलिए आन्दोलन, लेखन आदि बहुतो के लिए विचार कम और प्रसिद्धि पाने और समय बिताने के तरीके भी होते हैं क्योंकि उनके पास समय होता है, पैसे होते है और ताकत होती है. दूसरी और, ऐसे भी लोग होते हैं जो इन सबके लिए संघर्ष कर रहे होते हैं। विशेषाधिकार प्राप्त लोगो को चाहिए कि वे नए लेखको और विचारको को आगे बढाए ना कि उनके साथ कोई कम्पटीशन करें।

'बेस्ट ऑफ़ करवा चौथ' नाम की कहानी रजनी जी का आत्मकथात्मक कृति है। बाकि सभी कहानियां उनके सामाजिक कार्यो से जुड़े संस्मरण हैं लेकिन बेस्ट ऑफ़ करवा चौैथ नामक कहानी व्यक्तिगत है। अक्सर ये सवाल खड़े होते हैं कि अम्बेडकरवादी साथी वामपंथ के साथ क्यों नहीं आना चाहते। वैसे तो इस बारे में  बहुत बातें हैं जो इस समीक्षा के बाहर की बात होगी लेकिन एक बात साफ़ है कि वैचारिक ब्राह्मणवाद भी बहुत खतरनाक होता है। बहुत से लोग मार्क्सवाद और अन्य वादों के नाम पर दूसरो का जो अपमान करते हैं वो बेहद निंदनीय है, रजनी ने वो सब झेला जब घर पर स्वयं को कम्युनिस्ट कहने वाला आंबेडकर का मजाक उड़ाता और दुनिया की सारी समस्याओं का समाधान मार्क्सवाद में ढूंढता लेकिन आश्चर्यजनक बात यह कि घर पर वह चाहता है के उसकी बीवी उसके लिए करवा चौथ का व्रत रखे और जब वह नहीं रखती तो उसे अम्बेडकरी कह कर मजाक उड़ाता है। भारत के घर-घर के क्रांतिकारियों की ऐसी ही दास्तान है और ये केवल मार्क्सवाद का दावा करने वालों के साथ है ऐसा मैं नहीं मानता। पित्रसत्ता की ईगो में तो बड़े-बड़े अम्बेडकरवादी भी धंसे पड़े हैं लेकिन जैसा कि मैंने कहा उस सच को बाहर लाने की ताकत सभी में नहीं होती। रजनी जी ने वो सच उगला है और इसकी सराहना की जानी चाहिए क्योंकि अगर हम अपने समाज के नैतिक मूल्यों का पुनरावलोकन नहीं करेंगे तो कही नहीं पहुंचेंगे। आखिर जब हम चर्चा करते हैं कि भारत में मार्क्सवाद या आंबेडकरवाद क्यों नहीं सफल हो रहा तो बहुत हद तक ये बात सही है कि सभी विचारधाराओ के पुरुषों पर असल में पुरुषवादी विचारधारा हावी हो जाती है। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि एक क्रन्तिकारी कम्युनिस्ट पार्टी की क्रान्तिकारी महिला भी रजनी को कहती है कि उन्हें करवाचौथ का व्रत रखना चाहिए। ये मुझे ज्यादा अफसोसनाक लगा क्योंकि मान लिया कि पुरुषो का तो अहम् है लेकिन क्रन्तिकारी कहने वाली महिलाओं को क्यों करवाचौथ प्यारा लगे, ये बात समझ से बाहर है।

इन कहानियो में बहुत मार्मिकता भी है लेकिन वे लेखिका के मज़बूत पक्ष को सामने रखती हैं कि समाज के हित में कोई बात न छिपाओ। उनकी अपनी भाभी हमेशा करवाचौथ रखती थी लेकिन भरी जवानी में बड़े भाई की मौत हो गयी। रजनी कहती हैं कि अगर करवाचौथ का व्रत रखकर पति की उम्र लम्बी होती तो किसी भी पति को मरना नहीं चाहिए और भारत में सभी पतियों की उम्र लम्बी होनी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं है। जिस बात के लिए उन्हें अपने पति और आस-पास की महिलाओं के ताने सुनने पड़े, उसी बात का पालन करके भी उनकी भाभी उनके भैया की उम्र लम्बी नहीं कर सकी। अगर भाभी के व्रत में ताकत होती तो भैया कम उम्र में नहीं जाते। मतलब ये कि समय आ गया है कि ऐसी सड़ी गली परम्पराओं को छोड़ देना चाहिए जो केवल और केवल महिलाओं के प्रति नकारात्मकता पर आधारित हैं और समाज में किसी भी बुराई के लिए महिलाओं को ही जिम्मेवार ठहराती हैं।

'वीमेन सेल' की कहानी दर्शाती है कि कैसे सरकारी स्तर पर महिलाओं के खिलाफ अत्याचार मिटाने के लिए किये जा रहे इन प्रयासों में कोई मौलिकता नहीं है और सभी मात्र दिखावा है, ये हकीकत है कि सरकार के अधिकांश विभाग या मंत्रालय संवेदनहीन हैं और वहां बजाय सहानुभूति के आपको ‘पति’ को परमेश्वर मानने के ही प्रवचन मिलेंगे।

ये सभी कहानिया बेहद संवेदनशील है लेकिन सभी में जीने के सन्देश भी हैं, ये बताता है कि जब तक साहित्यकार का समाज से वास्ता नहीं होगा तो वो कुछ नहीं कर सकता। इन छोटे-छोटे कथानको में समाज में व्याप्त कुरीतियां हैं और सबसे बड़ी बात ये कि उनका मुकाबला हम इसलिए नहीं कर पाते क्योंकि हम स्वयं ही पित्र-सत्ता के विशेषाधिकारो का लाभ ले रहे हैं। इन कहानियों के पात्र हमारे जीवन का हिस्सा हैं लेकिन हम इन्हें कभी नायक नहीं बनाते। इन महिलाओं ने अपने जीवट संघर्ष से जीवन को जिया है और रजनी ने उन्हें आवाज देकर समाज के लिए बहुत अच्छे सन्देश रखे हैं। अभिकरण प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में 19 प्रेरणास्पद कहानियां हैं जो हमें झकझोरती हैं और सोचने को विवश करती है। ये यह भी साबित करती हैं कि अभी समाज में काम करने की बहुत जरुरत है। बड़े-बड़े सिद्धांतों और विचारों की दुनिया में हम सभी खोये रहते हैं लेकिन अधिकांश विचारक समाज से कट चुके हैं लिहाजा समाज जड़ हो चुका है हालाँकि महिलाए प्रतिरोध भी कर रही हैं लेकिन परम्परावादी शक्तियां भी बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। जरुरत है अम्बेडकरवाद की आजाद हवा हमारे घरो के अन्दर बहे लेकिन वो तभी होगा जब हम बाबा साहेब के सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएं जिसके मूल में स्त्रीमुक्ति है क्योंकि इसके बिना देश में कभी परिवर्तन नहीं आ पायेगा और उसके लिए ये भी आवश्यक है कि रजनी तिलक जैसे लोग समाज की कुरीतियों पर न केवल लगातार प्रहार करें अपितु बाबा साहेब द्वारा बताये गए विकल्पों के बारे में लोगो को जागृत करें।

पुस्तक का नाम : 'बेस्ट ऑफ़ करवाचौथ'

लेखिका : रजनी तिलक
प्रकाशक : अधिकरण प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य : रुपया 265 ( हार्ड कवर )
पेज : 107


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