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दलितों को अपना मीडिया स्थापित करना चाहिए- मोहनदास नैमिशराय

नई दिल्ली में 9 सितंबर 2017 की शाम को गांधी शांति प्रतिष्ठान का सभागार दलित समाज के बुद्धिजीवियों के विचारों से गूंजता रहा,  मौका था वरिष्ठ दलित लेखक और पत्रकार मोहनदास नैमिशराय की पुस्तक ‘दलित पत्रकारिता : एक विमर्श (चार खण्डों में)’ के लोकार्पण और सह परिचर्चा का । राष्ट्रीय दलित आंदोलन और कस्तूरी देवी मेमोरियल ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में सबसे पहले उपस्थित वक्ताओं ने ‘दलित पत्रकारिता : एक विमर्श (चार खण्डों में)’ पुस्तक का लोकार्पण किया और इसके बाद इन पुस्तकों के अलग-अलग खंडों पर विस्तार पूर्वक प्रकाश डालते हुए दलित प्रत्रकारिता को स्थापित करने पर बल दिया ।
 
कार्यक्रम में उपस्थित वरिष्ठ दलित चिंतक, पत्रकार और उद्यमी चंद्रभान प्रसाद ने कहा कि मोहनदास नैमिशराय का दलित प्रत्रकारिता को स्थापित करने में अहम योगदान रहा है, जिसका प्रमाण ‘दलित पत्रकारिता : एक विमर्श (चार खण्डों में)’ पुस्तकों के रूप में आज हमारे सामने है। चंद्रभान प्रसाद का ये भी कहना था कि ये पुस्तकें दलित पत्रकारिता के क्षेत्र में शोध करने के लिए बहुत ही उपयोगी साबित होंगी। इसके साथ ही उन्होंने दलित समाज की समस्याओं और उनके समाधान पर अपने विचार रखते हुए दलितों के साथ हुई कई घटनाओं का जिक्र किया। इसके अलावा चंद्रभान प्रसाद ने कहा कि दलितों को सरकारी नौकरियों पर ही निर्भर नहीं रहना चाहिए, उन्हें व्यापार और अन्य  क्षेत्रों में आगे आकर काम करना होगा, नहीं तो आज से 70 साल बाद दलितों की आने वाली पीढ़ियों को कई मोर्चों पर दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा।    

इस मौके पर वरिष्ठ दलित लेखिका, पत्रकार और महिला आंदोलन की सक्रिय कार्यकर्ता रजनी तिलक ने  कहा कि ये सच है कि मुख्यधारा की मीडिया में दलित समाज के पत्रकारों का प्रतिनिधित्व कहीं दिखाई नहीं देता है। रजनी तिलक जी ने  कहा कि दलित महिलाएं साहित्य रचने में अहम भूमिका निभा रही हैं, लेकिन उन्हें वो मुकाम नहीं मिल सका, जिसकी वो हकदार हैं। उन्होंने इसके लिए दलित पुरुष साहित्यकारों को भी जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने जानकारी देते हुए कहा कि हम दलित महिला लेखिकाओं को आगे लाने की दिशा में काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि बाबा साहब अंबेडकर आधी शक्ति का ताकत को समझते थे, उनके आंदोलन में, उनकी पत्रकारिता में हमेशा महिलाएं रहती थीं,  इसीलिए उनके दौर में आंदोलन पूरे देश में जोरों पर था, उनके आंदोलन की गुंज पूरे देश में थी लेकिन उनके चले जाने के बाद जो भी आंदोलन चले उनमें महिलाओं को वो जगह नहीं दी गई जो मिलनी चाहिए थी।  अगर महिलाओँ को आंदोलन से जोड़ा गया होता तो आज आंदोलन और मजबूत होता। 
 
हरियाणा से आईं महिला आंदोलनकारी और समाजसेविका डॉ शुभा ने दलित महिलाओं की स्थिति पर गहनता के साथ अपने विचार रखे। उन्होंने आगे बोलते हुए कहा कि दलित महिलाओं के साथ उत्पीड़न की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं, लेकिन मुख्य धारा की मीडिया उन घटनाओं को सही तरीके से पेश नहीं करता, जिससे पीड़ित दलित महिलाओं की आवाज दब जाती है और उन्हें कानून की चौखट पर भी न्याय पाने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है। उन्होंने हरियाणा में हुई मिर्चपुर,भगाना जैसी घटनाओं के पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी के लिए कानून में ही बदलाव करने की जरूरत बताई। डॉ शुभा ने कहा कि कानून के शिकंजे से बचने के लिए सामंतवादी, दमनकारी लोग एक ख़ास रणनीति के तहत समूह के रूप में एकजुट होकर दलितों को निशाना बना रहे हैं।      

