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चुनौतियों भरी हैं बहुजन साहित्य की अवधारणा

‘बहुजन साहित्य की अवधारणा’ पर कुछ बात करने के लिए मैं नवंबर 2016 में माननीय आयवन कोस्का और प्रमोद रंजन द्वारा संपादित ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’ नामक पुस्तक को केन्द्र में रखूँगा। मुझे ये लगता है कि बहुजन साहित्य की अवधारणा को समझने को इस किताब में काफी कुछ है। संदर्भित पुस्तक को पढ़कर जाना कि दलित साहित्य के उद्भव के बाद भारतीय समाज के दलित और पिछड़े समाज में जिस साहित्यिक अभिरुचि का प्रादुर्भाव हुआ है....वो देर-सवेर होना ही था। क्योंकि कोई भी समाज ज्यादा देर तक परम्पराओं का अनैतिक बोझ नहीं ढो सकता। मुझे यह मानने से कोई गुरेज नहीं है कि परम्पराओं के बोझ तले दबा बहुजन समाज कभी एकजुट नहीं हो पाया और आज भी एकजुट नहीं है...इसके विपरीत ब्राह्मण-समाज भीतर के तमाम अंतर्विरोधों के चलते कभी भी विघटित नहीं हो पाता... ब्राह्मण की यही एक ऐसी विशेषता है जिसने बहुजन वर्ग को अपनी चालों में फंसाकर कभी एकजुट नहीं होने दिया। इसलिए बहुजन समाज में विभिन्न साहित्यिक धाराओं का उत्पन्न होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया ही कही जाएगी। ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’ इस सत्य का एक उदाहरण है।

दलित साहित्य के बाद मूलनिवासी साहित्य, अम्बेडकरवादी साहित्य, पेरियार-फूले साहित्य, आदिवासी साहित्य और भी विभिन्न साहित्यिक धाराओं का शैने-शैने उदय हुआ है। बहुजन साहित्य की सैद्धांतिकी भी इन धाराओं से विरत नहीं है। संविधान की धारा 16(4) के तहत पिछड़े वर्ग की समीक्षा मिलती है। दरअसल समाज की दमित जातियों का विभाजन भी यहाँ देखने को मिलता है। जिसके तहत अनुसूचित जातियों और जनजातियों के साथ-साथ अन्य पिछड़ी जातियों के समुच्‍चय को ‘पिछड़ी जातियां’ माना गया है। किंतु अंतर सिर्फ इतना है कि समाज की प्राय: अपृश्य जातियों को संविधान के अंतर्गत अनुसूचित कर दिया गया और अन्य पिछड़ी जातियों को अनुसूचित नहीं किया गया। शायद इसके पीछे तर्क रहा होगा कि अन्य पिछड़ी जातियां अपृश्य जातियों  के मुकाबले न केवल आर्थिक रूप से सबल रही हैं अपितु उन्हें सामाजिक सम्मान भी प्राप्त रहा हैं। अनुसूचित जातियां आज भी हेय दृष्टि से देखी जाती हैं। इस सामाजिक स्थिति के चलते दलित-साहित्य और पिछड़ी जातियों के साहित्य में मूलभूत अंतर होना लाजिम है। हाँ! इतना जरूर कहा जा सकता है कि दलित-साहित्य की तरह बहुजन साहित्य भी दमित जातियों में एक नई चेतना को विकसित करने में मददगार ही सिद्ध नहीं होगा, अपितु ब्राह्मणवाद को चुनौती देने में एक अहम भूमिका का संचार करेगा। किंतु यहाँ इस भावना पर एक प्रश्नचिन्ह भी लग सकता है कि बहुजन साहित्य में शायद ही वह धार और संघर्ष की भावना/जिजीविषा का संचार हो सके जैसा कि दलित-साहित्य अर्थात अम्बेडकरवादी साहित्य में संभव हो पाया है।

