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भगवान रविदास : आदर्श समाज के प्रवर्तक

भगवान रविदास का जन्म माघ पूर्णिमा, विक्रम संवत् 1433 (सन् 1377) में सीरगोवर्धनपुर, वाराणसी, उत्तर प्रदेश में हुआ। इनके जन्म स्थान पर सात मंजिला भव्य मंदिर निर्मित किया गया है और जिसके अनेक गुंबद स्वर्णमंडित हैं। इस मंदिर का नाम है- ‘श्री गुरु रविदास जन्म स्थान मंदिर’। इसी स्थान पर लाखों लोगों द्वारा प्रत्येक वर्ष भगवान रविदास का जन्मदिन बड़े ही धूम-धाम और हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इनके परिवार का परिचय इस प्रकार है: पिता- संतोख दास, माता- कलसी देवी, दादा- कालू राम, दादी- लखपति, पत्नी- लोना देवी, पुत्र- विजय दास। 

इनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत ही अच्छी थी। इनके पिता अपने इलाके के एक प्रतिष्ठित चर्मकार थे, इनके यहां चमड़े का बहुत बड़ा कारखाना था उसमें बहुत से कारीगर काम करते थे, कारोबार से बहुत अच्छी आमदनी होती थी। पारिवारिक आर्थिक स्थिति अच्छे होने और मन से दयालु होने के कारण भगवान रविदास प्रतिदिन गरीब जरुरतमंदों और साधुओं को जूते मुफ्त में दे दिया करते थे। उन्हें विद्यवान लोगों से विभिन्न विषयों पर चर्चा करना भी बहुत अच्छा लगता था; इस प्रकार इनका अधिकतर समय समाज सेवा और सामाजिक सरोकार के मुद्दों पर विचार-विमर्श में ही बीत जाता था। तथाकथित अछूत समाज में परम्परागत रूप से चली आ रही ज्ञान-पद्धतियों और सभी धर्मों के विद्वानों के साथ हुई विचार-गोष्ठियों, चर्चाओं के साथ-साथ गहरे आत्म चिंतन और विश्लेषण से इन्होंने अपने ज्ञान में अपार वृद्धि की।

इनको अनेक भाषाओं का ज्ञान था। इनकी लेखन कला तो बहुत बेहतरीन थी। इनकी वाणी में पंजाबी, अरबी, फ़ारसी, राजस्थानी, भोजपुरी, हिंदी आदि अनेक भाषाओं के शब्दों का खूब प्रयोग देखा जा सकता है। संगीत, दर्शन, मनोविज्ञान, राजनीती, कला, आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक आदि विषयों की भी इन्हे गहरी समझ थी, इनके लेखन कार्य में यह सब परिलक्षित हुआ है। समय के साथ-साथ इनके ज्ञान की आभा समाज में चारों तरफ फैलने लगी, इनकी सामाजिक पहचान स्थापित होने लगी; इनके व्यक्तित्व से लोग प्रभावित होने लगे। इन्होंने अपने विचारों को बहुत ही सुन्दर, सारगर्भित और प्रभावशाली वाणी में अभिव्यक्त किया है, इनकी वाणी अनेक धार्मिक ग्रंथों में समाहित है जैसे- ‘गुरु ग्रन्थ साहिब’, ‘अमृतवाणी सतगुरु रविदास महाराज जी’, ‘आदि गुरूवाणी सतगुरु रविदास जी’ आदि।

इन्होंने एशिया के लगभग सभी देशों के साथ-साथ सुदूर अरब देशों की यात्राएं भी की थी और वहां भी अपने तार्किक और प्रभावशाली विचारों से लोगों को प्रभावित किया था। उस समय के अनेक राजा-रानियों जैसे चितौड़ की प्रसिद्ध महारानी मीराबाई, राजा बेन सिंह, महाराणा सांगा, महारानी झाला बाई, राजा नागर मल (हरदेव सिंह), राणा वीर सिंह बघेल, बीबी भानमती, महाराणा कुम्भा, राजा रतन सिंह, सिकंदर लोधी, अलावादी बादशाह, बिजली खान आदि जैसे लगभग 52 राजा-रानियों और विशाल जन-समुदाय ने इनका शिष्यत्व ग्रहण किया था। शिष्या मीराबाई ने तो अपने गुरु भगवान रविदास के सम्मान में चित्तोड़गढ़ (राजस्थान) के किले में स्थित कुंभा-श्याम मंदिर (मीरा मंदिर) के प्रांगण में इनकी चरण पादुकाएं बनवाई हैं। ये पुरातात्विक प्रमाण आज भी चित्तोड़गढ़ का गौरव बढ़ा रहे हैं।