इस मौके पर लेखक बजरंग बिहारी तिवारी ने कहा कि मोहनदास नैमिशराय ने ना सिर्फ दलित पत्रकारिता को पहचान दिलाई है बल्कि भविष्य के लिए भी दलित पत्रकारों की नींव तैयार की है।  कवि और लेखक शेखर पंवार ने कहा कि दलित पत्रकारिता में जितना लेखन नैमिशराय जी ने किया है शायद ही किसी ने किया हो, उत्तर भारत में दलित पत्रकारिता की नींव उन्होंने ही रखी ।
दिल्ली विश्विद्यालय के अरबिंदो कॉलेज में प्रोफेसर हंसराज सुमन ने अपने जोशीले भाषण में कहा कि हमने दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी पत्रकारिता विभाग को स्थापित कराने का काम किया है, इसके  साथ ही दलित समाज के छात्र-छात्राओं के लिए पत्रकारिता के कोर्स की फीस भी बहुत कम तय कराई थी। उन्होंने कहा कि देश के सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में दलित पत्रकारिता की पढ़ाई भी होनी चाहिए। उन्होंने इस कार्यक्रम के आयोजकों से विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में दलित पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए एक प्रस्ताव तैयार कर यूजीसी को भेजने का सुझाव दिया है।     

कार्यक्रम में लोकायतन पत्रिका के संपादक विजय प्रताप ने कहा कि मोहनदास नैमिशराय दलित पत्रकारिता के सशक्त हस्ताक्षर हैं।  उनका कहना था कि मोहनदास नैमिशराय जी ने हमारे साथ जुड़कर लोकायतन पत्रिका को एक नई पहचान दिलाई थी। उस दौर में वो पत्रिका मोहनदास नैमिशराय के नाम से जानी जाती थी। इस मौके पर विजय प्रताप ने वर्तमान दौर के सामाजिक
, राजनीतिक मुद्दों पर अपने विचार रखे। उन्होंने संघ और बीजेपी की नीतियों और कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि केंद्र में बीजेपी की नहीं बल्कि संघ की सरकार चल रही है। संघ से जो आदेश आता है केंद्र सरकार उसी का पालन कर रही है। सबका साथ,सबका विकास का नारा महज दिखावा साबित हो रहा है। वहीं रूपचंद गौत्तम जी ने विश्वविद्यालयों पर कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि विश्वविद्यालयों में दलित पत्रकारिता को जगह नहीं दी जा रही है। कोर्स में दलित पत्रकारिता को एक षड़यंत्र के तहत नहीं जोड़ा जा रहा है। जिसके लिए आवाज़ उठाना जरूरी है।    

वरिष्ठ दलित लेखक और पत्रकार मोहनदास नैमिशराय ने कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए सभी का आभार जताया और अपने पत्रकारीय जीवन के संघर्ष की कहानी सुनाई। उन्होंने कहा कि हमने मुख्य धारा की मीडिया में दलित पत्रकारिता को  स्थान दिलाने के लिए काफा काम किया है
, जिसका नतीजा ये रहा कि ज़्यादातर राष्ट्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में दलित लेखकों को स्थान मिल रहा है। उन्होंने दलितों से अपील करते हुए कहा कि हमें दूसरों वर्गों की आलोचना करने के बजाय अपना ‘दलित  मीडिया’ स्थापित करना चाहिए । दलितों को अपने अखबार,पत्रिकाएं और न्यूज चैनल खोलने होंगे और ऐसे लोग हमारे समाज में मौजूद हैं, जो ये काम करने में पूरी तरह सक्षम हैं। लेकिन इसके लिए हमें अहम छोड़कर आपस में जुड़ने की आवश्यकता है।  

कार्यक्रम की अध्यक्षता जयपुर से पहुंचे वरिष्ठ दलित कवि हरदान हर्ष ने की और उन्होंने दलित पत्रकारिता में अहम योगदान के
  लिए मोहनदास नैमिशराय की तारीफ की। हरदान हर्ष ने दलित पत्रकारिता की इन पुस्तकों को महत्वपूर्ण दस्तावेज बताया। इसके साथ ही उन्होंने दलित समाज के लोगों से अंधविश्वास और कर्मकांड छोड़ कर दलित समाज के महापुरुषों के विचारों को आत्मसात करने पर जोर दिया। कार्यक्रम के अंत में पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या और जयप्रकाश लीलवान की असामयिक मौत पर सभी की तरफ से गहरा शोक व्यक्त किया गया और दो मिनट का मौन रख कर श्रद्धांजलि दी गई।  

कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार व कवि कुसुम वियोगी, जामिया के मुकेश मिरोठा, डॉ मनोज कुमार,  यूथ फॉर सोशल जस्टिस के अध्यक्ष सुरेंद्र कुमार, प्रभात पोस्ट के संपादक राजकुमार मल्होत्रा समेत अलग-अलग क्षेत्र के गणमान्य व्यक्तियों, शोध छात्रों व बुद्धिजीवियों ने शिरकत की, गौतमबुद्ध नगर के दादरी में केंद्रीय विद्यालय में हिन्दी प्रवक्ता के पद पर कार्यरत अरुण कुमार ने कार्यक्रम का सफल संचालन किया । इसके साथ ही दलित कवियत्री कांता बौद्ध ने सभी दलित विद्वानों को धन्यवाद कहते हुए कार्यक्रम के समापन की घोषणा की।
     

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