कहना न होगा कि संदर्भित पुस्तक में संग्रहित लेखों को तीन खंडों में संयोजित करना ही मेरे मत का समर्थन करता है। शुरुआत में ही ओबीसी साहित्य विमर्श, आदिवासी साहित्य विमर्श तथा बहुजन साहित्य विमर्श की बात उठाना समाज में या फिर समाज की वैचारिकता में बंटवारे की ओर संकेत करता है। इसमें कोई शंका नहीं कि पुस्तक में समाहित लेख पूरी तरह से सारगर्भित और विचारोत्तेजक हैं। किसी विशेष लेखक का उल्लेख करना मुझे यहाँ तर्कसंगत इसलिए नहीं लगता क्योंकि सभी ने अपने मन-मस्तिष्क से विस्तृत अध्ययन और लेखन का परिचय दिया है। अपने-अपने अनुभवों और सोच को साझा किया है।

एक बात मुझे बार-बार झकझोर रही है कि पिछड़ी (‘ओबीसी’ ) जातियों में तो पहले से ही काफी साहित्यकार तथाकथित मूलधारा के साहित्य को समृद्ध करते रहे हैं। फिर ऐसा क्या हुआ कि आज “ओबीसी साहित्य विमर्श” का सवाल उठ खड़ा हुआ, क्या हमारे बुजुर्ग साहित्यकार समाज के प्रति अपनी भूमिका को निभाने में असमर्थ रहे हैं? एक बात और यह कि क्या अनुसूचित जातियों की तरह  ‘ओबीसी’ समाज अपने आपको ब्राह्मणवादियों द्वारा जाति का मुद्दा, ईश्वर और धर्म की स्थापना से ऊपर उठ पाने का साहस कर पाएगा। क्या ‘ओबीसी’ समाज  ईश्वर और धर्म में विश्वास रखने वाले ब्राह्मण जाति की तरह साहित्य के नाम पर एकजुट हो पाएगा? यह सवाल दलित साहित्यकारों के सामने भी मुंह बाए खड़ा है। यह इसलिए कि ‘ओबीसी’ समाज भी ब्राह्मण की तरह ही ईश्वर और धर्म में विश्वास रखता है।

माना कि दलित साहित्य दमन के विरुद्ध चेतना का साहित्य है। इसमें उन दलित जातियों की चेतना की अभिव्यक्त होती है, जिन्हें इतिहास के दौर में सर्वाधिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी है। परंतु दलित-साहित्यकारों में वैचारिक एकता के इतर जातीय एकता देखने को कम ही मिलती है। दलित-साहित्यकार जैसे जातीय खेमों में बंट गए हैं। वहाँ भी अलग-अलग जातियों के साहित्यकारों में वैचारिक मतभेद सामने आने लगा है। यह चुनौती ओबीसी साहित्य विमर्श, आदिवासी साहित्य विमर्श तथा बहुजन साहित्य विमर्श में घर नहीं बनाएगी, मुझे ऐसा नहीं लगता। गौरतलब है कि ओबीसी वर्ग भी अनेक जातियों का समुच्च्य है, जैसे कि दलित-समाज। उल्लेखनीय है कि अन्य पिछड़े वर्ग में भी राजनेताओं ने फूट डालने का कम शुरु कर दिया है।  अन्य पिछड़े वर्ग की 17 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों का दर्जा देने के उत्तर प्रदेश की सरकार के  हालिया निर्णय को उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। क्या ‘ओबीसी’ जातियां ऐसे निर्णय को पचा पाएंगी...क्या उन्हें ‘दलित’ जातियों में दर्ज किया जाना रास आएगा? और यह भी क्या बहुजन साहित्यकार ऐसे निर्णयों के खिलाफ आवाज बुलन्द करने का साहस जुटा पाएगा? यदि हाँ। तो फिर बहुजन साहित्य के उज्ज्वल भविष्य की कामना की जा सकती है।