उस दौर में तथाकथित निम्न समझे जाने वाले वर्ग के लोगों को संस्कृत पढ़ने का अधिकार नहीं था, यह अधिकार तथाकथित उच्च मानी जाने वाली जातियों तक ही सीमित था। इसलिए भगवान रविदास ने वंचित वर्ग के लिये एक नई भाषा ‘पंजाबी भाषा’ का निर्माण किया, उसकी पृथक लिपि ‘गुरुमुखी लिपि’ का सृजन किया। अमृतसर की कोर्ट में यह मुकदमा भी चला था कि गुरुमुखी लिपि (पंजाबी भाषा) का निर्माण किसने किया? इस मुकदमे का फैसला दिनांक 11 मार्च, 1932 को आया, जिसमें यह माना गया कि गुरुमुखी लिपि का निर्माण भगवान रविदास ने ही किया है। एक नई भाषा के निर्माण से तथाकथित निम्न वर्ग ही नहीं अपितु सम्पूर्ण मानव सभ्यता को फायदा हुआ। 

अनेक समकालीन विभूतियों ने इनके विचारों और सामाजिक कायों से प्रभावित हो कर इनकी मुक्त-कन्ठ से प्रशंसा की है इनमें से कुछ हैं- कबीरदास, मीराबाई, गुरु नानक देव, गुरु अर्जुन देव, नामदेव, सेन, धन्ना, रज्जब अली, नाभादास, गरीबदास, दर्शनदास, सेवादास, तुकाराम, पलटूदास, अनंतदास, कल्याणदास, सुन्दरदास, रूपराज आदि। और, आज तो देश और विदेशों के करोड़ों लोग इनको अपना आदर्श मानते हैं, अपना आराध्य मानते हैं। इनकी सुन्दर, सारगर्भित और प्रभावशाली वाणी विविध आयाम लिए हुए है। समाज के अनेक महत्वपूर्ण पहलुओं को इन्होंने उजागर किया है, अनेक समस्याओं पर अपनी लेखनी चलाई, कुछ उदाहरण देखे जा सकते हैं। 
इतिहास में पराधीनता अर्थात दूसरे की गुलामी को पाप के रूप में सबसे पहले इन्होंने ही इंगित किया है-

"पराधीनता पाप है, जान लहु रे मीत।  रविदास दास पराधीन सों, कोन करे है प्रीत।।"

सभी के लिए खाद्य सुरक्षा का प्रश्न और सत्ता की कार्यशैली कैसी हो? समाज से जुड़े ऐसे अन्यंत गंभीर प्रश्नों को सर्वप्रथम इन्होंने ही उठाया है-   

 "ऐसा चाहूँ राज मैं, जहां मिलै सबन को अन्न।  छोट बड़ो सब सम बसै, रविदास रहे प्रसन्न।।"

स्वराज (स्वयं का राज) प्राप्ति ही अछूत समाज का मुख्य लक्ष्य होना चाहिये, ऐसा विचार सर्वप्रथम इन्होंने ही प्रस्तावित किया है-

"रविदास मानुष करि बसन कूं, सुखकर है दुई ठावं। इक सुख है स्वराज महिं, दूसर मरघट गांव।।"

शिक्षा के महत्व का बखान किया है-

"संत विद्या को पढ़े, प्राप्त करे सदा ज्ञान। रविदास कहे बिन विद्या, नर को जान अजान।।"

कर्मकांड और पाखंडवाद को भ्रम बताया है-

"पांडे! हरि विच अंतर डाढा।  मुंड मुंडावें सेवा पूजा भ्रम का बंधन गाढ़ा।।"

सच्ची धर्मनिर्पेक्षता (जिसमें किसी भी धर्म को नफरत की नजर से नहीं देखा जाता, सबको समान महत्व दिया जाता है) को प्रस्तावित करते हैं-

"मुसलमान सों दोस्ती हिन्दुअन सों कर प्रीत। रविदास जोति सभ राम की है सभ हैं अपने मीत।।"

मनुष्य की ‘जाति’ नहीं उसके ‘गुण’ महत्वपूर्ण हैं, व्यक्ति को उसके गुणों के आधार पर ही सम्मान दिया जाना चाहिये, इस विचार को बहुत ही सहज प्रकार से प्रस्तुत किया है-
"रविदास बाह्मण मत पूजिए, जउ होवे गुण हीन। पुजहिं चरण चांडाल के, जउ होवे गुन परवीन।।"