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’ किताब का प्रत्येक लेख अपने आप में रेखांकित करने योग्य है। हर लेख आलोचना और समालोचना से सराबोर है। कुछ लेख यदि बहुजन साहित्य की आवश्यकता पर बल देते हैं तो कुछ लेख दलित साहित्यकारों और ओबीसी साहित्यकारों वैचारिक पृष्ठभूमि पर सवाल खड़ा करते हैं। वह इसलिए कि जब दलित साहित्यकार तथाकथित मूलधारा के साहित्य के समानांतर नई साहित्यिक धारा बनाने में अग्रसर थे, तब पिछड़े वर्ग के साहित्यकार या तो कुछ सकारात्मक सोच बनाने की सूरत में नहीं थे या फिर दलित साहित्य की मूल विचारधारा के पक्ष में द्विज साहित्यिक/सामाजिक मान्यता को नकारने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे। उन्हें दलित साहित्यकारों के साथ जाना नापसन्द था...जबकि जाना चाहिए था । किंतु इसे कोई घात नहीं कहा जा सकता.... हमारे सामाजिक सरोकार ही कुछ इस प्रकार से छिन्न-भिन्न हैं।

एक और चिंता का विषय है कि दलित साहित्यकारों ने समाज के जिन महापुरुषों की विचारधारा को लेकर अम्बेडकरवादी साहित्य को विकसित किया है, उन्हें किसी और को कैसे सोंप देंगे। इस प्रकार का दुराव इन तीनों ही धाराओं में होना स्वभाविक है। इससे जूझने के लिए सभी को तैयार रहने की खासी जरूरत है। बहुजन साहित्य की अवधारणा को आदिवासी और ओबीसी साहित्य किस हद तक स्वीकार कर पाएगा, यह भी एक विचारणीय विषय है, यूँ बहुजन साहित्य की अवधारणा एक विस्तृत और सभी वर्गों को साथ लेकर चलने का फलक रखता है।
    
यहाँ मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि यदि बहुजन साहित्य में भी संकीर्णता और कट्टरवादिता जगह बना लेती है तो वही हालत बन जाएगी कि जैसे खुली विधारधारा के स्‍थान पर संकीर्णता और कट्टरवादी दृष्टिकोण हावी हो जाता है। इस बात को अच्छे से समझने के लिए अधोलिखित विश्‍लेषण  पर दृष्टिपात करना मुझे आवश्यक जान पड़ रहा है।
      
जब भी कोई किसी प्रकार की चर्चा होती है तो उदारवादी सोच  और कट्टरतावादी सोच के सवाल अक्सर ही उठते हैं। उदारवादी सोच वालों की एक सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि इनके खुले दिमाग में निर्णायक समय में संकीर्ण मानसिकता घुसकर उनके विचारों को संक्रमित कर देती है। परिणाम ये होता है कि ये अपने विचारों में ही कमियाँ ढूँढने लगते हैं और उनकी उदारवादी सोच कट्टर विचारधारा के शोरशराबे में दबकर रह जाती है।
   
दूसरे, कट्टर विचारधारा वाले लोग अपनी बात/सोच पर बराबर अडिग बने रहते हैं, इसके विपरीत उदारवादी सोच वाले लोगों की सोच में लचीलापन होता है, जिसके चलते वे अपनी ही सोच के अच्छे और बुरे होने पर संशय करने लगते हैं। फलत: वो बहुत बार अपनी ही बात से मुकर जाने का विचार/मन बना लेते हैं। इस तरह संकीर्ण/कट्टर विचारधारा/मानसिकता वाले लोग उदारवादी सोच  वालों के विचारों से प्रभावित ही नहीं होते हैं।  उलटे उदारवादी सोच  वाले ही संकीर्ण विचारधारा वाले लोगों से प्रभावित होने लगते हैं। कहना सत्य से परे नहीं कि खुले दिमाग वाले लोग केवल सामान्य परिस्थितियों में ही सामान्य  रहते हैं।  क्‍योंकि साम्प्रदायिक वैमनस्य का माहौल उन्हें रास नहीं आता या यूँ कहें वे उसके समर्थक ही नहीं होते। अत: उदारवादी सोच  वाले लोगों के दिमाग  संकीर्णता का मुकाबला करने में पीछे रह जाते हैं। खुले दिमाग वालों की एक और समस्या ये है कि निर्णायक समय में ये लोग अपने अच्छे विचारों के प्रसार के लिए कोई सटीक आन्दोलन ही खड़ा नहीं कर पाते और  लोगों को समझाने में पिछड़ जाते हैं। किंतु  संकीर्ण/कट्टर मानसिकता वाले लोग सड़कों पर उतर आते हैं और समाज के भोले-भाले लोगों को अपने जाल में फंसा लेते हैं।  कमाल की बात तो ये है कि खुले दिमाग वाले और संकीर्ण दिमाग वाले दोनों ही काफी कम-कम संख्या में होते हैं। लेकिन इन दोनों प्रकार के लोगों से बाहर के लोग बहुतायत में होते हैं और वो जिस करवट बैठ जाते हैं, उस ओर का पलड़ा भारी हो जाता है। जिनकी वजह से समाज के हित और अनहित/‍अहित के सवाल हल होते हैं। यहाँ एक और सवाल उठता है कि क्या कभी बहुजन समाज के लोग अपनी सक्रिय भागीदारी निभाने की दिशा में आगे बढ़ पाएंगे, मुझे तो ऐसा कतई नहीं लगता। आशावादी दृष्टिकोण के तहत ये माना जा सकता है कि जिस दिन से बहुजन समाज के खुली विचारधारा वाले जागरुक लोग  सामूहिक रूप से  सड़क पर उतरना शुरु कर देंगे, उसी दिन से संकीर्ण मानसिकता के लोगों की कट्टरता समाज के सामने कमजोर पड़ जाएगी।

बहुजन साहित्य केवल संवाद-भर बनकर रह जाए, इसमें ‘परिसंवाद’ भी होना चाहिए।.....इसमें सवाल भी हों और उत्तर भी। बहुजन साहित्य ‘तू मुझे पंडा कह, मैं तुझे पंडा कहूँ’ वाली परिपाटी से दूर रहे। बहुजन साहित्य आज के दौर की भयावहता को जाँचे-परखे और बेखौफ़ जनता के बीच रखे... आर्थिक और धार्मिक आधार पर होने वाले शोषण और दमन का प्रतिरोध करे। कहना अतिशयोक्ति न होगा कि आर्थिक आधार पर होने वाले आतंक का परिणाम ‘मानवता का शोषण’ तो धार्मिक आधार पर होने वाले आतंक का परिणाम ‘मानवता का दमन’ है। यदि साहित्य में ऐसे विषयों को अछूता छोड़ दिया जाता है तो फिर साहित्यकार का ध्येय ओझल सा हो जाएगा, ऐसा मैं मानता हूँ।

यदि बहुजन साहित्य ब्राह्मणवादी सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श तथा जीवन की समस्त गतिविधियों से उबर पाने का साहस जुटा पाता है तो निसंदेह यह एक बड़ा साहित्यिक आन्दोलन सिद्ध होगा। साहित्य के बलपर आर्थिक और सामाजिक समानता का मार्ग प्रशस्त होने की सम्भावना तलाशना अभी दूर की बात है। बहुजन साहित्य की अवधारणा के बूते पर यदि दलित/दमित/ओबीसी समाज को एक सूत्र में बन्धने का मार्ग-भर  ही प्रशस्त हो जाता है तो यह एक बड़ी बात होगी। लेकिन अभी ये आशा करना दूर की कौड़ी लग रही है।  

लेखक:
 तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की दर्जन-भर किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), दो निबन्ध संग्रह  और अन्य। तेजपाल सिंह ‘तेज’  साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक, आजीवक विजन के प्रधान सम्पादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर इन दिनों आप स्वतंत्र लेखन के रत हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।      


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