‘वर्ण’ या ‘जाति’ के आधार पर सामाजिक विभाजन का इतना व्यापक और वैज्ञानिक विश्लेषण इतिहास में सबसे पहले इन्होंने ही किया है-

"रविदास एक ही बूंद सों सब ही भयो वित्थार।  
मूरख है जो करत है बरन अबरन बिचार।।"

"रविदास जन्म के कारने होत न कोऊ नीच। 
नर कूं नीच करि डारि है ओछे करम की कीच।।"

"जात-जात में जात है ज्यों केलन में पात। 
रविदास न मानुष जुड़ सकें जों लों जात न जात।।"

"रविदास जाति मत पूछइ का जात का पात। 
ब्राह्मण खत्री बैस सूद सभन की एक जात।।"

"जात पात के फेर महीं उरझि रहइ सब लोग। 
मानुषता कूं खात है रविदास जात का रोग।।"

मंदिरों में व्याप्त झूठ और पाखंड को उजागर करते हैं-

"थोथा पंडित थोथी वाणी, थोथी नाम बिन सबै कहानी। 
थोथा मंदिर भोग विलास, थोथी आन देव की आसा।।"

जो व्यक्ति गरीब लोगों के भलाई के लिए अपने अपनी जान तक कुर्बान कर देता है उस व्यक्ति को ‘सच्चा क्षत्रिय’ बताया है-

"दीन दुखी के हेत जउ बारै अपने प्रान। रविदास उस नरसूर को सांचा छत्री जान।।"

वे डंके की चोट पर ‘कह रविदास चमार’ और ‘कह रविदास खलास चमार’ जैसे स्वाभिमान से लबालब शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, और जाति व्यवस्था के पोषकों को करारा जवाब देते हैं। इसी साहसिक वैचारिकता ने इन्हें वहां पहुंचा दिया जहां से इन्होंने सम्पूर्ण मानव मात्र के लिए आदर्श समाज का मॉडल प्रस्तुत किया, वह मॉडल है- 'बेगमपुरा'। बेगमपुरा अर्थात ‘बिना ग़मों का स्थान’l 

"बेगमपुरा सहर को नाउ। दुखु अन्दोहु नहीं तिहि ठाउ।। 
ना तसवीस खिराजु न मालु। खवफु न खता तरसु न जवालु।।
 

अब मोहि खूब वतन गह पाई। उहां खैरी सदा मेरे भाई।।
 
काइमु दाइमु सदा पातसाही। दोम न सोम एक सो आही।।
 

आबादानु सदा मसहूर। उहां गनी बसहि मामूर।।
 
तिउ तिउ सैल करहि जिउ भावै। महरम महल न को  अटकावै।।
 
कहि रविदास खलास चमारा। जो हम सहरी सु मीतु हमारा।।"
     

सुप्रसिद्ध लेखिका डॉ. गेल ओम्वेट ने अपनी पुस्तक ‘सीकिंग बेगमपुरा’ में भगवान रविदास को सम्पूर्ण भारतीय इतिहास में प्रथम व्यक्ति माना है जिन्होंने आदर्श भारतीय समाज का ‘मॉडल’ पेश किया है। भगवान रविदास ने ‘बेगमपुरा’ पद में जो विचार दिये हैं वही विचार ‘भारतीय संविधान’ में निहित हैं, और वही विचार ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ के ‘मानवाधिकारों का सार्वभौमिक घोषणापत्र’ के संविधान के अनुच्छेद 1 में निहित हैं। आसाढ़ संक्रांति, विक्रम संवत् 1584 (सन् 1528) को इनका शरीरांत हो गया। लेकिन जब-तक ये पृथ्वी रहेगी, जब तक ये सभ्यता रहेगी तब तक भगवान रविदास जैसे महानायक के विचार मानव सभ्यता को समृद्ध करते रहेंगें, जरुरत है उनके विचारों को बिना किसी पूर्वाग्रह के समझा जाये। मानव मात्र के उत्थान के लिए व्यक्त किये गए इनके विचारों को अगर सही रूप में समझा जाये तो समता, स्वतंत्रता, और भाईचारे पर आधारित समाज का निर्माण किया जा सकता है। इनकी विचारधारा को अपना कर ही भारत एक विश्व गुरु बनने का स्वप्न पूरा कर सकता है।                    

डॉ. मनोज कुमार
(दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली से ‘भगवान रविदास’ पर Ph.D.)


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1 Comments

  •  
    ASWANI
    2018-02-26

    Sir,ap k duvara di gyi jankai muje bhut psnd ayi or jankari lna chata hu mera WhatsApp Number 9536712822 h

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